विश्वव्यापी कोरोना महामारी के लिए सावधानी और सतर्कता के सारे आवश्यक संभव प्रयास के साथ कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और रोज़गार के क्षेत्र से प्राप्त आंकलन जरूरी सुझावों और सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार और सुरक्षा-कर्मियों के निगरानी में लॉकडाउन को समय-सारिणी स्लॉटिंग में खत्म किया जाना चाहिए। निषेधाज्ञा (कर्फ्यू) कोरोना महामारी का तात्कालिक एवं आंशिक समाधान है इसका असली उपयोगी समाधान टीका (वैक्सीन) और सावधानी ही है। अफसरशाही, तानाशाही, नेता-गिरी, कमज़ोर और ग़रीबों के शोषण के खिलाफ पारदर्शिता पूर्ण दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। ग़रीबों, श्रमिकों और कर्मचारियों के कार्य एवं उसके आवागमन का उचित प्रबंध सरकार के तरफ से होना चाहिए। सभी समाज को कोरोना महामारी अभियान से जोड़ा जाना चाहिए और कोरोना महामारी के बारे में जागरूकता और अवलोकन अभियान के लिए स्वयंसेवक के साथ-साथ महामारी विशेषज्ञों को नियुक्त करना चाहिए। हर एक घर और व्यक्ति के आधार कार्ड को महामारी परीक्षण-निरीक्षण के लिए जोड़ा जाना चाहिए। समाज कल्याण और स्वास्थ्य विभाग को और अधिक सशक्त समृद्ध और शक्तिशाली बनाने की जरूरत है। देश की आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा के स्तर को सशक्त, समृद्ध और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए सरकार को पारदर्शी और दुरदर्शी निति के साथ उचित, उपयोगी योजनाओं को निर्धारित तथा कार्यान्वित करना होगा। क्योंकि विकसित देश का लगभग हर एक नागरिक अपने जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक हैं और आत्मनिर्भर है। परन्तु विकासशील देश की ५०% जनता सरकार और सरकारी योजनाओं पर निर्भर है क्योंकि ?
शायद अमीर-ग़रीब का फर्क (अंतर) यहां परिश्रम से नहीं पारिश्रमिक और भूख से किया जाता है यहां नेताओं को भगवान माना जाता है। हमें इस प्रकार की धारणा को समाप्त करने की आवश्यकता है। जब तक हम अपने परिश्रम को ज्ञान और विज्ञान के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए साधन एवं संसाधनों के विस्तार पर बल देते हुए जागरूकता और आत्मनिर्भरता की धारणा को अपना नहीं लेते तब तक हमें यूं ही अमीरी-ग़रीबी के जाल और जंजाल में फंसे रहना होगा नेताओं को भगवान मानते रहना होगा। राम राज्य वापस तो नहीं आएगा लेकिन हमें श्री राम के आदर्शों को और भारत वर्ष के अनेकता में एकता की अवधारणा को बनाए रखने की जरूरत है। अंत में महाकवि रवींद्रनाथ जी की कुछ पंक्तियां जिनको समस्त विश्व एवं भारतवासी को चरितार्थ करने की कोशिश करनी चाहिए।।
जहां चित्त भय से शून्य हो जहां हम गर्व से माथा ऊंचा करके चल सकें
जहां ज्ञान मुक्त हो
जहां दिन-रात विशाल वसुधा को खंडों में विभाजित कर छोटे-और छोटे आंगन ना बनाए जाते हों
जहां हर वाक्य दिल की गहराई से निकलता हो
जहां हर दिशा में कर्म के अजस्त्र सोते फूटते हों
निरंतर बिना बाधा के बहते हों
जहां मौलिक विचारों की सरिता
तुच्छम आचारों की मरू-रेती में ना खोती हो
जहां पुरूषार्थ सौ-सौ टुकड़ों में बंटा हुआ ना हो
जहां पर कर्म, भावनाएं, आनंदानुभूतियां
सभी तुम्हारे अनुगत हों
हे प्रभु, हे पिता । अपने हाथों से कड़ी थपकी देकर
उसी स्वातंत्र्य जगत में इस सोते हुए भारत को जगाओ।
।। जय हिन्द जय भारत।।