जर, जोरू और जमीन" एक प्रसिद्ध कहावत है जिसका अर्थ है कि दुनिया के ज़्यादातर झगड़े और विवाद धन (जर), स्त्री (जोरू) और भूमि (जमीन) के इर्द-गिर्द घूमते हैं, जो व्यक्ति के जीवन के तीन मुख्य आधार होते हैं और अक्सर इनके लिए संघर्ष होता है। लेकिन इससे भी बढ़कर तीन मुख्य उद्देश्य है, सत्ता, धर्म और मानवता जिसकी वजह से दुनिया कायम है। और वर्तमान में इसीलिए हम धन (जर), स्त्री (जोरू) और भूमि (जमीन) जैसे प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य के लिए धर्म और मानवता का बलिदान करके सत्ता स्थापित करने में लगे हुए हैं। अंततः परिणाम स्वरूप महाभारत और रामायण की पुनरावृत्ति के माध्यम से फिर से धर्म और मानवता को स्थापित करना पड़ता है। अरे बैल बुद्धि मूर्ख इंसान जब धर्म और मानवता की सत्ता रहेगी तभी तुम इन तीन आधारों की ऐश्वर्य और प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकते हो, यही श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों का उपदेश एवं आदेश है। उद्देश्य सिद्ध करो प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य का आधार अपने आप मिल जाएगा।
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बुधवार, 21 जनवरी 2026
रविवार, 4 जनवरी 2026
ज्ञान भक्ति और मोक्ष की महीमा
प्रस्तावना एवं परिचय
आज के आधुनिक युग में सब कुछ जाती, धर्म और अर्थ पर आधारित हो चुका है। हमें ज्ञान, भक्ति और मोक्ष की कोई चिंता नहीं है। सिर्फ भोग-विलास, काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह-माया आदि की तृप्ति के लिए, धर्म-जाति और अर्थ का दुर्पयोग कर रहे है, अनुचित उपयोग कर रहे हैं।
हम सनातनी हैं, जिसका ना आदि है ना अंत। इसलिए सनातन धर्म में वसुधैव कुटुंबकम् कि धारणा एवं अवधारणा है। निरंतरता ही इस सनातन का मूल आधार है, सृष्टि ही सनातन है, जो सदैव निरंतर गतिमान है, और ब्रह्मांड की निरंतरता का सनातन रहस्यमय है, जिसको आज के नेता राजनेताओं, साधु-संतों, बाबाओं और मनुष्य को समझ पाना लगभग असम्भव है। जिसने समझा वो अंतर्मुखी है अंतर्ध्यान है, सारे गुणों अवगुणों और अवस्थाओं को अपने अधीन कर योगनिद्रा में विलीन है। ढूंढ सको तो ढूंढ लो, पहचान सको तो पहचान लो, लेकिन उसके लिए तुम्हें अपने कामेन्द्रियों एवं इन्द्रिय के साथ ही गुणों और अवगुणों को साधना होगा नियंत्रित करना होगा, कर सकते हो तो कर लो, मुझसे तो नहीं होगा, और ना ही मेरे बस की बात है, मैं तो मानव होने के नाते मानवता के लिए, एवं आस्तिक अथवा धार्मिक होने के कारण धर्म में गहरा विश्वास रखता हूं। और जागरूक करने के लिए अपने कलम कि फ़क़ीरी के माध्यम से समझने के लिए मात्र प्रचार और प्रसार कर रहा हूं।
भक्ति और ज्ञान
भक्ति और ज्ञान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, बगैर भक्ति के ज्ञान नहीं होता और बिना ज्ञान के भक्ति। भक्ति में: 'मैं' और 'तू' का संबंध है (जैसे भक्त और भगवान)। ज्ञान में: 'मैं' का विलोप हो जाता है, 'मैं' का 'मैं' से मिलना (आत्म-साक्षात्कार का बोध होता है)।
संक्षेप में, ज्ञान हमें रास्ता दिखाता है (सच्चा पता) और भक्ति उस रास्ते पर चलना सिखाती है (सही दिशा में आगे बढ़ना)। उदाहरण स्वरुप हमें पैदा होने के बाद पढ़ना, लिखना और बोलना सिखाया जाता है, और फिर हमें धीरे धीरे ज्ञान प्राप्त होता है कि, कैसे, क्या और कब बोलना है। तुलसी बाबा को स्वप्न में ज्ञान प्राप्त हुआ लेकिन भक्ति उन्हें हनुमानजी ने सिखाया। यदि आप भक्ति और ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं, तो श्रीरामचरितमानस के उत्तर कांड में वर्णित काकभुशुण्डि के प्रसंग से संबंधित दोहें, चौपाई, सोरठा और छंद पाठ अवश्य पढ़ें।
सारांश के रूप में मैं एक दोहा और चौपाई का वर्णन करता हूं जिसमें चिंतामणि रघुनाथ जी की कृपा से ज्ञान और भक्ति का आभास जरुर होगा। ॐ श्री गणेशाय नमः। जै जै सियाराम।
ज्ञान-दीपक और भक्ति की महान महिमा मानस का दोहा
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि॥117 ग॥
भावार्थ: (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) तीनों अवस्थाएँ और (सत्त्व, रज और तम) तीनों गुण रूपी कपास से तुरीयावस्था रूपी रूई को निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुंदर कड़ी बत्ती बनाएँ॥117 (ग)॥
सोरठा :
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥117घ॥
भावार्थ:-इस प्रकार तेज की राशि विज्ञानमय दीपक को जलावें, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जाएँ॥117घ॥
आडम्बर एवं वाद-विवाद का खंडन
सनातन से सम्बंधित रहस्य, शायद यह है कि समस्त संसार एवं ब्रह्मांड का आदि, अंत और अनंत को हम कभी नहीं समझ सकते। जब तक कि हम लोभ-लालच, मोह-माया, और काम क्रोध का त्याग कर ज्ञान और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर नहीं हो जाते। इसके लिए हमें अपने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर इत्यादि को मात्र मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर संरक्षित और संचालित करने की आवश्यकता है। जैसे राष्ट्रहित के लिए मानवता को स्थापित करने के प्रयास में धर्म, संस्कृति और राजनीति को निष्पक्ष एवं निष्काम भाव से, राष्ट्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार के लिए लोकतांत्रिक नियम और नीति को निर्धारित करने की आवश्यकता है, जैसा कि हमारे संविधान में, सभी धर्मों और संस्कृति को भित्ति चित्रों के माध्यम से दर्शाया और अपनाया गया है। परन्तु ये हमारा दुर्भाग्य है कि, हमारे, राजनेता, धर्मगुरु और सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन मात्र अपने स्वार्थ सिद्धि, तथा अभिमान के लिए आडम्बर फैला रहे हैं। रुढ़िवादी विचारों की वजह से व्यापारिक और अर्थ एवं पूंजीवादी दृष्टिकोण को स्थापित किया जा रहा है। उनके लिए लोकतंत्र और संविधान के आधार पर देशहित नहीं स्वयं हित सर्वोपरि है। खैर इन मुद्दों को रहने देते हैं, हम ज्ञान, भक्ति, और मोक्ष को समझने का प्रयास करते हैं।
मैं नाम लेकर मूर्खता से बचना चाहता हूं इसलिए संकेतो से बतलाता हूं कि, एक रजोगुणी और तमोगुणी राजनेता जी ने व्यासपीठ के कथावाचक से प्रश्न किया था कि कृष्ण का जब जन्म हुआ तो उनकी मां ने उन्हें सर्वप्रथम किस नाम से पुकारा था, शायद वो कथावाचक जवाब नहीं दे पाए थे। फिर उसी राजनेता ने इसका जवाब दिया कि घनश्याम नाम से पुकारा था, क्योंकि उनका रंग बादलों के जैसा श्यामवर्ण था, हो सकता है उन्होंने किसी चलचित्र में देखा हो, अथवा भाष्य ग्रन्थ में पढ़ा हो, लेकिन मैं भागवत पुराण के अनुसार बताऊं तो उनका जन्म गर्भ से नहीं हुआ था, वो अवतरित हुए थे, अपने सम्पूर्ण स्वरुप में, जो सोलह कलाओं से परिपूर्ण और दिव्य ज्योतिर्मय थे और फिर वासुदेव और देवकी जी के स्तुति करने पर वो अपनी योगमाया से माया स्वरुप में बालक शिशु का रूप धारण कर प्रकट हुए। और उनको आज्ञा दी कि वे उनके प्रति पुत्रभाव और निरंतर ब्रह्मभाव रखें। और रही बात मां यशौदा जी की तो सर्वप्रथम जब बालक रुपी भगवान पर उनकी नजर पड़ी होगी तो शायद कोई भी मां अपने पुत्र को पुत्र एवं लाला ही कहेगी, नामकरण तो बाद में होता है, भगवत पुराण में स्पष्ट वर्णन नहीं है इस प्रसंग का। और वर्ण व्यवस्था तो प्रत्येक युग में उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर हुआ जैसे कि सतयुग में सतोगुण, त्रेतायुग में सतोगुण, रजोगुण और द्वापर में सतोगुण रजोगुण और तमोगुण। वर्तमान के कलयुग में गुणों के आधार पर वर्ण का आंकलन करना असम्भव है। परन्तु अन्य प्रमुख ग्रंथो, पुराणों, वेदों उपनिषदों और स्मृति के अनुसार वर्ण व्यवस्था का जो प्रावधान रहा वो सप्त ऋषियों के द्वारा स्थापित हुआ। और जब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश अजन्मे है तो मानवों का भगवान के कुल और वर्ण का होना असम्भव है।
इसलिए मेरा प्रबुद्ध जनों एवं विद्वानों सहित साधू-संत और कथावाचकों से निवेदन एवं आग्रह है कि समाज में आडम्बर और भेद-भाव ना फैलाएं। तुम क्या भगवत कथा और राष्ट्र कथा करोगे, भगवान का नाम जप भी शुद्ध रूप में नहीं कर सकते। स्वयं को सुधारने का प्रयास करो ज्ञान और भक्ति का प्रचार प्रसार करो। ये आडम्बर और मोह माया के अर्थ को छोड़कर सनातन का रहस्य पहचानों, जिसमें हिन्दू,, मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध, आर्य सहित सभी धर्मों के लिए मोक्ष प्राप्त करने का रहस्य छिपा हुआ है।
संदेश एवं निष्कर्ष
यदि हम ज्ञान और भक्ति का निष्कर्ष अथवा भाव को संक्षिप्त रूप से समझने का प्रयास करें तो गीता का ज्ञान के अनुसार कृष्ण की भक्ति और राम की भक्ति के अनुसार ज्ञान की प्राप्ति होती है, क्योंकि गीता, रामायण अथवा रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों का मूल सार एवं उद्देश्य इन्हीं तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) के साथ तीन गुणों (सत्त्व, रज और तम) पर आधारित है। आप गीता और रामायण के पाठ से ज्ञान और भक्ति तो प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु मोक्ष नहीं।
मोक्षदायिनी मां होती हैं। माँ जगदम्बा जगत जननी है। इसलिए राधाकृष्ण और सियाराम के जप से ही मोक्ष की प्राप्ति होगी। सब योगमाया है जो योग और माया को समझ गया वो मोक्ष अवश्य ही प्राप्त कर लेगा। जय शिव शंकर पार्वती। शिव से पहले पार्वती नहीं ऐसा क्यों, जबकि राम से पहले सीता और कृष्ण से पहले राधा है। यही तो योग और माया है, महामाया है, योगमाया की महीमा है।
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