शनिवार, 13 अप्रैल 2019

।। ये कलम है ।।

कलम शब्दों के संसार में कागज़ की धरती पे बहती जिंदगी की स्याही है।

कलम का फ़क़ीर कह रहा है ये कलम है संसार का पहला और आखिरी हथियार, जिंदगी का प्रारम्भ और अंत।

निर्जीव भी सजीव भी आविष्कार कर्ता की निर्माण-कर्ता है या निर्माण-कर्ता की आविष्कारक।

संसार का पहला जीव सजीव है या निर्जीव विज्ञान को चुनौती देता कलम का फकीर।

ये कलम है समय का राजा, रंक और यही फ़क़ीर ये कलम है संसार का वर्तमान, भूत और यही भविष्य।

ये कलम है मानव का ज्ञान-विज्ञान और तकदीर, ये कलम है संसार का शून्य और शिखर यही।

ये कलम है शब्दों के संसार में कागज़ की धरती पे बहती जिंदगी की स्याही।।

शनिवार, 30 मार्च 2019

।। सावधान मतदाता ।।

मतदाता चार प्रकार के होते हैं। पहले दैनिक मजदूरी करने वाला व्यक्ति है, जैसे कि दुकानदार और निचले दर्जे के कर्मचारी, जैसे कि मैं और चौकीदार आदि। दूसरा व्यक्ति मध्यम वर्ग का है, जैसे कि प्रबंधक, क्लर्क और उच्च श्रेणी के कर्मचारी आदि। तीसरा उच्च वर्ग है, जैसे कि छोटे-बड़े व्यापारी, कलाकार, साहित्यकार, पत्रकार और दलाल। चौथा धर्मनिरपेक्ष और जातिवादी प्रकार के है, जैसे कि वरिष्ठ नागरिक, किसान और सेवानिवृत्त व्यक्ति आदि। पहले और चौथे प्रकार के मतदाताओं की मतदान में महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि वे राजनीति पसंद करते हैं और इस प्रकार के मतदाता अधिक संख्या में होते हैं। ये मतदाता केवल राजनेता की प्रतिबद्धता के बारे में देख रहे होते हैं और नेताओं के प्रलोभन के झांसे मे आसानी से फँस जाते है।
लेकिन, दूसरे और तीसरे प्रकार के मतदाताओं को यह गंदी राजनीति पसंद नहीं है और वे केवल दान और मतदान द्वारा राजनीति को स्थिर करना चाहते हैं। इस प्रकार राजनीति में मतदाताओं और मतदान के बारे में विशाल दृष्टिकोण और अवसर हैं। कृपया प्रलोभन में न आकर सही नेता और पार्टी (दल) का चुनाव करें। अब बात करते हैं नेता और पार्टी की, पार्टी तीन प्रकार की है, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और निजी स्तर की, जिसमें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों में नेताओं का स्तर भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय रूप में होता है। क्षेत्रीय स्तर के नेता अपनी प्रतिबद्धता और समाज सेवा के द्वारा अपनी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करते हैं। कुछ निजी दल के स्वतंत्र नेता है जिनका कार्य समर्थन और अ-समर्थन के द्वारा राजनीति को स्थिर करना होता है।
अंततः निष्कर्ष यह निकलता है कि पहले और चौथे प्रकार के मतदाताओं का रुझान, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल तथा नेताओं की और अधिक होता है क्योंकि इनके द्वारा मतदाताओं को अत्यधिक प्रलोभन और झांसा प्रदान किया जाता है। नेताओं का दृष्टिकोण समाज सेवा और राष्ट्र सेवा की ओर होना चाहिए, मगर आज के भूमंडलीकरण के दौर में नेता निजी स्वार्थ और विश्व में अपनी पहचान स्थापित करने और सत्ता में अपने आप को उच्च पद पर स्थापित करने के लिए राजनीति का व्यापार कर रहे हैं। ऐसे नेताओं के लिए समाज सेवा और राष्ट्र सेवा का कोई मतलब नहीं होता है। ये सिर्फ अपने और अपनी पार्टी (दल) की सेवा और विकास मे लगे रहते है। इस प्रकार के नेताओं से और पार्टियों से मतदाताओं को बच कर रहना आवश्यक है। सावधान मतदाता लोभ और झांसे में न आकर उनका ही चुनाव करें जो सच के कसौटी पर खरा हो। सोने का निर्माण सैकडों वर्षो के प्रक्रीया के उपरांत होता है। और सोने के सौ टुकड़े करने से उसका मूल्य कम नहीं होता है। इसी प्रकार से जो सैकडों वर्षो से राजनीति में स्थापित है, जो सच न बोले लेकिन झूठ बोल कर लोभ और झांसा न दे, जिनका जीवन दर जीवन समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित हो जिन्होंने बलिदान त्याग और सच का राह चुना है आप उसी का चुनाव करें। हमें शिक्षित और सम्मानित नेतृत्व की जरूरत है। आज के समय में सच्चे का मुहँ काला और झूठे का बोल बाला है। हम भारतवासी सदैव विश्व में सत्य, त्याग और तपस्या के लिए उदाहरण हैं। हमारा इतिहास सनातन और स्वर्णिम है। जय हिंद जय भारत।

रविवार, 17 मार्च 2019

चौकीदार एक मज़ाक

चौकीदार के बारे में मज़ाक न करें, क्योंकि मेरी माँ और पिता भी चौकीदार हैं, और वे एक अच्छे जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। किसी के पास राजा की तरह समृद्ध जीवन है, वह कभी चौकीदार नहीं था, फिर वह चौकीदार के संघर्ष को कैसे जान सकता है। केवल वह चौकीदार को निर्देशित कर सकता है, चौकीदार की तरह काम नहीं कर सकता। चौकीदार की कई मजबूरीयां होती हैं। वह अपने मालिक के लिए ईमानदार, सतर्क और ग़ुलाम होना चाहिए। वह अपने कर्तव्य के बारे में कोई स्व-निर्णय नहीं ले सकता है। वह केवल अपने मालिक और उसके संपत्ति की सुरक्षा के लिए बाध्य है। यदि एक चौकीदार एक अधिकारी और अमीर बन जाएगा, तो इसका मतलब है कि वह चौकीदारी के स्थान पर कुछ और काम कर रहा है। अर्थात वह कोई भ्रष्टाचार या संघर्ष कर रहा है। संघर्ष के कई प्रकार हैं। भ्रष्टाचार और अच्छे और बुरे काम संघर्ष का हिस्सा हैं। कौन अधिकारी और अमीर से चौकीदार बनना चाहता है। यह केवल एक प्रचार और आडम्बर है। यदि हम किसी अधिकारी और अमीर का मज़ाक बनाए तो उसका अपमान होगा, और वो हम चौकीदारो पर मानहानि का दावा करेगा लेकिन चौकीदार को चोर और न जाने क्या- क्या बोल कर मज़ाक बनाया जा रहा है। परिस्थितियां मनुष्य को चौकीदार, अमिर या गरीब और अधिकारी बनाती है। परिस्थिति कुछ भी हो सकती है। लेकिन आज की स्थिति और परिस्थिति के अनुसार कोई भी किसी का दास नहीं बनना चाहता। मजबूरी में कोई किसी का दास बनता है, और यदि अधिकारी और राजा ही मजबूर हो तो वो प्रजा (जनता) को उसका हक और अधिकार न तो दिला सकता है और न ही दे सकता है। गंगा उलटी दिशा में नहीं बह सकती, राजा जनता का चौकीदार कभी नहीं हो सकता है क्योंकि चौकीदारी का काम जनता का है राजा का नहीं, राजा को तो एक प्रधान न्यायाधीष और सेनापति होना चाहिए। यदि राजा अपने आप को चौकीदार कहता है तो इसका मतलब साफ है की वो किसी का दास (ग़ुलाम) है और वो जनता की नहीं बल्कि अपने मालिक की चौकीदारी कर रहा है। और यदि चौकीदार खुद को राजा कहता है तो इसका मतलब की वो कोई भ्रष्टाचार या षडयंत्र कर रहा है। सीधी बात है मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, परिस्थितियां मनुष्य की दास होनी चाहिए। जनता अपने संघर्ष मे व्यस्त है और राजा जनता के संघर्ष और खून पसीने की कमाई को अपने मालिक के लिये खर्च करने में व्यस्त और मस्त है। बाकी बहुत कुछ और है, इस मुद्दे पर बात करने के लिये। सोच तो शुरू हुई है समझ अभी बाकी है और समझ समय के हिसाब से लाख ठोकरों और संघर्ष के बाद आती है। इतिहास गवाह है, राज-तंत्र में तानाशाह होते है। लोकतंत्र और राजतंत्र में मूल फर्क यही है कि आप लोकतंत्र में अपने पसंदीदा व्यक्ति का चुनाव करते है देश या राज्य का नेतृत्व करने के लिए। और जब हम चुनाव कर लेते है तो ये पसंदीदा व्यक्ति लोकतंत्र के सहारे से राजतंत्र को स्थापित करते है। और राजतंत्र में शासक वर्ग नेतृत्व का चुनाव करता है। लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति को लोकतंत्र के गणतंत्र को बचाना चाहिए। हमें भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ निष्पक्ष लोकतंत्र न्यायपालिका और निर्णय की आवश्यकता है। किसी चौकीदार की जरूरत नहीं है। जय हिंद।

पेपर लीक का असली जिम्मेदार कौन?, शिक्षा व्यवस्था या सिस्टम?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बदलाव, चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता भारत की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं और आगे भी होत रहने च...