चौकीदार के बारे में मज़ाक न करें, क्योंकि मेरी माँ और पिता भी चौकीदार हैं, और वे एक अच्छे जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। किसी के पास राजा की तरह समृद्ध जीवन है, वह कभी चौकीदार नहीं था, फिर वह चौकीदार के संघर्ष को कैसे जान सकता है। केवल वह चौकीदार को निर्देशित कर सकता है, चौकीदार की तरह काम नहीं कर सकता। चौकीदार की कई मजबूरीयां होती हैं। वह अपने मालिक के लिए ईमानदार, सतर्क और ग़ुलाम होना चाहिए। वह अपने कर्तव्य के बारे में कोई स्व-निर्णय नहीं ले सकता है। वह केवल अपने मालिक और उसके संपत्ति की सुरक्षा के लिए बाध्य है। यदि एक चौकीदार एक अधिकारी और अमीर बन जाएगा, तो इसका मतलब है कि वह चौकीदारी के स्थान पर कुछ और काम कर रहा है। अर्थात वह कोई भ्रष्टाचार या संघर्ष कर रहा है। संघर्ष के कई प्रकार हैं। भ्रष्टाचार और अच्छे और बुरे काम संघर्ष का हिस्सा हैं। कौन अधिकारी और अमीर से चौकीदार बनना चाहता है। यह केवल एक प्रचार और आडम्बर है। यदि हम किसी अधिकारी और अमीर का मज़ाक बनाए तो उसका अपमान होगा, और वो हम चौकीदारो पर मानहानि का दावा करेगा लेकिन चौकीदार को चोर और न जाने क्या- क्या बोल कर मज़ाक बनाया जा रहा है। परिस्थितियां मनुष्य को चौकीदार, अमिर या गरीब और अधिकारी बनाती है। परिस्थिति कुछ भी हो सकती है। लेकिन आज की स्थिति और परिस्थिति के अनुसार कोई भी किसी का दास नहीं बनना चाहता। मजबूरी में कोई किसी का दास बनता है, और यदि अधिकारी और राजा ही मजबूर हो तो वो प्रजा (जनता) को उसका हक और अधिकार न तो दिला सकता है और न ही दे सकता है। गंगा उलटी दिशा में नहीं बह सकती, राजा जनता का चौकीदार कभी नहीं हो सकता है क्योंकि चौकीदारी का काम जनता का है राजा का नहीं, राजा को तो एक प्रधान न्यायाधीष और सेनापति होना चाहिए। यदि राजा अपने आप को चौकीदार कहता है तो इसका मतलब साफ है की वो किसी का दास (ग़ुलाम) है और वो जनता की नहीं बल्कि अपने मालिक की चौकीदारी कर रहा है। और यदि चौकीदार खुद को राजा कहता है तो इसका मतलब की वो कोई भ्रष्टाचार या षडयंत्र कर रहा है। सीधी बात है मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, परिस्थितियां मनुष्य की दास होनी चाहिए। जनता अपने संघर्ष मे व्यस्त है और राजा जनता के संघर्ष और खून पसीने की कमाई को अपने मालिक के लिये खर्च करने में व्यस्त और मस्त है। बाकी बहुत कुछ और है, इस मुद्दे पर बात करने के लिये। सोच तो शुरू हुई है समझ अभी बाकी है और समझ समय के हिसाब से लाख ठोकरों और संघर्ष के बाद आती है। इतिहास गवाह है, राज-तंत्र में तानाशाह होते है। लोकतंत्र और राजतंत्र में मूल फर्क यही है कि आप लोकतंत्र में अपने पसंदीदा व्यक्ति का चुनाव करते है देश या राज्य का नेतृत्व करने के लिए। और जब हम चुनाव कर लेते है तो ये पसंदीदा व्यक्ति लोकतंत्र के सहारे से राजतंत्र को स्थापित करते है। और राजतंत्र में शासक वर्ग नेतृत्व का चुनाव करता है। लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति को लोकतंत्र के गणतंत्र को बचाना चाहिए। हमें भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ निष्पक्ष लोकतंत्र न्यायपालिका और निर्णय की आवश्यकता है। किसी चौकीदार की जरूरत नहीं है। जय हिंद।