मंगलवार, 16 सितंबर 2025

Earning, Jobs, Business, Corruption, Politics, धर्म-जाति और हमारी Economy का सच क्या है ?

 "नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका आज के रचनात्मक मुद्दे में, यहां हम बात करेंगे earning, jobs, business, corruption, politics, धर्म-जाति और हमारी economy की सच्चाई के बारे में।

मैं यहां सिर्फ सांकेतिक तथ्यों को उजागर करुंगा बाकी उदाहरण और तथ्य आपको सोशल मीडिया, निजी आंकलन और सरकारी आंकड़ों के माध्यम से प्राप्त हो जाएगा।

आर्टिफिशियल कोरोनावायरस ने विश्व में मानव और मानवता से संबंधित, रिश्ते-नाते, दोस्ती-यारी और दुनियादारी सबकुछ समाप्त करने का प्रयास किया था लेकिन जिन मुद्दों की मैं बात कर रहा हूं वो शायद इस वायरस से ज्यादा खतरनाक है।

अक्सर हमारे दिमाग में ये सवाल आता है कि अगर किसी को कमाने का ख्याल आए, तो वो क्या चुनेगा? नौकरी करेगा, या फिर बिज़नेस? और जब वो इस रास्ते पर निकलता है, तो उसे किन-किन मुश्किलों, भ्रष्टाचार और टैक्स के जाल से गुजरना पड़ता है।

आज हम इन्हीं सब सवालों पर बात करेंगे — बिना घुमाए-फिराए, सीधे शब्दों में।"

भारत एक युवा देश है।

65% आबादी 40 साल से कम उम्र की है।

लेकिन सवाल ये है कि –

इतनी बड़ी आबादी के पास रोज़गार और व्यापार के अवसर क्यों नहीं हैं?

"जब भी किसी इंसान को कमाने का ख्याल आता है, सबसे पहला सवाल उसके सामने यही खड़ा होता है कि नौकरी करूँ या बिज़नेस?

नौकरी में fixed salary है, थोड़ी security और limited growth होती है। वहीं बिज़नेस में risk ज़्यादा है, लेकिन कमाने की ceiling नहीं है, आप जितना मेहनत करेंगे उतना ही सफल होंगे।

लेकिन इंडिया में समस्या ये है कि educated लोग भी नौकरी की लाइन में लग जाते हैं क्योंकि system ने उन्हें risk लेने से डरा दिया है।"

व्यापार के लिए रिस्क लेना भी सबसे बड़ा रिस्क है, क्योंकि भारत मे धारणा है कि, व्यापार सिर्फ लाला बनिए ही कर सकते है। जिसका नतीजा यह है कि सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है।

यदि अपवाद के रूप में कुछ अन्य जाति वर्ग  के लोगो ने व्यापार करते हुए राष्ट्रनिर्माण में अपना सहयोग प्रदान किया है या कर रहे हैं तो, उनका भी व्यापारिक भागीदारी भारत में कम विदेशों में ज्यादा है। 

अब मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे अत्याचार या अराजकता के विषय पर चर्चा नहीं करुंगा, क्योंकि नेपाल, बंगला देश, श्रीलंका में जनता ने विरोध प्रदर्शन करते हुए तानाशाही और भ्रष्टाचार को खत्म करने का सफल प्रयास किया है।

और ना ही मैं किसी युद्ध अथवा संघर्ष की चर्चा करुंगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मिडिया और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इन सभी मुद्दों को दुनिया के सामने उजागर किया गया है। हमारे यहां तो सिर्फ व्यक्ति विशेष को ही मिडिया में दिखाया जाता है।

Tangible मूर्त और अमूर्त Intangible Businesses और Skilled Jobs क्या है। Business और नौकरी सिर्फ एक type का नहीं है।

👉 Tangible Businesses – जो physical product se जुड़े हैं:

जैसे manufacturing, दुकानदारी, FMCG, agriculture based ventures. आदि 

👉 Intangible Businesses – जो services, ideas, ya digital platforms पर चलते हैं:

जैसे consultancy, software development, digital marketing, content creation, finance advisory, share market आदि 

अब आते हैं Jobs पर –

👉 Skilled Jobs: doctor, engineer, architect, technician, IT professional आदि – जिनमें specific training/education चाहिए।

👉 Productive Jobs: जो directly production aur services में value create करते हैं – जैसे teachers, nurses, artisans, farmers, delivery workers. आदि 

तो आज का youth इन options के बीच continuously confused है।

India की reality देखिए –

👉 Population 140 करोड़ से ऊपर,

👉 लेकिन quality jobs इतनी नहीं हैं।

हर साल लाखों graduate निकलते हैं, लेकिन उनकी skills market demand से match नहीं करती।

Result यह है कि,

Overqualified लोग छोटी-छोटी jobs कर रहे हैं।

Underqualified लोग desperate होकर किसी भी काम में लग जाते हैं,

और educated unemployed का सबसे बड़ा crowd India में है।

भारत में जनसंख्या वृद्धि के साथ ही पढ़ें लिखे बेरोजगारों की तादाद बहुत ज्यादा है।

Opportunities हैं, लेकिन सही दिशा में नहीं।

Business ecosystem इतना friendly नहीं है कि हर youth confidently startup शुरू कर दे।

अब तक कि सरकारें Employment & Business क्यों नहीं ठीक कर पाईं ?

क्यों सरकार Employment और Business Creation में Fail होती रही है।

अब बड़ा सवाल यह है कि जितनी भी अब तक कि सरकारें हैं वो बार-बार fail क्यों हो रही है?

इसका कारण यह है कि।

👉 Policy aur ground reality में gap है।

👉 Bureaucracy aur corruption हर अच्छे plan को slow कर देते हैं।

👉 Skill development schemes सिर्फ papers पर चलती हैं, execution weak है।

👉 Taxation aur licenses इतने complex हैं कि small business owner डर जाता है।

जिसका नतीजा यह होता है कि हमारे पढ़ें लिखे युवा या तो abroad चला जाता है, या फिर frustrated होकर किसी भी average job में adjust कर लेता है।

System इतना biased है कि…

👉 जो government के close हैं, dalali aur chamchagiri karte hain, उन्हें आसानी से contract, license, business opportunity मिल जाती है। ये पहले भी होता था लेकिन अब हद से ज्यादा हो रहा है।

बेरोजगारी का आलम ऐसा है कि, पढ़ा लिखा नौजवान रेहड़ी पटरी पर छोटा-मोटा धंधा कर रहा है, या फिर उच्च शिक्षा प्राप्त कर विदेशों में नौकरी कर रहा है, और नहीं तो तस्करी और विभिन्न प्रकार के अपराध करने पर मजबूर है।

 या फिर हम अपने देश के लालाओं और व्यापारियों की गुलामी कर रहे है,

 अब तो, सुनने में आ रहा है कि सरकार श्रम कानून में संशोधन के माध्यम से, काम के घंटे को सप्ताह में 48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे करने जा रही है, इतना ही नहीं विरोध करने के लिए कर्मचारी यूनियन के अधिकारों को भी समाप्त किया जा रहा है। जो दुनिया में मानवता के खिलाफ है। अमानवीय कृत्य है।

👉 बाकी लोग, चाहे कितना ही सक्षम हों, मजदूरी या मजबूरी में job करते रहते हैं।

यानी merit योग्यता से ज्यादा “setting” aur “jugaad” काम करता है।

और इसी को बनिया-बुद्धि कहते हैं, इतिहास गवाह है ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से अंग्रेज़ भी व्यापारी अथवा बनिया बन कर भारत में व्यापार करने आए थे, और फिर देश के कुछ दलालों और व्यापारिक लाला बुद्धि के व्यक्ति विशेष के मदद से, फूट डालो राज करो की निति से हमें गुलाम बना लिया था।

बहुत मुश्किल से आजादी मिली है, लेकिन आज फिर हम बनिया और लाला बुद्धि के कारण, आपसी मतभेद और राजनीतिक साजिश का शिकार होने के लिए विवश हैं। 

गलती हमारी नहीं, बल्कि हमारे भोग-विलास, आत्मदंभ और आत्ममुग्धता के साथ ही चरित्रहीनता की है।

Jumle aur Tax के जरिए जनता को कैसे लुभाया और लूटा जा रहा है। समझने की कोशिश करें।

Politicians जनता को जुमलों और सपनों से लुभा कर लूट रहे हैं – जैसे कि 

“15 लाख आएंगे”, “2 करोड़ jobs आएंगी”, “Make in India”, “Digital India” …

लेकिन ground पर reality कुछ और होती है।

जो काम थोड़ा-बहुत होता भी है, उसके लिए भी जनता से tax वसूला जाता है।

यानी जनता अपना ही पैसा देकर फिर से facilities खरीद रही है। और ये नालायक नेता एवं सामाजसेवी अपने भाषणों और जुमलों में जनता के सामने किसी सार्वजनिक योजना और राष्ट्रहित में किये गये कार्यों के लिए ऐसा उल्लेख करते हुए कहते है कि मानो की जैसे अपने तनख्वाह और जमीन जायदाद को जनमानस के भलाई के लिए खर्च कर दिया हो।

Businessmen GST और  multiple compliance से जनता परेशान हैं,

Job करने वाला income tax के  चक्कर में फँसा है।

और ऊपर से सरकार हर काम के लिए जनता से पैसा लेती है – roads बनाने हों या सरकारी schemes चलानी हों।

इसीलिए हर आदमी भारत में politician या फिर समाजसेवी बनना चाहता है, राष्ट्र सेवा और जनता के समस्या को दूर करने के लिए नहीं बल्कि,

Luxury lives, VIP culture, security cover और foreign trips enjoy करने के politician और समाजसेवी बनना चाहता है। उसे भोग-विलास, आत्मदंभ और आत्ममुग्धता के साथ ही अपने चरित्रहीनता का आनन्द लेना है इसलिए वो एक नेता बनान चाहता है 

पहले से ही ऐसा सिस्टम चलता आ रहा है, लेकिन वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों, नागरिक कर्तव्यों और सामाजिक एवं सांस्कृतिक ढांचे को इस कदर ध्वस्त किया जा रहा है कि, जनता आपसी मतभेद और राजनीतिक साजिश का शिकार हो रही है। 

विदेशों में रहने वाले, नौकरी और व्यवसाय करने वाले भारतीय को भी हमारे नालायक नेताओं द्वारा बरगलाया जा रहा है, नेता विदेशों में जाकर राष्ट्रभक्ति के साजिश के तहत अपनी जय जयकार कराते हैं, जिसका नतीजा यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय अपने विदेशी कर्मभूमि एवं जन्मभूमि के प्रति निर्धारित दायित्वों को भूलकर नेताओं की जय जयकार कर रहे हैं। 

जिसका घातक परिणाम यह हुआ है कि, इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में नागरिकता प्राप्त कर चुके भारतीय को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

सबसे dangerous point यही है –

सरकारें अपनी नाकामियों को corruption (भ्रष्टाचार), dalali  (दलाली) jumlon (जुमलों) और criminalization से cover करती है।

जैसे कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर जो भी राजनीतिज्ञ, व्यापारी और समाजसेवी इमानदारी से काम करेंगे और आम जनता के भलाई के लिए योजनाएं बना कर लागू करेंगे उन्हें, कानून में बदलाव करके अथवा निजी तौर पर प्रताड़ित करके अपमानित किया जा रहा है। इसके तमाम उदाहरण है, जिससे हमारे न्यायिक और प्रशासनिक अधिकारीयों के साथ ही नियामक संस्था भी मजबूर होकर भ्रष्टाचार का समर्थन कर रहे हैं।

मैं उदाहरण के लिए किसी नेता, व्यापारी, धर्म अथवा जाती का नाम लेकर वाद-विवाद नहीं करना चाहता हूं, क्योंकि मैं खुद प्रबुद्ध वर्ग, और हिन्दू धर्म से संबंध रखता हूं।

अपने इमानदारी और बेबाकी का नतीजा भुगते हुए नौकरी और व्यापार दोनों में साजिश का शिकार होकर, बेरोजगारी और भुखमरी के कगार पर हूं।

👉 और ये दुष्चक्र जनता तक पहुँच गया है।

आज honest इंसान survive नहीं कर पाता।

मजबूरी में लोग भी रिश्वत, dalali, चोरी, illegal काम करने लगते हैं।

System ऐसा बन चुका है कि 

जो बनिया-बुद्धि, दलाली और लालागिरी में माहिर हैं, वही फायदा उठा रहे हैं।

Contractor, middleman, aur political links वाले लोग घुमा-फिरा कर पैसा बना लेते हैं।

लेकिन 

Common आदमी चाहे कितना भी इमानदारी से काम करे, उसे बार-बार bureaucracy और tax structure  के चुंगल में फंसना पड़ता हैं।

यानी हमारे लिए एक ऐसा सिस्टम तैयार किया गया है जिसमें indirectly जनता को भी corrupt बनाया जाता है।

ये सिर्फ आर्थिक failure नहीं, moral failure अर्थात नैतिक असफलता भी है।

क्योंकि जनता को सरकार ने कर्ज देकर, टेक्स के पैसों से मुफ्त सुविधा देकर, सस्ते दामों पर शराब और मुफ्त का राशन आदि जैसे सुविधा देकर, मौजूदा भ्रष्ट सिस्टम के अनुसार जिंदगी बिताने पर मजबूर कर दिया है।

धार्मिक उन्माद और क्षेत्रवाद

"एक और बड़ी समस्या है — धार्मिक और क्षेत्रीय राजनीति भी केन्द्रीय राजनीति के द्वारा व्यवसायिक बना दिया गया है।

मतलब कि हम अपने क्षेत्र के गांव शहर में जल, जंगल, और जमीन को निजी या सार्वजनिक रूप से उपयोग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सब व्यवसायिक बनाया जा रहा है।

जब भी जनता रोजगार और रोज़मर्रा की परेशानियों की बात करती है, नेताओं के पास कोई ठोस जवाब नहीं होता।

तब क्या किया जाता है?

कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर लोगों को बाँटा जाता है,

कभी क्षेत्रवाद (North vs South, Bihari vs Marathi, Outsider vs Insider) को हवा दी जाती है।

इसका सीधा असर jobs और business पर पड़ता है। आजकल अखबारों में नौकरियों से संबंधित इश्तिहारों के लिए जगह बहुत कम होती जा रही है, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से संबंधित समाचार तथा तथ्यात्मक खबरें प्रतिष्ठित अखबार न्यूज चैनल आदि में ना के बराबर है, लेकिन सरकारी जुमलों, और नेताओं के व्यक्तिगत राजनीति से संबंधित ख़बरों का बोलबाला है, एक तरह से हम कह सकते हैं कि, नोट बंदी और डिजिटलाइजेशन और प्राइवेटाइजेशन के माध्यम से आम जनता, प्रबुद्ध वर्ग, और ईमानदारों को घुटनों के बल पर खड़ा कर दिया गया है। 

यदि आपने इस प्रकार के भ्रष्टाचार, और अनियमितता के खिलाफ बोलने या फिर कार्यवाही करने का सोचा तो कोई फायदा नहीं क्योंकि आप जिस अदालत या अधिकारी अथवा नेता से शिकायत करेंगे वो पहले ही मजबुर होकर भ्रष्टाचार करने और गुलामि करने के लिए तैयार है। बाकी आप खुद समझदार हैं, कि क्या हो रहा है और क्या हो सकता है। 

जो youth skill और मेहनत से आगे बढ़ सकता है, उसे caste, धर्म और language के नाम पर बरगला कर विचलित किया जाता है।

नतिजा यह होता है कि, असली मुद्दे गायब हो जाते हैं, और जनता आपस में लड़ती रहती है।"

"अब बात करते हैं परिवारवाद और जातिगत आरक्षण की।

राजनीति और नौकरशाहि में परिवारवाद ने system को पूरी तरह से घेर लिया है। नेता और नौकरशाह बनते ही पूरे परिवार को कुर्सी और ठेका मिलता है।

Merit योग्यता की जगह surname और relation ज़्यादा काम करता है।

आजकल विश्व में भारत के सनातन संस्कृति, विद्वानों और अविष्कारों से ज्यादा भारत के नेताओं, दलालों और व्यापारियों का बोलबाला है, जो black को white करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। मतलब धंधा करना है तो चंदा देना है।

जिसका ताजा उदाहरण electoral bonds Scam है।

व्यक्तिगत, जातिगत समीकरण के आधार पर राजनीति करने वालों नें, आम जनता का हाल ऐसा कर रखा है कि, ना समय पर नौकरी मिलती है, ना स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध है, और ना ही कोई व्यापार के लिए ठोस व्यवस्था है, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रोजगार और व्यापार को सरकार ने लाला और बनियों का दुकान बना दिया है।

 निजीकरण के माध्यम से जनता को एक व्यक्ति विशेष के समुदाय का गुलाम बनने और जी हजुरी करने पर मजबूर कर दिया है।

परिवर्तन जरूरी है, लेकिन ऐसा परिवर्तन किस काम का जो, हमारे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को ध्वस्त कर दे।

हर एक क्षेत्र में निजीकरण हो रहा है जिसका परिणाम यह है कि, यदि नौकरी और व्यवसाय मिल भी जाए तो जनता को समय पर जरुरत पड़ने पर ना तो तनख्वाह (Salary) मिलती है और ना ही व्यापार से लाभ मिलता है। यहाँ तक की gratuity और बोनस भी अब नहीं मिलता क्योंकि आपको कान्ट्रैक्ट के तौर पर नौकरी मे रखा जाता है,

राम नाम सुखदाई है, लेकिन जब इस नाम का राजनीतिकरण किया जाता है तो बहुत ही दुखदाई है।

अब Reservation के मुद्दे पर विचार करें तो।

Reservation शुरू हुआ था social justice और बराबरी के लिए — जो बिल्कुल सही था।

लेकिन आज system इतना caste-centric हो गया है कि,

Reservation को हर बार political weapon बनाया जाता है।

सवाल यही है –

क्या हम अपनी youth power को ऐसे ही waste करेंगे, और कर्ज, और व्यक्ति विशेष से संबंधित राजनीति का शिकार बनते रहेंगे?

या फिर – fair opportunities, transparent system aur corruption-free governance? की demand करेंगे।

काबिल और deserving candidates भी निराश हैं,

वहीं जिनको सुविधा मिलनी चाहिए, वो भी सही से फायदा नहीं उठा पा रहे। जिसका कारण व्यक्तिगत राजनीति और गुटबाजी है।

Result ये है कि employment और business opportunities caste और family politics में उलझ कर रह जाती हैं।"

आखिर समाधान क्या है?

"तो दोस्तों, ये थी हमारे देश की economy (अर्थव्यवस्था), jobs (नौकरी), business (व्यापार) और सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दे की पूरी सच्चाई, जिसने हमारी अर्थव्यवस्था को आर्थिक रूप से कागज़ी आंकड़ों के माध्यम से विश्व में चौथे स्थान पर स्थापित कर दिया है, लेकिन बेरोजगारी, और राशन भत्ते के आधार पर आज भी हमारे देश में लगभग 87  करोड़ जनता गरीब है। 

Youth energetic है, capable है, हर एक कार्य करने में सक्षम है।

लेकिन नेता और उनके चमचों ने हम सबको धर्म, जाति, राजनीति और corruption में उलझाए हुए है।

लेकिन फिर भी हम कह सकते हैं कि बदलाव सम्भव है। – यदि हम,

Education और skills पर ज़ोर देते हुए अवसर उत्पन्न करें, रोजगार और व्यापार का आसान  साधन प्रदान करें तो फिर कुछ हद तक परिणाम बेहतर होगा।

Politics में transparency और accountability होनि चाहिए।

Reservation और क्षेत्रीय राजनीति से ऊपर उठकर merit-based approach होना चाहिए।

और सबसे ज़रूरी – जनता का धार्मिक उन्माद और caste-based politics से बाहर आना होगा।

हमारे नौजवानों को मुफ्तखोरी, नशाखोरी, चुगलखोरी, गुटबाजी, दलाली, जातिवाद और चरित्रहीनता का त्याग करना पड़ेगा।

क्योंकि जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक system दलाली और जुमलों पर ही चलेगा।"

आंकड़े और दस्तावेज सिर्फ जनता को बरगला कर अच्छे दिन दिखाने के लिए हैं। 

हमारे यहां चायवाले के पास भी आपको पिएचडी तक की डिग्री मिल सकती है, और एक जिलाबदर जिले का सांसद बन कर सारे जिले को दर-बदर कर सकता है। ऐसे चमत्कार और विडम्बनाएं भारत में सम्भव है।

मशहूर शायर, लेखक और शिक्षक राहत इंदौरी ने कहा है।,

बनके एक हादसा बाजार में आ जायेगा

जो नहीं होगा वो अखबार में आ जायेगा।

चोर उचक्कों की करो कद्र, की मालूम नहीं

कौन, कब, कौन सी सरकार मे आा जायेगा।

दोस्तों मैंने अपने शब्दों में वर्तमान परिस्थितियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया है।

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अगली बार हम और भी मुद्दों पर खुलकर बात करेंगे।

तब तक सवाल पूछते रहिए, सोचते रहिए, और बदलाव की कोशिश करते रहिए।

धन्यवाद!"

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