गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

चतुर्चरित्र चाटूकारिता (sycophancy)

 

पढने में अनौपचारिक कुछ अटपटा शब्द र्शीषक है। आगे इसके अटपटेपन के खटकने वाले यर्थात से अपको अवगत कराने का एक हास्यास्पद विवरण प्रस्तुत है।

वैसे असली चाटूकारों की जमात जनता के बिच उपस्थित बिचौलिऐ, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और कपटी नौकरी पेसा कर्मचारियों के साथ साथ निठल्ले वयक्तियों का समूह है, जो चाटूकार के श्रेणीबद्ध क्रम में निचले पायदान का निरकुंश, किंकर्तव्यविमूढ़ है। जिसका कोई चरीत्र नहीं है, जो जितना बड़ा चाटूकार होगा उसको सफलता उतने ही बडे स्तरों पर मिलती है फिर ये नेता, और भ्रष्ट अधिकारी आदि बन जाते है।

 निम्नलिखित श्रेणीबद्ध क्रम में पहला  संबोधन, पहले उच्च श्रेणी के चतुर चरित्र राज-नेता एवं तथाकथित समाजसेवी और प्रबुद्ध पत्रकारों का है, जो हमेशा किसी खास व्यक्ति विशेष अथवा समूह को निर्देशित करने में अपने वाकपटूता का भरपूर दुरूपयोग करतें हुए चाटूकारों की एक नई श्रेणी का निर्माण करते हैं।

थोड़ा सा कम अवल दर्जे के चाटूकार व्यवसायिक अथवा प्रबंधन से संबंधित व्यक्ति विशेष है जिनका कार्य उपरोक्त वर्णित सभी पहले उच्च श्रेणी के चतुर चरित्र राज-नेता  एवं तथाकथित समाजसेवी और प्रबुद्ध पत्रकारों की चाटुकारिता करते रहना है जिसके फलस्वरूप इनको व्यवसाय और प्रबंधन के लिए संरक्षण के साथ ही नये चाटुकारों का निर्माण करने में सहजता हो जाऐ। क्योंकि ये कानूनी तौर पर दलाली और कालाबाजारी के लिए कुछ आर्थिक और कानूनी निर्देशक कर्मचारीयों की नियुक्ति करके अपने व्यवसाय के साथ ही स्वयं को उच्च श्रेणी के चाटूकारों की श्रेणी में शिरोमणि स्थान पर दर्ज कर पाऐंगे।

फिर अंततः चाटूकारों के श्रेणी का विशाल समूह जिसको हम आमजनता अथवा जनता जनार्दन कहते है उनका क्रम आता है, जिसको जनार्दन का अर्थ ही नहीं पता। जनमानस को चाटूकारिता से छुटकारा मिलेगा तभी शायद जनार्दन होने का कर्तव्य पूरा होगा।

शायद इसका अर्थ हमारे महापुरुषों को पता था, जयप्रकाश नारायण, मोहनदास करमचंद गांधी, एवं अन्य जिन्होंने देश में तानाशाही का विरोध किया जनता को जागरूक किया और चाटूकारिता के चंगुल से आज़ाद किया।

शहीद मंगल पाण्डेय, शहिद भगत सिंह, एवं अन्य को चाटुकारिता नहीं बल्कि एक सक्षम चरीत्र, आत्म सम्मानित और निर्भिक नागरिकता के लिए स्वयं को सत्य, साहस के आहूति में समर्पित करना पड़ा। इन सबके आहूति का कारण देश के कुछ चंद उच्च श्रेणी के चाटुकार थे।

वर्तमान में इस शब्द की प्रकाष्ठा जनमानस को निरकुंशता, किंकर्तव्यविमूढ़ता के रूप मे कुछ इस कदर प्रभावित कर चूकी है की, सत्य, साहस के साथ ही जनता अपने आत्मसम्मान को भूल कर सामाजिक स्तर पे विभिन्न समूहों में विभाजित होकर, चाटुकारिता और जूमलो में व्यस्त है।

इस शब्द का विवरण विस्तार से वर्णित करने के लिए मेरे पास समय का अभाव है।

संक्षेप में कहा जाये तो इसके बगैर कोई कार्यवाही कार्यान्वित हो ही नहीं सकती है। सब अपने चरित्र को वाक-पटूता के जरिये अथवा छल, कपट, नही नहीं श्रीमान सिधा, साफ कहा जाये तो चाटूकारिता ही कार्यसिद्धि का मूल मंत्र है।

आज रास्ते में जाते हुऐ एक गाय माता और कुत्ते का मिलना हुआ जिनको मैने रास्ते से हटाने के लिये थोड़ा सहज शब्दों में हुलकार करते हुए हुल्लड़ किया फिर क्या था बस दोनों काटने और मारने के लिए मेरे पिछे दौड पडे, जबकि मुझे चतुर चरीत्र का परिचय देते हुए थोड़ा उनके सामने चाटुकारिता पूर्ण वयवहार करना चाहिए था।

गूरू, अभिभावक और भगवान के लिए चाटूकारिता की नहीं चयनित करने के भाव को महत्व देना चाहिए। जैसा देव वैसी पूजा, जैसे गुरु वैसी दक्षिणा। और अभिभावक के अनुसार खुद को ढालो नहीं ढल सकते हो तो अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाओ। 

स्मार्ट वर्क बनाम ईमानदार काम, कुशल बनाम अनुभवी, हर एक अनुभव और कार्य बेकार है, अगर आपके पास चाटूकारिता की कला नहीं है। 

हर कार्य में एक टीम वर्क होता है, हर टीम में एक लीडर होता है और सभी कंपनी में एक बास होता है। लीडर हमेशा लीडर ही रहेगा और बास हमेशा बास, कयोंकि आपके किये गए कार्य का महत्व आपको नहीं बल्कि आपके बास को टीम लीडर को मिलता है। कार्य फल उसे ही मिलेगा

यदि आप अच्छे चापलूस और कुशल चाटूकार है तो आप भी बास, और एक टीम लीडर बन सकते है। जबकि आपकी रणनीति यह होनि चाहिए कि अपने कार्य के लिए स्वयं जिम्मेदारी लेनी होगी, अपना बास खुद बनना होगा। चापलूसों को अपना अनुयायी बनाओं। अंहकारी और शोषण करने वाले के साथ सहमत होने की डरने की अवश्यकता नहीं है। साहसी, निडर, निखर और प्रखर बनो। 

आज कल चुनाव का माहौल है, जन सैलाब उमड़ रहा है, नहीं शायद गलत बोल रहा हूँ, चाटुकारों का उन्माद उबल रहा है, विभिन्न मंचों से तथाकथित धर्मनिरपेक्षियों, समाजसेवी, समाजवादी विकास पुरूषों को महापुरुष, महानतम से भी महान बनने और बनाने का संवाद उछल रहा है।

कहाँ गये कहने वाले जय जवान जय किसान, वो कर्मचारी, शिक्षक, विद्यार्थी और अधिकारि जो कभी भी न थे सत्य से डिगने वाले, साहस से लड़ने वाले कहाँ गयी वो जनार्दन जनता जो सिहांसन खाली करो कि आवाज बुलंद करने वाले। कहाँ है संविधान के शब्दों के लिए लडने वाले। sycophancy

behaviour in which somebody praises important or powerful people in a way that is not sincere, especially in order to get something from them

(व्यक्ति या उसके आचरण के लिए प्रयुक्त) अपने स्वार्थ के लिए महत्वपूर्ण प्रभावशाली व्यक्तियों की झूठी प्रशंसा; चापलूसी; ख़ुशामद

अपने कार्यक्षेत्र में उपस्थित शुद्ध अशुद्ध चाटुकारों की संदर्भ सहित व्याख्या किजिये। धन्यवाद

कोई टिप्पणी नहीं:

पेपर लीक का असली जिम्मेदार कौन?, शिक्षा व्यवस्था या सिस्टम?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बदलाव, चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता भारत की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं और आगे भी होत रहने च...