साजिशों के दौर में समाधान कम समस्याएं ज्यादा है।
इंसानों ने अपने सुविधा अनुसार अपना समाज बना दिया यहां तक कि इंसानी रुप में भगवन अवतार धारण कर संसार के निमार्ण का श्रेय भी स्वयं को दे दिया लेकिन मानवीय मूल्यों को ताक पर रख कर मानवता को भूल गया।
अब तो यहां तक सुनने और देखने में आ रहा है कि इंसान शाश्वत सत्य मृत्यु तक पर विजय प्राप्त करने के लिए, तंत्र मंत्र और ज्ञान विज्ञान को विकसित करने में लगा हुआ है। परन्तु वह प्रकृति के वृत्ति पर विजय हासिल ना करके अपने लालची प्रवृत्ति के माध्यम से अपने विनाश को न्योता जरूर दें रहा है।
जल जमीन जंगल और जानवर इंसानों पर निर्भर नहीं है, लेकिन इंसान इन सबके बिना एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता है। इसलिए इंसान इन सब पर कब्जा करने में लगा हुआ है।
इंसानों के लोभ, मद, क्रोध, काम और भय की कोई सीमा नहीं है। इसलिए इंसान चाहता है, एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना जिसमें सिर्फ कुछ व्यक्ति विशेष का समुह ही धरती पर अपनी सत्ता स्थापित करें।
सृष्टि का जब निर्माण हुआ तब शायद इंसान ही एक ऐसा जीव हुआ जिसमें तर्क शक्ति का निर्माण हुआ, लेकिन समय अनुसार जैसे ही हम इंसानों की तर्क शक्ति विकसित हुई हमने कुतर्क करना शुरू कर दिया। लेकिन वह कारण क्या था जिसके वजह से हम कुतर्कों में लगे हुए हैं, वो है हमारी जिज्ञासा जिसने हमारी ज्ञानेंद्रियों एवं इन्द्रिय अथवा कर्मेंद्रियों को जागृत किया।
ज्ञान विज्ञान के अनुसार मनुष्य पहले हजारों सालो तक जिंदा रहते थे। फिर अपने कुतर्कों के वजह से इंसानों के जीवित रहने की अवधि सैकड़ों साल हो गया और अब तो इंसान सैकड़ा भी पुरा नही कर पाता है।
हमारे अल्प आयु होने का एक मात्र कारण हमारी ज्ञानेंद्रियों एवं कर्मेंद्रियों का असंतुलित होना है। इस प्रकार देखा जाए तो हम अपने ज्ञानेंद्रियों एवं कर्मेंद्रियों में सबसे ज्यादा प्रभावित जीभ और त्वचा से है।
जीभ के स्वाद के लिए चाहे भोजन का स्वाद हो अथवा भाषा का बिना जीभ के लगभग नामुमकिन है, और त्वचा के स्पर्श, तापमान और दबाव को महसूस करने के लिए हम कुछ भी करने के लिए तैयार हैं, और त्वचा के अंदर भी लिंग अथवा गुदा एक ऐसा अंग है जो हमें चर्म सुख अथवा ज्ञान का अनुभव प्रदान करता है।
जीभ और त्वचा अर्थात स्वाद लिंग और गुदा के असीमित अनुभव, एहसास ने मनुष्य को मानवता और मानवीय मूल्यों से वंचित कर दिया है। जबकि मनुष्य के पास कुल 11 प्रकार की इंद्रियां होती हैं। जिनमें पाँच ज्ञानेंद्रियां, पाँच कर्मेंद्रियाँ और एक मन शामिल हैं। ज्ञानेंद्रियां हैं आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा (इंद्रिय)। कर्मेंद्रियां हैं हाथ, पैर, गुदा, जननेंद्रिय और मुख है।
आज के युग में लगभग हर एक इंसान असिमित रुप में जिज्ञासु और स्वार्थी हो गया है। उसमें भी हम मानवों के बिच महामानव और व्यक्ति विशेष बनने की प्रतिस्पर्धा ने मानवता के साथ ही मानव मूल्यों को तहस नहस कर रखा है। हम मूर्खता की हद पार कर चुके हैं।
यदि कोई व्यक्ति विशेष स्वयं को महामानव, ज्ञानी विज्ञानियों के श्रेष्ठतम श्रेणी में रखना चाहता है तो उसे पहले अपने लोभ मद काम क्रोध और भय पर विजय प्राप्त करने की जरूरत है। क्योंकि इंसान स्वरूप में भगवान ने भी यदि पृथ्वी पर जन्म लिया या अवतार लिया तो वो भगवान इसलिए सिद्ध हुए क्योंकि वो काम, क्रोध, लोभ, मद और भय रहित थे। उनका उद्देश्य सिर्फ जीव सजीव और सृष्टि का निर्माण करना दया धर्म और मानवता को स्थापित करना है, न कि इंसान रूप में कामेन्द्रियों और इंद्रियों की पूर्ति के लिए भोग-विलास करना। प्रकृति से हमें अस्त्र-शस्त्र, ज्ञान विज्ञान सब प्राप्त हुआ, लेकिन हम आज उसी प्रकृति को अपने अधीन करने के लिए आतुर है। मानव सहित सभी जीव जन्तुओं को अपने आत्मरक्षा और आत्ममंथन के साथ ही आत्मिक सुख शांति और शक्ति को संतुलित रखने की आवश्यकता ही नहीं बल्कि अधिकार है। अब मैं इस रहस्य का ज्यादा विस्तार नहीं कर सकता क्योंकि इंसान रूप में प्रकृतिक रहस्यों को उजागर करने में तथा सृष्टि की व्याख्या करने में सक्षम नहीं हूं। आप मेरे विश्लेषणात्मक अध्ययन पर टिप्पणी अवश्य करें ताकि हम इस रहस्य से संबंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकें। धन्यवाद।
