शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

चुनाव प्रचार और प्रसार

प्रिय मित्रों एवं पाठको चुनाव के मुद्दे पर बात करने से पहले कुछ अधिकारों के बारे में बात करना और जानकारी होना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद १९-२२ के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरीक को वाक स्वतंत्रता का अधिकार है चाहे लिखित या मौखिक दोनो प्रकार से एक भारतीय स्वतंत्र है टिप्पणी के लिए परन्तु एक अधिकार और है जिसका नाम मानहानि है अर्थात किसी वस्तु, व्यक्ति और स्थान के मान सम्मान को आपके द्वारा किए गए टिप्पणी से किसी प्रकार से अघात एवं क्षति नहीं पहूंचना चाहिए। एक विड़म्बना यह भी है कि आम नागरीक के लिए लगभग सब कुछ क्षमा योग्य और आम है क्यूंकि समाज और कानून के नजर में उसे आम, ग़रीब और लगभग विवेक विहीन माना जाता है परन्तु जब एक आम व्यक्ति किसी अधिकारीक पद पर आसीन रहता है और जब एक व्यक्ति अपने कर्मो के द्वारा समाज के लिए विशेष हो जाता है तो उसके द्वारा की गयी टिप्पणी और वाक का महत्व बढ जाता है और फिर उसके साथ और उसके लिए संविधान के अंतर्गत कानून में मानहानि का कानून लागू होता है। अब बात करते हैं चुनाव की चुनाव के दौरान प्रचार का प्रसार आज के आधुनिक युग में चरम पर है परन्तु चुनाव आयोग जिसका गठन २६ जनवरी १९५० को हूआ उसका प्रसार आघुनिक युग के अनुसार नहीं हूआ जैसे कि चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों का पालन लगभग न के बराबर है क्यूंकि चुनाव आयुक्त की नजर में सब बराबर हैं और कार्यवाही के रूप में मात्र चेतावनि दे कर और जारी कर के चुनाव प्रक्रिया को जारी रखा जाता है ऐसा होने का मतलब सबूतों (साक्ष्य) का अभाव एवं कमि माना जाता है और सबसे बडा सोचने योग्य और औचित्य पूर्ण बात यह है की चुनाव आयोग स्वयं अपने दिशा निर्देश के पालन होने और न होने का संज्ञान क्यों नहीं लेता चुनाव आयोग के समक्ष जब तक कोई पार्टि, कार्यकर्ता, नेता और राजनेता किसी विरोधी अथवा अन्य पार्टि एवं राजनेता के विरूद्ध चुनाव के लिए जारी निर्देशों के पालन ना किए जाने का विरोध चुनाव आयुक्त के समक्ष दर्ज नहीं करता तब तक आयोग और आयुक्त लगभग आंख कान और जबान बंद करके हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहता हैं और चुनाव प्रचार के नाम पर और बहाने से एक पार्टि एवं नेता अपने विरोधी राजनेता एवं पार्टि पर आरोप-प्रत्यारोप जारी रखते हुए फॉरवर्ड और बैकवर्ड कास्ट (जाति) की राजनीति करते रहते हैं और बैकवर्ड तथा फॉरवर्ड कास्ट के भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं इस तरह राजनीति के खतरनाक खेल में नेता एवं राजनेता एक दूसरे के लिए निजी तौर पर भी आरोप और प्रत्यारोप लगाते हैं और यह चिज और बात राजनीतिक स्तर पर अनुचित और अयोग्य होता है जिसका गंभीर परिणाम हिंसा और आपसी संधर्ष के रूप में सामने आता है और यहाँ चुनाव आयोग का औचित्य शून्य हो जाता है और फिर देश का कानून प्रभाव में आता है और कानून के अंतर्गत चुनाव में कानून की प्रक्रिया का पालन होता है। चुनाव में प्रत्याशी और पार्टि का बड़ा विशेष महत्व होता है जैसे की पार्टि क्षेत्रीय स्तर की न होकर राष्ट्रीय स्तर कि होनी चाहिए और प्रत्याशी के पास धन जन और वाक पटुता के साथ-साथ अपराधीयो, बाहूबलियों और उधयोगपतियों का समर्थन होना अति आवश्यक है पार्टि का विकल्प तो मिल सकता है क्यूंकि कहीं-कहीं क्षेत्रीय पार्टि का वर्चस्व होता है और कभी-कभी निर्दलीय प्रत्याशी भी विजयी हो जाता है लेकिन प्रत्याशी का धनवान होना और अपराधीयों एवं उधयोगपतियों का समर्थन होना अत्यंत आवश्यक है। चुनाव में सबसे मुख्य भूमिका और योगदान जनता, व्यापारि और उधयोगपतियों का होता है क्यूंकि उधयोगपति और व्यापारि के द्वारा पार्टियों को गुप्त दान के रूप धन प्रदान किया जाता है और यह धन चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं और जनता के बिच खर्च किया जाता है जबकी जनता भेड़ चाल चलते हुये एक तरफा मत देती है जिसके परिणाम स्वरूप चुनाव का परिणाम निर्धारित होता है इसके उपरान्त विजेता पार्टि जनता जनार्दन और किसान जनता को भूल कर और उसके हितों का ध्यान न रख कर सिर्फ उधयोगपतियों और व्यापारियों के हित के लिए कार्य करती है जैसे की उधोग और व्यापार के विकास और विस्तार के लिए नीति नियम और कानून का निर्धारण करते हुए उसे लागू करती है और फिर उधयोगपति और व्यापारि अपना उधोग एवं व्यापार स्थापित करके जनता को रोजगार और व्यापार का अवसर प्रदान करते है और सत्ता में मौजूद सरकार को मजबूती प्रदान करतें हैं। इस तरह चुनाव के प्रचार और प्रसार की प्रक्रिया निरंतर जारी रहता है। और जनता जनार्दन अपराध-अपराधीयों का शिकार होते हुये भ्रष्टाचार से हैरान परेशान और त्रस्त रहती है और उघोग-उधयोगपतियों के शोषण और प्रदूषण से दूषित होकर कठिन जिवन यापन करते हुए जिवित रहती है और सरकार को जिम्मेदार मानते हूए अपने जिम्मेदारी को भूल जाती है जबकि जनता को चुनाव के दौरान अपने मत (वोट) के अधिकार का उचित उपयोग करते हुए किसी पार्टि विशेष और व्यक्ति विशेष एवं अपराधी के प्रभाव में अथवा बहकावे में न आकर के अपने मत को नीर्भीक ईमानदार और शिक्षित प्रत्याशी के पक्ष में मत देना चाहिए और इसके साथ-साथ सामुहिक रूप से जागरूक होते हुए चुनाव के दौरान किसी अपराधी और उधयोगपति के शामिल होने पर और सहयोग को चुनाव में देखते हुए इसकी जानकारी चुनाव आयोग को देने के साथ ही इसके लिए चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत एवं आपत्ति दर्ज  करते हुए अपना जिम्मेदारी निभाना चाहिए।
निष्कर्षतः निन्मलिखित बातों का उदेश्य भारत के जनता और युवा को जागरूक करना और चुनाव आयोग के व्यापक विस्तार और प्रसार के आवश्यकता को दर्शाना है क्यूंकि भारत धर्म निरपेक्ष देश है और अमेरीका की तरह भारत में भी संयुक्त सरकार होती है , लेकिन भारत मे केन्द्र सरकार राज्य सरकार की तुलना में अधीक शक्तिशालि है जो की ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर अधारित है और इस प्रकार भारत के द्वारा अमेरीकी लोकतंत्र के आड में ब्रिटेन के लोकतंत्र ढांचे का पालन किया जाता है।। जबकि चुनाव आयोग का नियंत्रण सिर्फ विधान सभा और लोकसभा के चुनावों तक सिमित है और यहां चुनाव आयुक्त का निर्वाचन राष्ट्रपति के द्वारा होता है और अन्य चुनावों का नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग के पास होता है जैसे नगरपालिका, ग्राम पंचायत, महानगर परिषद और जिला परिषद का चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग के अंतर्गत होता है और यहां चुनाव अयोग की नियुक्ति शायद राज्यपाल और राज्य सरकार के द्वारा होता है तथा इन आयुक्तो (अधिकारीयों) को समय से पहले पद से खारीज करने के लिए महाभियोग के प्रक्रिया को जारी करना पडता है ।। स्पष्ट है कि मेरे युवा मित्र एवं पाठको को यह लेख बेहद पसंद आऐगा और किसी त्रृटि पर खेद प्रकट करते हुए उचित टिप्पणी की आशा करता हूं।। जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

सैनिक की अन्तः पुकार

साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।।
यदि हाल मेरी माता पूछे, मुरझाया फुल दिखला देना।।
भारत के नारी की गाथा सुना देना।।
यदि हाल मेरी पत्नी पूछे, इक जलता दिप बुझा देना।।
यदि इतने पर भी न समझे, तो माँग का सिन्दूर मिटा देना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।।
यदि माता मेरी क्रंदन करे, पकड कर उन्हे समझा देना।।
यदि इतने पर भी न समझे, तो भारत के वीरों की गाथा सुना देना।।
यदि हाल मेरा मित्र पुछे तो देश की याद दिला देना।।
यदि संतान रोए तो, हे वीरों अपने सीने से लगा लेना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।
यदि देश का वीर बालक हो अधीर, तो उसे वीरों के बलिदान की गाथा सुना देना।।
यदि मेरी मातृभूमी हो कभी वीर विहीन, तो भारत के वीर माता को जगा देना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।।
यदि मिले जो कभी कहीं कोई देशद्रोही, सैनिक की अन्तः पुकार सुना देना।।
मै तो ठहरा कलम का फकीर, मेरे मृत्यु पर कलम के चन्द लकीरों से भारत माता की जय लिख कर दिखला देना।।
भारत माता के जय हो का उदघोष विश्व को सुना देना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना ।।


(एक अधूरी कविता जिसे पूरा करने का अधूरा प्रयास)

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

मेरे मित्र, पाठक और मैं

मेरे प्रिय मित्रों और पाठको सहयोग एवं सहायता के लिए धन्यवाद। आप सभी को दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। पूर्व या वर्तमान में किसी भी त्रृटि के लिए खेद प्रकट करता हूँ । प्रयास निरंतर जारी है उचित मार्ग दर्शन और टिपप्णी हेतु विनम्र निवेदन है । आज के वर्तमान आधुनिक युग में झूठे और थोडे सच्चे लेख और अनुचित भाषा के द्वारा मनोरंजन और व्यक्ति विशेष के कृपा से कई पत्रकार, ब्लॉगर, साहित्यकार एवं लेखक और अन्य विशेष गणमान्य व्यक्ति इन विशेष कार्य क्षेत्रों में धन और नाम अर्जित कर लेतें हैं परंतु सच्चे और निर्भीक पत्रकार, ब्लॉगर, साहित्यकार और लेखकों को राजनेता, धार्मिक संगठनों और व्यक्ति विशेष के कोप (द्वेष) को झेलना और सहन करना पड़ता है एवं कठिन जीवन बिताते हुए संघर्षशील जीवन जीना पडता है ।। जबकी झूठ और मिथ्यावाद को समिक्षा की जरूरत है परंतु सत्य और सत्यवादिता को किसी समिक्षा का जरूरत नहीं होता है । आधुनिक दुनिया में झूठे, और थोडा सच्चे, मनोरंजक चापलूस पत्रकार, ब्लॉगर, साहित्यकार और लेखकों के श्रोता और दर्शक एवं समर्थक बहूत हैं और दुनिया में इनको विद्वान माना जाता है जबकी एक सच्चे निर्भीक और तटक्ष पत्रकार, लेखक, ब्लॉगर और साहित्यकार का कोई श्रोता, समर्थक और दर्शक नहीं होता है और दुनिया में इनको पागल, बोर और बकवास माना जाता है। जो स्वयं का मित्र है जिसके पास आडम्बर, मिथ्यावाद और धन है जो चतुर वक्ता और चापलूस है उसके अनेकों मित्र और बहूत समर्थक है और ये बात एवं निती आज के इस आधुनिक दुनिया में जरूरी है। मैं सबका मित्र हूं परंतु मेरा कोई मित्र नहीं है क्यूंकि मेरे पास मिथ्यावाद, आडम्बर, और कोई व्यक्ति विशेष नहीं है और न ही मैं चापलूस और धनवान हूं इसलिए मेरा कोई समर्थक भी नहीं है। अकेला निकल पडता हूं हर एक मंजील के राह पर न कोई साथी है न कोई राही पर मेरे साथ मैं होता हूं बेशक डगमगाते हो कदम पर मेरा विश्वाश और हिम्मत कभी नहीं डगमगाता, रास्ते और राही को मैं साथी बनाकर चलता रहता हूं। अंततः मैं आशा करता हूं की जैसे आज के दिन दशहरा पर्व असत्य पर सत्य के जीत का और अच्छाई पर बुराई के जीत का प्रतिक है। इस तरह से एक न एक दिन झूठ का मुहँ काला और सच्चे का बोलबाला जरूर होगा ।। जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

स्वच्छ नैतिकता मेरा स्वच्छ भारत

स्वच्छ नैतिकता का मतलब सिर्फ स्वच्छता से नहीं इसका अर्थ नैतिकता से है हर एक वस्तु और व्यक्ति को राजनिती से ऊपर उठ कर राजनैतिक एवं समाजिक रूप में स्वच्छ होना पडेगा और मानसिक रूप से मजबूत होना होगा और एक ऐसे कानून के लिये तैयार होना होगा जो हमें नैतिक स्तर पर इतना मजबूत कर दे कि हम अपने आप को हर एक रूप एवं स्तर पर स्वच्छ कर दें ।। आज माननिय प्रधान मंत्री जी के उर्जा और संकल्प के भरोसे पर विश्वाश है मुझे और आशा ही नहीं बल्कि पूरा विश्वाश है कि निकट भविष्य में स्वच्छता के लिए कानून भी होगा ।। इस प्रकार आज देश को स्वच्छता के लिए एक कदम चलते हुऐ देखकर मैने दो कदम चलने का संकल्प लिया परन्तु कुछ एक विडम्बनाओं को देखकर हैरान और परेशान हो जाता हूं कि हम अपना गंदगी साफ करके उस व्यक्ति अथवा पडोसी के घर के पास और ऊपर डाल देतें हैं जो आर्थिक और परिवारिक रूप से कमजोर है जबकी उस कूड़ा अथवा गंदगी का उचित स्थान अपने घर का कूड़ादान अथवा नगर का कूड़ा घर है ।। और बेहतर होगा कि आज की गई गलति को फिर दुबारा सर्वजनिक स्थलों पर ना दौहराएं जैसा कि आज इंडिया गेट पर भिड़ के हटने के बाद नजर आया जबकी वो अपना-अपना गंदगी और कूड़ा अपने साथ ले जाकर उसे उसके उचित स्थान कूड़ेदान तक पहूंचाना चाहिए था। विवेक और नैतिकता तो ये कहता है कि सब अपना-अपना काम करें अर्थात हम अपने घर, पड़ोस और सर्वजनिक स्थल को स्वच्छ रखें और कूडे और गंदगी को सफाई कर्मचारीयों के मदद से उसके उचित स्थान तक पहूंचा दें वहा से फिर सफाई कर्मचारी सरकार के मदद एवं सहायता से उसे नष्ट अथवा समाप्त कर दें । मैं अपने प्रधान मंत्री जी का प्रशंसा और अनेकों अनेक धन्यवाद करता हूँ कि एक कोशिश किया इन्होने राजनिती को राजनैतिक बनाने का और एक आशा में निवेदन और विश्वाश यह भी करता हूं कि एक उचित कानून के साथ वैज्ञानिकों के सहायता एवं उद्योगपतियों के मदद से उस कूड़े एवं गदंगी को नष्ट करते हुये उससे उपयोगी उर्जा और उपयोग कि युक्ति एवं साधन देश को प्रदान करें जैसा कि दुनिया के अन्य देश कूड़े को नष्ट करने के लिए प्लानट आदि स्थापित करके उसका उपयोग उर्जा के लिए करते हैं।। निष्कर्षतः हमें खूद के जागरूकता के साथ-साथ सफाई कर्मचारी के क्षमता और देश के कानून को आगे बढाते हुए कुछ कूड़ा रीफाइनरी (ट्रीटमेंट) प्लानट की आवश्यकता है जो शायद देश के कुछ हिस्से में मौजूद है और जैसे हम धार्मिक स्थल, धर्मशाला और सर्वजनिक कार्य आदि के स्थान के लिए श्रम, धन और स्थान का जनता एवं देश के सुख एवं समृद्धि के लिए दान करते हैं ठिक वैसे ही हम सब को अपने देश और अपने समाज को स्वच्छ बनाने के लिए शौचालय और कूड़ाघर एवं कूड़ेदान के लिए धन, श्रम और स्थान का दान करते हुए देश के सुख और समृद्धि में सहयोग करना चाहिए और सरकार से इस कार्य के लिए सहयोग और सहायता लेना चाहिए और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को और लाल बहादुर शास्री जी को याद करते हुए कहना चाहता हूँ ।।
धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए ,
माली सींचे सौ घडा ऋतु आए फल होए ।।
।।जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।

पेपर लीक का असली जिम्मेदार कौन?, शिक्षा व्यवस्था या सिस्टम?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बदलाव, चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता भारत की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं और आगे भी होत रहने च...