प्रिय मित्रों एवं पाठको चुनाव के मुद्दे पर बात करने से पहले कुछ अधिकारों के बारे में बात करना और जानकारी होना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद १९-२२ के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरीक को वाक स्वतंत्रता का अधिकार है चाहे लिखित या मौखिक दोनो प्रकार से एक भारतीय स्वतंत्र है टिप्पणी के लिए परन्तु एक अधिकार और है जिसका नाम मानहानि है अर्थात किसी वस्तु, व्यक्ति और स्थान के मान सम्मान को आपके द्वारा किए गए टिप्पणी से किसी प्रकार से अघात एवं क्षति नहीं पहूंचना चाहिए। एक विड़म्बना यह भी है कि आम नागरीक के लिए लगभग सब कुछ क्षमा योग्य और आम है क्यूंकि समाज और कानून के नजर में उसे आम, ग़रीब और लगभग विवेक विहीन माना जाता है परन्तु जब एक आम व्यक्ति किसी अधिकारीक पद पर आसीन रहता है और जब एक व्यक्ति अपने कर्मो के द्वारा समाज के लिए विशेष हो जाता है तो उसके द्वारा की गयी टिप्पणी और वाक का महत्व बढ जाता है और फिर उसके साथ और उसके लिए संविधान के अंतर्गत कानून में मानहानि का कानून लागू होता है। अब बात करते हैं चुनाव की चुनाव के दौरान प्रचार का प्रसार आज के आधुनिक युग में चरम पर है परन्तु चुनाव आयोग जिसका गठन २६ जनवरी १९५० को हूआ उसका प्रसार आघुनिक युग के अनुसार नहीं हूआ जैसे कि चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों का पालन लगभग न के बराबर है क्यूंकि चुनाव आयुक्त की नजर में सब बराबर हैं और कार्यवाही के रूप में मात्र चेतावनि दे कर और जारी कर के चुनाव प्रक्रिया को जारी रखा जाता है ऐसा होने का मतलब सबूतों (साक्ष्य) का अभाव एवं कमि माना जाता है और सबसे बडा सोचने योग्य और औचित्य पूर्ण बात यह है की चुनाव आयोग स्वयं अपने दिशा निर्देश के पालन होने और न होने का संज्ञान क्यों नहीं लेता चुनाव आयोग के समक्ष जब तक कोई पार्टि, कार्यकर्ता, नेता और राजनेता किसी विरोधी अथवा अन्य पार्टि एवं राजनेता के विरूद्ध चुनाव के लिए जारी निर्देशों के पालन ना किए जाने का विरोध चुनाव आयुक्त के समक्ष दर्ज नहीं करता तब तक आयोग और आयुक्त लगभग आंख कान और जबान बंद करके हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहता हैं और चुनाव प्रचार के नाम पर और बहाने से एक पार्टि एवं नेता अपने विरोधी राजनेता एवं पार्टि पर आरोप-प्रत्यारोप जारी रखते हुए फॉरवर्ड और बैकवर्ड कास्ट (जाति) की राजनीति करते रहते हैं और बैकवर्ड तथा फॉरवर्ड कास्ट के भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं इस तरह राजनीति के खतरनाक खेल में नेता एवं राजनेता एक दूसरे के लिए निजी तौर पर भी आरोप और प्रत्यारोप लगाते हैं और यह चिज और बात राजनीतिक स्तर पर अनुचित और अयोग्य होता है जिसका गंभीर परिणाम हिंसा और आपसी संधर्ष के रूप में सामने आता है और यहाँ चुनाव आयोग का औचित्य शून्य हो जाता है और फिर देश का कानून प्रभाव में आता है और कानून के अंतर्गत चुनाव में कानून की प्रक्रिया का पालन होता है। चुनाव में प्रत्याशी और पार्टि का बड़ा विशेष महत्व होता है जैसे की पार्टि क्षेत्रीय स्तर की न होकर राष्ट्रीय स्तर कि होनी चाहिए और प्रत्याशी के पास धन जन और वाक पटुता के साथ-साथ अपराधीयो, बाहूबलियों और उधयोगपतियों का समर्थन होना अति आवश्यक है पार्टि का विकल्प तो मिल सकता है क्यूंकि कहीं-कहीं क्षेत्रीय पार्टि का वर्चस्व होता है और कभी-कभी निर्दलीय प्रत्याशी भी विजयी हो जाता है लेकिन प्रत्याशी का धनवान होना और अपराधीयों एवं उधयोगपतियों का समर्थन होना अत्यंत आवश्यक है। चुनाव में सबसे मुख्य भूमिका और योगदान जनता, व्यापारि और उधयोगपतियों का होता है क्यूंकि उधयोगपति और व्यापारि के द्वारा पार्टियों को गुप्त दान के रूप धन प्रदान किया जाता है और यह धन चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं और जनता के बिच खर्च किया जाता है जबकी जनता भेड़ चाल चलते हुये एक तरफा मत देती है जिसके परिणाम स्वरूप चुनाव का परिणाम निर्धारित होता है इसके उपरान्त विजेता पार्टि जनता जनार्दन और किसान जनता को भूल कर और उसके हितों का ध्यान न रख कर सिर्फ उधयोगपतियों और व्यापारियों के हित के लिए कार्य करती है जैसे की उधोग और व्यापार के विकास और विस्तार के लिए नीति नियम और कानून का निर्धारण करते हुए उसे लागू करती है और फिर उधयोगपति और व्यापारि अपना उधोग एवं व्यापार स्थापित करके जनता को रोजगार और व्यापार का अवसर प्रदान करते है और सत्ता में मौजूद सरकार को मजबूती प्रदान करतें हैं। इस तरह चुनाव के प्रचार और प्रसार की प्रक्रिया निरंतर जारी रहता है। और जनता जनार्दन अपराध-अपराधीयों का शिकार होते हुये भ्रष्टाचार से हैरान परेशान और त्रस्त रहती है और उघोग-उधयोगपतियों के शोषण और प्रदूषण से दूषित होकर कठिन जिवन यापन करते हुए जिवित रहती है और सरकार को जिम्मेदार मानते हूए अपने जिम्मेदारी को भूल जाती है जबकि जनता को चुनाव के दौरान अपने मत (वोट) के अधिकार का उचित उपयोग करते हुए किसी पार्टि विशेष और व्यक्ति विशेष एवं अपराधी के प्रभाव में अथवा बहकावे में न आकर के अपने मत को नीर्भीक ईमानदार और शिक्षित प्रत्याशी के पक्ष में मत देना चाहिए और इसके साथ-साथ सामुहिक रूप से जागरूक होते हुए चुनाव के दौरान किसी अपराधी और उधयोगपति के शामिल होने पर और सहयोग को चुनाव में देखते हुए इसकी जानकारी चुनाव आयोग को देने के साथ ही इसके लिए चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत एवं आपत्ति दर्ज करते हुए अपना जिम्मेदारी निभाना चाहिए।
निष्कर्षतः निन्मलिखित बातों का उदेश्य भारत के जनता और युवा को जागरूक करना और चुनाव आयोग के व्यापक विस्तार और प्रसार के आवश्यकता को दर्शाना है क्यूंकि भारत धर्म निरपेक्ष देश है और अमेरीका की तरह भारत में भी संयुक्त सरकार होती है , लेकिन भारत मे केन्द्र सरकार राज्य सरकार की तुलना में अधीक शक्तिशालि है जो की ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर अधारित है और इस प्रकार भारत के द्वारा अमेरीकी लोकतंत्र के आड में ब्रिटेन के लोकतंत्र ढांचे का पालन किया जाता है।। जबकि चुनाव आयोग का नियंत्रण सिर्फ विधान सभा और लोकसभा के चुनावों तक सिमित है और यहां चुनाव आयुक्त का निर्वाचन राष्ट्रपति के द्वारा होता है और अन्य चुनावों का नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग के पास होता है जैसे नगरपालिका, ग्राम पंचायत, महानगर परिषद और जिला परिषद का चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग के अंतर्गत होता है और यहां चुनाव अयोग की नियुक्ति शायद राज्यपाल और राज्य सरकार के द्वारा होता है तथा इन आयुक्तो (अधिकारीयों) को समय से पहले पद से खारीज करने के लिए महाभियोग के प्रक्रिया को जारी करना पडता है ।। स्पष्ट है कि मेरे युवा मित्र एवं पाठको को यह लेख बेहद पसंद आऐगा और किसी त्रृटि पर खेद प्रकट करते हुए उचित टिप्पणी की आशा करता हूं।। जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।
निष्कर्षतः निन्मलिखित बातों का उदेश्य भारत के जनता और युवा को जागरूक करना और चुनाव आयोग के व्यापक विस्तार और प्रसार के आवश्यकता को दर्शाना है क्यूंकि भारत धर्म निरपेक्ष देश है और अमेरीका की तरह भारत में भी संयुक्त सरकार होती है , लेकिन भारत मे केन्द्र सरकार राज्य सरकार की तुलना में अधीक शक्तिशालि है जो की ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर अधारित है और इस प्रकार भारत के द्वारा अमेरीकी लोकतंत्र के आड में ब्रिटेन के लोकतंत्र ढांचे का पालन किया जाता है।। जबकि चुनाव आयोग का नियंत्रण सिर्फ विधान सभा और लोकसभा के चुनावों तक सिमित है और यहां चुनाव आयुक्त का निर्वाचन राष्ट्रपति के द्वारा होता है और अन्य चुनावों का नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग के पास होता है जैसे नगरपालिका, ग्राम पंचायत, महानगर परिषद और जिला परिषद का चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग के अंतर्गत होता है और यहां चुनाव अयोग की नियुक्ति शायद राज्यपाल और राज्य सरकार के द्वारा होता है तथा इन आयुक्तो (अधिकारीयों) को समय से पहले पद से खारीज करने के लिए महाभियोग के प्रक्रिया को जारी करना पडता है ।। स्पष्ट है कि मेरे युवा मित्र एवं पाठको को यह लेख बेहद पसंद आऐगा और किसी त्रृटि पर खेद प्रकट करते हुए उचित टिप्पणी की आशा करता हूं।। जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।
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