शुक्रवार, 5 जून 2026

पेपर लीक का असली जिम्मेदार कौन?, शिक्षा व्यवस्था या सिस्टम?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बदलाव, चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता

भारत की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं और आगे भी होत रहने चाहिए। लेकिन एक गंभीर प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है कि इतने सुधारों, नई शिक्षा नीतियों और तकनीकी प्रगति के बावजूद क्या शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं का समाधान हो पाया है?

मैं स्वयं दिल्ली के प्राइवेट एवं अर्धसरकारी विश्वविद्यालयों में Non-Teaching Staff के रूप में कार्य कर चुका हूं। इसके साथ ही Examiner और Invigilator की भूमिका भी निभा चुका हूं। छात्रों के व्यक्तित्व विकास से संबंधित अनेक सेमिनारों, प्रतियोगिताओं और शैक्षणिक कार्यक्रमों के आयोजन में भी मेरी सक्रिय भागीदारी रही है। दौलतराम कॉलेज, IP Women's College सहित कई अन्य कॉलेजों के छात्रों को देखने, सुनने, समझने और परखने का अवसर मुझे मिला है। अपने अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि वर्तमान परिस्थितियां चिंताजनक हैं।

पेपर लीक: एक पुरानी लेकिन गंभीर समस्या

चाहे परीक्षा स्कूल की हो, कॉलेज की हो या फिर सरकारी एवं निजी नौकरियों की, पेपर लीक और परीक्षा में हेरफेर के आरोप लगातार सामने आते रहते हैं।
CBSE, NEET, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं और कई राज्य स्तरीय परीक्षाओं को लेकर समय-समय पर विवाद और जांच की खबरें आती रही हैं। इन घटनाओं का सबसे अधिक नुकसान उन लाखों छात्रों को होता है जो वर्षों तक कठिन परिश्रम करके परीक्षा की तैयारी करते हैं।
जब मेहनत, योग्यता और प्रतिभा से अधिक चर्चा पेपर लीक और अनियमितताओं की होने लगे, तो छात्रों का परीक्षा प्रणाली से विश्वास उठने लगता है।

समस्या का मूल कारण क्या है?

मेरे विचार से शिक्षा और रोजगार से संबंधित परीक्षाओं के नियम-कानूनों के निर्माण और क्रियान्वयन में शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, अनुभवी शिक्षकों और छात्र हितों की अपेक्षा प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रभाव अधिक दिखाई देता है।
यही कारण है कि बार-बार सुधारों की घोषणाओं के बावजूद समस्याएं समाप्त नहीं हो पा रही हैं। शिक्षा से जुड़े निर्णयों में वास्तविक शिक्षाविदों और विषय विशेषज्ञों की भागीदारी अधिक होनी चाहिए।

देश की बौद्धिक क्षमता पर प्रभाव

परीक्षा प्रणाली में बार-बार होने वाली अनियमितताओं का प्रभाव केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहता। जब किसी देश की परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली पर प्रश्न उठते हैं, तो उसकी बौद्धिक क्षमता, शोध गुणवत्ता और प्रतिभा चयन प्रणाली की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
भारत विश्वगुरु बनने, नवाचार, स्टार्टअप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की बात करता है। लेकिन यदि प्रतिभा चयन की प्रक्रिया पर ही लगातार सवाल उठते रहें, तो विश्व स्तर पर हमारी शैक्षणिक साख कमजोर हो सकती है। विदेशी विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसी भी देश की शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को गंभीरता से देखती हैं।

शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण

आज शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं रह गई है। शिक्षा का अत्यधिक व्यवसायीकरण भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। निजी स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और प्रकाशन उद्योग का आकार लगातार बढ़ रहा है। कई परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करने को मजबूर हैं।
महंगी फीस, कोचिंग पर बढ़ती निर्भरता, बार-बार बदलने वाली किताबें और प्रतिस्पर्धा की बढ़ती दौड़ ने शिक्षा को आम परिवारों के लिए आर्थिक चुनौती बना दिया है। यह कहना उचित नहीं होगा कि सभी संस्थान ऐसा कर रहे हैं, क्योंकि देश में अनेक उत्कृष्ट और समाजसेवी शैक्षणिक संस्थान भी कार्य कर रहे हैं। लेकिन शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर गंभीर चर्चा आवश्यक है।

क्या भारत में One Nation, One Education System होना चाहिए?

मेरे विचार से भारत में "One Nation, One Education Board, One Syllabus and One Curriculum" पर गंभीर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।
आज देश में अलग-अलग बोर्ड, अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग मूल्यांकन प्रणालियां हैं। इसके कारण छात्रों के बीच अवसरों और प्रतिस्पर्धा का समान आधार नहीं बन पाता। हालांकि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए स्थानीय आवश्यकताओं का सम्मान भी आवश्यक है। फिर भी कम से कम राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता, परीक्षा सुरक्षा, मूल्यांकन प्रणाली और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों में समानता होनी चाहिए।

शिक्षा कैसी होनी चाहिए?

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या नौकरी हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा:

रोजगार जनक हो,
व्यापार और उद्यमिता को बढ़ावा देने वाली हो,
नवाचार और शोध को प्रोत्साहित करने वाली हो,
कौशल आधारित हो,
और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली हो।
यदि शिक्षा केवल नौकरी तलाशने वाले युवाओं का निर्माण करेगी, तो देश की वास्तविक क्षमता का उपयोग नहीं हो पाएगा।
समाधान क्या हो सकते हैं?
परीक्षा प्रणाली का पूर्ण डिजिटलीकरण और सुरक्षा।
पेपर लीक मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई।
शिक्षा नीति निर्माण में शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की अधिक भागीदारी।
राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम शैक्षणिक मानकों का निर्धारण।
कौशल आधारित और उद्यमिता आधारित शिक्षा को बढ़ावा।
कोचिंग निर्भरता कम करने हेतु विद्यालय और विश्वविद्यालय शिक्षा को मजबूत बनाना।
शोध, नवाचार और व्यक्तित्व विकास को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना।

शिक्षा व्यवस्था की व्यावहारिक समस्याएं

शिक्षा व्यवस्था में कुछ ऐसे प्रश्न भी हैं जिन पर गंभीर राष्ट्रीय चर्चा होनी चाहिए।सबसे पहला प्रश्न फीस संरचना को लेकर है। जब किसी छात्र से स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में पहली बार प्रवेश लेते समय Admission Fee, Registration Fee और अन्य प्रारंभिक शुल्क लिए जाते हैं, तो फिर हर वर्ष एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाने पर पुनः विभिन्न नामों से अतिरिक्त शुल्क क्यों लिया जाता है? यदि छात्र उसी संस्थान का हिस्सा है और केवल अगली कक्षा में प्रोन्नत हो रहा है, तो अभिभावकों के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि हर वर्ष बढ़ती फीस का आधार क्या है और उसकी पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जा रही है?

दूसरा प्रश्न पाठ्यक्रम और पुस्तकों को लेकर है। जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे बड़े ढांचागत सुधारों में परिवर्तन अपेक्षाकृत लंबे समय के अंतराल पर होते हैं, तो अनेक संस्थानों में किताबों, पाठ्य सामग्री और सहायक संसाधनों में बार-बार बदलाव क्यों किए जाते हैं? अभिभावकों और छात्रों को अक्सर नई किताबें, नई नोटबुक श्रृंखलाएं और नए अध्ययन संसाधन खरीदने पड़ते हैं, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है।

तीसरा प्रश्न कोचिंग संस्कृति को लेकर है। यदि स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पर्याप्त है, तो लाखों छात्रों को अलग से महंगी कोचिंग लेने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या हमारी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं और वास्तविक जीवन की चुनौतियों के लिए पर्याप्त रूप से तैयार कर पा रही है?

चौथा प्रश्न रोजगार से जुड़ा है। हर वर्ष लाखों छात्र डिग्रियां प्राप्त करते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं। इससे प्रश्न उठता है कि क्या शिक्षा व्यवस्था और उद्योग जगत की आवश्यकताओं के बीच कोई अंतर मौजूद है?

पांचवां प्रश्न मूल्यांकन प्रणाली से जुड़ा है। आज भी बड़ी संख्या में छात्रों की प्रतिभा का मूल्यांकन मुख्य रूप से कुछ घंटों की लिखित परीक्षा के आधार पर किया जाता है। क्या रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता, समस्या समाधान कौशल, नवाचार और व्यावहारिक ज्ञान को पर्याप्त महत्व मिल रहा है?

छठा प्रश्न शिक्षा में बढ़ती असमानता का है। एक ओर अत्याधुनिक सुविधाओं वाले महंगे निजी संस्थान हैं, वहीं दूसरी ओर संसाधनों की कमी से जूझते अनेक सरकारी विद्यालय और कॉलेज हैं। ऐसी स्थिति में सभी छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

सातवां प्रश्न प्रशासनिक जवाबदेही का है। जब पेपर लीक, फर्जी प्रवेश, मान्यता संबंधी विवाद या अन्य शैक्षणिक अनियमितताएं सामने आती हैं, तो जिम्मेदारी तय करने और समयबद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया अक्सर धीमी दिखाई देती है।इसलिए आवश्यकता केवल नई नीतियां बनाने की नहीं, बल्कि पारदर्शी, जवाबदेह, छात्र-केंद्रित और परिणामोन्मुखी शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की है।


निष्कर्ष

भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
यदि शिक्षा व्यवस्था पारदर्शी, निष्पक्ष, गुणवत्तापूर्ण और रोजगारोन्मुखी बनेगी, तो भारत ज्ञान, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।
लेकिन यदि पेपर लीक, अविश्वसनीय मूल्यांकन प्रणाली, अत्यधिक व्यवसायीकरण और असमान अवसर जैसी समस्याएं बनी रहती हैं, तो इसका प्रभाव केवल छात्रों पर नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की बौद्धिक क्षमता और भविष्य पर पड़ेगा।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित न रखकर राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण और आत्मनिर्भर भारत की नींव के रूप में देखा जाए।

बुधवार, 21 जनवरी 2026

मानव के आधार एवं उद्देश्य



 जर, जोरू और जमीन" एक प्रसिद्ध कहावत है जिसका अर्थ है कि दुनिया के ज़्यादातर झगड़े और विवाद धन (जर), स्त्री (जोरू) और भूमि (जमीन) के इर्द-गिर्द घूमते हैं, जो व्यक्ति के जीवन के तीन मुख्य आधार होते हैं और अक्सर इनके लिए संघर्ष होता है। लेकिन इससे भी बढ़कर तीन मुख्य उद्देश्य है, सत्ता, धर्म और मानवता जिसकी वजह से दुनिया कायम है। और वर्तमान में इसीलिए हम धन (जर), स्त्री (जोरू) और भूमि (जमीन) जैसे प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य के लिए धर्म और मानवता का बलिदान करके सत्ता स्थापित करने में लगे हुए हैं। अंततः परिणाम स्वरूप महाभारत और रामायण की पुनरावृत्ति के माध्यम से फिर से धर्म और मानवता को स्थापित करना पड़ता है। अरे बैल बुद्धि मूर्ख इंसान जब धर्म और मानवता की सत्ता रहेगी तभी तुम इन तीन आधारों की ऐश्वर्य और प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकते हो, यही श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों का उपदेश एवं आदेश है। उद्देश्य सिद्ध करो प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य का आधार अपने आप मिल जाएगा।



रविवार, 4 जनवरी 2026

ज्ञान भक्ति और मोक्ष की महीमा

 प्रस्तावना एवं परिचय

आज के आधुनिक युग में सब कुछ जाती, धर्म और अर्थ पर आधारित हो चुका है। हमें ज्ञान, भक्ति और मोक्ष की कोई चिंता नहीं है। सिर्फ भोग-विलास, काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह-माया आदि की तृप्ति के लिए, धर्म-जाति और अर्थ का दुर्पयोग कर रहे है, अनुचित उपयोग कर रहे हैं।

हम सनातनी हैं, जिसका ना आदि है ना अंत। इसलिए सनातन धर्म में वसुधैव कुटुंबकम् कि धारणा एवं अवधारणा है। निरंतरता ही इस सनातन का मूल आधार है, सृष्टि  ही सनातन है, जो सदैव निरंतर गतिमान है, और ब्रह्मांड की निरंतरता का सनातन रहस्यमय है, जिसको आज के नेता राजनेताओं, साधु-संतों, बाबाओं और मनुष्य को समझ पाना लगभग असम्भव है। जिसने समझा वो अंतर्मुखी है अंतर्ध्यान है, सारे गुणों अवगुणों और अवस्थाओं को अपने अधीन कर योगनिद्रा में विलीन है। ढूंढ सको तो ढूंढ लो, पहचान सको तो पहचान लो, लेकिन उसके लिए तुम्हें अपने कामेन्द्रियों एवं इन्द्रिय के साथ ही गुणों और अवगुणों को साधना होगा नियंत्रित करना होगा, कर सकते हो तो कर लो, मुझसे तो नहीं होगा, और ना ही मेरे बस की बात है, मैं तो मानव होने के नाते मानवता के लिए, एवं आस्तिक अथवा धार्मिक होने के कारण धर्म में गहरा विश्वास रखता हूं। और जागरूक करने के लिए अपने कलम कि फ़क़ीरी के माध्यम से समझने के लिए मात्र प्रचार और प्रसार कर रहा हूं।

भक्ति और ज्ञान

भक्ति और ज्ञान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, बगैर भक्ति के ज्ञान नहीं होता और बिना ज्ञान के भक्ति। भक्ति में: 'मैं' और 'तू' का संबंध है (जैसे भक्त और भगवान)। ज्ञान में: 'मैं' का विलोप हो जाता है, 'मैं' का 'मैं' से मिलना (आत्म-साक्षात्कार का बोध होता है)। 

संक्षेप में, ज्ञान हमें रास्ता दिखाता है (सच्चा पता) और भक्ति उस रास्ते पर चलना सिखाती है (सही दिशा में आगे बढ़ना)। उदाहरण स्वरुप हमें पैदा होने के बाद पढ़ना, लिखना और बोलना सिखाया जाता है, और फिर हमें धीरे धीरे ज्ञान प्राप्त होता है कि, कैसे, क्या और कब बोलना है। तुलसी बाबा को स्वप्न में ज्ञान प्राप्त हुआ लेकिन भक्ति उन्हें हनुमानजी ने सिखाया। यदि आप भक्ति और ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं, तो श्रीरामचरितमानस के उत्तर कांड में वर्णित काकभुशुण्डि के प्रसंग से संबंधित दोहें, चौपाई, सोरठा और छंद पाठ अवश्य पढ़ें।



सारांश के रूप में मैं एक दोहा और चौपाई का वर्णन करता हूं जिसमें चिंतामणि रघुनाथ जी की कृपा से ज्ञान और भक्ति का आभास जरुर होगा। ॐ श्री गणेशाय नमः। जै जै सियाराम।

ज्ञान-दीपक और भक्ति की महान महिमा मानस का दोहा

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।

तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि॥117 ग॥

भावार्थ: (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) तीनों अवस्थाएँ और (सत्त्व, रज और तम) तीनों गुण रूपी कपास से तुरीयावस्था रूपी रूई को निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुंदर कड़ी बत्ती बनाएँ॥117 (ग)॥

सोरठा :

एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।

जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥117घ॥

भावार्थ:-इस प्रकार तेज की राशि विज्ञानमय दीपक को जलावें, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जाएँ॥117घ॥

आडम्बर एवं वाद-विवाद का खंडन 

सनातन से सम्बंधित रहस्य, शायद यह है कि समस्त संसार एवं ब्रह्मांड का आदि, अंत और अनंत को हम कभी नहीं समझ सकते। जब तक कि हम लोभ-लालच, मोह-माया, और काम क्रोध का त्याग कर ज्ञान और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर नहीं हो जाते। इसके लिए हमें अपने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर इत्यादि को मात्र मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर संरक्षित और संचालित करने की आवश्यकता है। जैसे राष्ट्रहित के लिए मानवता को स्थापित करने के प्रयास में धर्म, संस्कृति और राजनीति को निष्पक्ष एवं निष्काम भाव से, राष्ट्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार के लिए लोकतांत्रिक नियम और नीति को निर्धारित करने की आवश्यकता है, जैसा कि हमारे संविधान में, सभी धर्मों और संस्कृति को भित्ति चित्रों के माध्यम से दर्शाया और अपनाया गया है। परन्तु ये हमारा दुर्भाग्य है कि, हमारे, राजनेता, धर्मगुरु और सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन मात्र अपने स्वार्थ सिद्धि, तथा अभिमान के लिए आडम्बर फैला रहे हैं। रुढ़िवादी विचारों की वजह से व्यापारिक और अर्थ एवं पूंजीवादी दृष्टिकोण को स्थापित किया जा रहा है। उनके लिए लोकतंत्र और संविधान के आधार पर देशहित नहीं स्वयं हित सर्वोपरि है। खैर इन मुद्दों को रहने देते हैं, हम ज्ञान, भक्ति, और मोक्ष को समझने का प्रयास करते हैं।


मैं नाम लेकर मूर्खता से बचना चाहता हूं इसलिए संकेतो से बतलाता हूं कि, एक रजोगुणी और तमोगुणी राजनेता जी ने व्यासपीठ के कथावाचक से प्रश्न किया था कि कृष्ण का जब जन्म हुआ तो उनकी मां ने उन्हें सर्वप्रथम किस नाम से पुकारा था, शायद वो कथावाचक जवाब नहीं दे पाए थे। फिर उसी राजनेता ने इसका जवाब दिया कि घनश्याम नाम से पुकारा था, क्योंकि उनका रंग बादलों के जैसा श्यामवर्ण था, हो सकता है उन्होंने किसी चलचित्र में देखा हो, अथवा भाष्य ग्रन्थ में पढ़ा हो, लेकिन मैं भागवत पुराण के अनुसार बताऊं तो उनका जन्म गर्भ से नहीं हुआ था, वो अवतरित हुए थे, अपने सम्पूर्ण स्वरुप में, जो सोलह कलाओं से परिपूर्ण और दिव्य ज्योतिर्मय थे और फिर वासुदेव और देवकी जी के स्तुति करने पर वो अपनी योगमाया से माया स्वरुप में बालक शिशु का रूप धारण कर प्रकट हुए। और उनको आज्ञा दी कि वे उनके प्रति पुत्रभाव और निरंतर ब्रह्मभाव रखें। और रही बात मां यशौदा जी की तो सर्वप्रथम जब बालक रुपी भगवान पर उनकी नजर पड़ी होगी तो शायद कोई भी मां अपने पुत्र को पुत्र एवं लाला ही कहेगी, नामकरण तो बाद में होता है, भगवत पुराण में स्पष्ट वर्णन नहीं है इस प्रसंग का। और वर्ण व्यवस्था तो प्रत्येक युग में उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर हुआ जैसे कि सतयुग में सतोगुण, त्रेतायुग में सतोगुण, रजोगुण और द्वापर में सतोगुण रजोगुण और तमोगुण। वर्तमान के कलयुग में गुणों के आधार पर वर्ण का आंकलन करना असम्भव है। परन्तु अन्य प्रमुख ग्रंथो, पुराणों, वेदों उपनिषदों और स्मृति के अनुसार वर्ण व्यवस्था का जो प्रावधान रहा वो सप्त ऋषियों के द्वारा स्थापित हुआ। और जब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश अजन्मे है तो मानवों का भगवान के कुल और वर्ण का होना असम्भव है।

इसलिए मेरा प्रबुद्ध जनों एवं विद्वानों सहित साधू-संत और कथावाचकों से निवेदन एवं आग्रह है कि समाज में आडम्बर और भेद-भाव ना फैलाएं। तुम क्या भगवत कथा और राष्ट्र कथा करोगे, भगवान का नाम जप भी शुद्ध रूप में नहीं कर सकते। स्वयं को सुधारने का प्रयास करो ज्ञान और भक्ति का प्रचार प्रसार करो। ये आडम्बर और मोह माया के अर्थ को छोड़कर सनातन का रहस्य पहचानों, जिसमें हिन्दू,, मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध, आर्य सहित सभी धर्मों के लिए मोक्ष प्राप्त करने का रहस्य छिपा हुआ है।

संदेश एवं निष्कर्ष 

यदि हम ज्ञान और भक्ति का निष्कर्ष अथवा भाव को संक्षिप्त रूप से समझने का प्रयास करें तो गीता का ज्ञान के अनुसार कृष्ण की भक्ति और राम की भक्ति के अनुसार ज्ञान की प्राप्ति होती है, क्योंकि गीता, रामायण अथवा रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों का मूल सार एवं उद्देश्य इन्हीं तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) के साथ तीन गुणों (सत्त्व, रज और तम) पर आधारित है। आप गीता और रामायण के पाठ से ज्ञान और भक्ति तो प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु मोक्ष नहीं।

मोक्षदायिनी मां होती हैं। माँ जगदम्बा जगत जननी है। इसलिए राधाकृष्ण और सियाराम के जप से ही मोक्ष की प्राप्ति होगी। सब योगमाया है जो योग और माया को समझ गया वो मोक्ष अवश्य ही प्राप्त कर लेगा। जय शिव शंकर पार्वती। शिव से पहले पार्वती नहीं ऐसा क्यों, जबकि राम से पहले सीता और कृष्ण से पहले राधा है। यही तो योग और माया है, महामाया है, योगमाया की महीमा है।



पेपर लीक का असली जिम्मेदार कौन?, शिक्षा व्यवस्था या सिस्टम?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बदलाव, चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता भारत की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं और आगे भी होत रहने च...