सामान्य सारांश
देश, काल और धर्म के अनुसार भारत भुमि पर अनेकों स्थितियों और परिस्थितियों ने जन्म लिया है। जैसे कि देश के संदर्भ में भारत देश को विभिन्न नामों एवं परिवेश के अनुसार पहचाना गया है, जिसमें से कुछ एक नाम आर्यावर्त, भरतखण्ड, जम्बूद्वीप भी हुआ करता था। विभिन्न काल के अनुसार मुगलकालीन और अंग्रेजी शासनकाल के अलावा अन्य शासनाधीन के समय में हिन्दूस्तान और इंडिया आदि नामों से पहचाना गया। सनातन के रूप में भारत एवं भारतवर्ष के नाम से स्थापित किया गया है। इतिहास एवं ऐतिहासिक परिचय के अनुरूप हम सनातनी थे, हैं, और रहेंगे।
परन्तु सनातन संस्कृति, संस्कार का पतन, विघटन वर्तमान समय में इस प्रकार से किया जा रहा है, जैसे कि भारत वर्ष में एक व्यक्ति विशेष वर्ण अथवा क्षेत्र, प्रांत ही भारतवर्ष की पहचान है, बाकी सब सनातन के नाम पर इस वर्ण के व्यक्ति विशेष के अधीन ही संस्कारित एवं पोषित हो रहें हैं। और अंधभक्ती में विशेष वर्ण के व्यक्ति तथा विशेष प्रांत के भोग-विलास और सुख समृद्धि के लिए सबकुछ न्यौछावर करने पर अंधभक्त उतारू हो गए हैं, क्योंकि प्रमुख व्यक्ति विशेष ने बाकी सभी सनातनी वर्णों एवं प्रांतो को आपस में राजनीतिक कटुता एवं धार्मिक विद्वेष और जाता-पात के आडम्बर में ऐसा उलझाया है कि, हम अपंग व्यवस्था का शिकार हो गए हैं। अभी भी समय है, चेतना को जगाने का अनुरोध करता हूं कि, भ्रष्टाचार पहले कम था लेकिन अब और अधिक विकराल रूप धारण कर चुका है। पहले भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी कम थे लेकिन अब अत्यधिक है। क्योंकि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों, शारीरिक एवं मानसिक परिश्रम का उपयोग अपने देश काल और धर्म के विकास के लिए नहीं, बल्कि उस भ्रष्ट नालायक अनपढ़ व्यक्ति विशेष के समूहों के लिए कर रहे हैं, जो स्वयं को संविधान से ऊपर मानते हैं, अपने अहंकार, भोग-विलास और प्रांत तथा निजी वर्ण के लिए कुछ भी कर सकते हैं। चाहे देश में बेरोजगारी, दलाली, भुखमरी और धार्मिक उन्माद की अति रिती हो जाए, भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच जाये लेकिन इन व्यक्ति विशेष के समूहों के अहंकार, भोग-विलास और आत्मसम्मान को ठेस ना पहुंचे। इनको किसी प्रकार का विरोध एवं प्रतिरोध का सामना ना करना पड़े। गंगा कभी उल्टी नहीं बहती, समय कभी वापस नहीं आता लेकिन हां उसकी पुनरावृत्ति जरूर होती है। इतिहास स्वयं को दोहराते हैं। लेकिन अंधभक्ती में बीता हुआ समय भी वापस आ सकता है और गंगा भी उल्टी बह सकती है।
विकासशील से विकसित होती आधुनिकता ने पूंजीवादि व्यवस्था के अंतर्गत संविधान और सनातन दोनों को अपंगता के लिए मजबूर कर दिया है, इस प्रकार के अपंगता अराजकता और भययुक्त भेदभाव की जिम्मेदारी देशवासियों और लोकतंत्र के दो प्रमुख स्तंभों पर है। जिसे हम समाज का आइना और न्याय का मंदिर कहते हैं। शायद आप समझ चुके हैं, जनजागरण, निष्पक्ष पत्रकारिता एवं न्यायिक निर्णय के द्वारा ही हम विकसित हो सकते है। जनमानस को नागरिक कर्तव्यों को समझना भी जरूरी है, जिसको जनता भुल चुकी है। अपितु नागरिक कर्त्तव्य का सम्बन्ध आम एवं खास से लेकर, हर एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति विशेष से भी है, जिसका पालन और निर्धारण लगभग नहीं हो रहा है।
भारत देश:-
इतिहास गवाह है, सनातन के अनुसार सभी धर्मों को अपने धर्म-कर्म के अनुसार जिवन यापन करने का विशेष अधिकार हमारा संविधान हमें प्रदान करता है, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आर्य आदि धर्म हमारे भारत देश में स्थापित है। हमें नागरिकता के अनुसार किसी एक धर्म के अनुसार अपने कर्मों का निर्वहन करते हुए पालन करने का विशेष अधिकार एवं स्वतंत्रता है। परन्तु आज हम एक व्यक्ति विशेष के प्रभाव में राजनीतिकरण के कारण वश भारतीय संविधान के अनुसार धार्मिक रूप में आरक्षित एवं अनारक्षित वर्गों में विभाजित कर दिए गए हैं। जिससे की हम जाती और वर्ण में विभाजित होकर आपसी भेदभाव और राजनीतिक कटुता के शिकार हो गए हैं।
हिन्दू वर्ण व्यवस्था हमें अपने सनातन संस्कृति एवं धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राप्त हुआ है, जिसमे हमारे प्रत्येक वर्ण के लिए एक विशेष अनुष्ठान और आदेश पारित किया गया है कि, कैसे हमें वर्ण व्यवस्था का पालन करते हुए अपने धर्म और कर्म के अनुसार सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाते हुए समृद्धि और खुशहाली के चरम पर पहुंचने का प्रयास करना है।
जबकि वस्तु स्थिति को ध्यान में रखते हुए, उचित व्यापक और मजबूत राजनीति एवं राज धर्म के अनुरूप हमें भारतीय संविधान में आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आधारित आरक्षण के स्वरूपों को पुनः निर्धारित करने की आवश्यकता है। जिससे आपसी सोहार्द एवं समरसता को बरकरार रखते हुए सनातन हिन्दू धर्म समृद्ध और खुशहाल रहे।
जिस प्रकार जंगल में जानवर, पेड़ पौधे अलग-अलग जाती प्रजाति और परिवेश के है, ठीक इसी प्रकार ईश्वर ने या फिर कहें तो प्रकृति ने भी, मनुष्यों को अलग-अलग जाती प्रजाति एवं परिवेश के आधार पर विभाजित किया है। सोच समझ कर देखें, यदि जंगल के सारे जानवर जंगल छोड़कर बस्ती और शहरों में रहना शुरू कर दें, या फिर मनुष्य अपना घर-बार छोड़कर जंगल में रहने लगे फिर क्या होगा, परिणाम हमारे सामने है, हम जंगल काट कर घर बना रहे हैं, और जंगल के जीव जंतु, जानवर हमारे घर अथवा घरों के आसपास ही रह रहे, अजीब संघर्ष पूर्ण परिस्थिति है।
और फिर ध्यानपूर्वक सोचे समझे कि क्या होगा, गधा शेर बनने की कोशिश करें , हिरण चीता का मुकाबला करने लगे, या फिर कौवा मोती चुगे, हंस दाना खना लगे, मैं समझता हूं कि, इस प्रकार के असंतुलन से प्रकृति की मूल वस्तु स्थिति परिवर्तित होगी और जंगल एवं जानवरों के बिच अंसतुलित संघर्ष होगा।
इसी तरह यदि सारे मनुष्य एक है, लेकिन हम सब को भी अलग-अलग स्वरुपों में प्रकृति ने विभाजित किया है, जैसे कि अमेरिकन अंग्रेज भारत में आकर रहने लगे थे तो हमने उनका विरोध क्यों किया और अपने आप को गुलाम मान कर आजादी के लिए संघर्ष क्यों किया, वो भी मनुष्य ही थे हम लोगों को अंग्रेज बन जाना चाहिए था।
फिर हम अपने वर्ण व्यवस्था को स्थापित करते हुए मानवता के लिए एक दुसरे का सहयोग और समर्थन के साथ सोहार्द क्यों नहीं स्थापित कर पा रहे हैं। क्योंकि तिलक, तराजू, तलवार तथा कर्म प्रधान दलित, पिछड़ा विद्वान आदि अपने शक्ति एवं सामर्थ के अनुसार कार्य ना करके सिर्फ और सिर्फ भोग-विलास और आत्मदंभ के लिए संघर्षरत हैं। सब कलयुग नामक आडम्बर से भयभीत होकर काम, क्रोध, लोभ मद से वशीभूत है।
अरे मुर्खो रामायण को बाल्मिकी जी ने कलमबद्ध किया है, जो हमारे हिन्दू धर्म के सनातन वर्ण से है, रामायण में सनातन धर्म के प्रमुख वर्ण से संबंधित भगवान श्रीरामचन्द्र जी के द्वारा रचित रचनाओं का उल्लेख है, ठीक इसी प्रकार वेद व्यास जी ने श्रीमद्भागवत पुराण का रचना किया। तो फिर क्या हम इन पुराणों के आदर्शों एवं आदेशों का पालन करना यह मान कर बंद कर दें की इसमें, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और क्षूद्र का वर्णन है। नहीं बल्कि हमें अपने धर्म के अनुरूप कार्य एवं व्यवहार करने की आवश्यकता है।
अब मैं इसको यह कहते हुए विराम देना चाहूंगा कि कुछ व्यक्ति विशेष के समूहों द्वारा धर्म के आधार पर राजनीति किया जा रहा है ताकि उन्हें अपने भोग-विलास और आत्मदंभ का मौका मिलता रहे। इंसान कभी भगवान नहीं हो सकता यदि भगवान धरती पर जन्म लेता है, तो वह भी एक इंसान ही है। और उसके द्वारा ही मानवता की स्थापना हुई है। भगवान अजन्मा अदृश्य, आदि एवं अनन्त है। इसलिए अंधभक्ती से बाहर निकल कर यथार्थ में उपस्थित रहो।
हमारे सनातनधर्मी देश में धर्म एक है, लेकिन धर्म को स्थापित करने और स्वीकार करने के लिए विभिन्न प्रकार के पालन एवं अनुपालन तथा दिशानिर्देश है, सनातन धर्म ग्रंथों, पुराणों, उपनिषद आदि में हमारे ऋषियों, मुनियों और अवतरित भगवान ने हमें आदेशित किया है, कि कैसे हमें वर्ण व्यवस्था के अनुरुप स्वयं को मर्यादित रखना है। लेकिन नहीं हम सब विद्वान बुद्धिजीवी एवं प्रखरता से परिपूर्ण हो चुकें हैं, हमें तो बस राम, कृष्ण, परशुराम, बाल्मिकी, तुलसी, कबीर, बलि, सांई, नबि, राजा महाराजा और बाहुबली बनना है। सब लगे हुए है धंधे में, धर्म का धंधा राजनीति का धंधा और मानवता का धंधा करने में। जबकि जरूरत है कि हम धर्म का पालन करें, राजनीति को विकसित करें सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए, मानवता को स्थापित करो विश्व कल्याण के लिए। लेकिन नहीं साहब हमें तो संविधान विशेषज्ञ बनना है, संविधान को अपने अनुकूल करना है, लोकतांत्रिक व्यवस्था के आड़ में, ब्राह्मणवादी, सामंतवादी, महाजनवादी दलितवादी, बनते हुए प्रभुत्वशाली सत्ता कायम करना है। अपने आप को राबिन हुड साबित करना है।
सोच समझ कर विचार करो, समाजिक परिवेश और कार्मिक परिवेश में क्या अंतर है, शहर और गांव में क्या अंतर है, कर्म क्षेत्र और धर्म क्षेत्र में क्या अंतर है। अरे व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, दुष्कर्म करने वाले मानवता के दुश्मन, मुर्ख अज्ञानी, समाजिक परिवेश के लिए वर्ण व्यवस्था है जिसको निष्पादित गांव के समाजिक परिवेश के द्वारा होता है, और गांव ही भारत है। कार्मिक परिवेश से तात्पर्य यह है कि कैसे हम कर्म के प्रधानता से स्वयं को वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठाकर विद्वान और बुद्धिजीवियों की श्रेणी में सम्मिलित करते हुए मानवतावादी दृष्टिकोण से मानव धर्म के लिए उत्कृष्ट कार्य को प्रदर्शित कर सकते हैं, अर्थात संवैधानिक रूप में नागरिक कर्तव्यों का पालन करना है। शहरों में श्रमशक्ति का प्रदर्शन किया जाता है जहां धर्म नहीं कर्म प्रधान है, फिर वहां वर्ण व्यवस्था भी लागू नहीं होती है। लेकिन हां गांव में श्रमशक्ति के साथ ही कर्म का आंकलन भी किया जाता है कि धर्म के अनुरूप कौन किस प्रकार के कार्य के लिए निर्धारित है, यदि समाज उसके कर्म में प्रधानता का अनुभव करता है तो फिर उसको भी वर्ण व्यवस्था के पालन की बाध्यता नहीं है। सब बुद्धि, विवेक और व्यवहार का अंतर है, इसलिए राजनीति में जनता द्वारा समय-समय पर बुद्धि शुद्धी के लिए यज्ञों का आयोजन किया जाता है। राष्ट्र को विकसित करने के लिए समाज को संगठित एवं संस्कारित करना आवश्यक है, संस्कृतियों को संरक्षित एवं धारण करना आवश्यक है।
भारतीय कालखंड:-
हमारे सनातनधर्मी देश को अनेकों बार खंडित तथा विघटित किया गया है। जिसका परिणाम यह हुआ कि हम विभिन्न विचारधाराओं, प्रांतीय सरकारों एवं धार्मिक उन्माद में विभाजित होकर विभिन्न खंडों में विभक्त हो चुकें हैं।
जिससे की आज भी हम अपने मूलभूत सुविधाओं और निति निर्देशक तत्वों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मुगलकालीन शाशनकाल, अंग्रेजी हुकूमत, आर्य, मौर्य आदि के शासन के बाद हिन्दूकालिन शाशनकाल काल के अंतर्गत विभिन्न वर्ण के शासकों ने शासन किया, जिसमें से कोई राम तो कोई परशुराम, कोई रावण, कोई बुद्ध, कोई पांडव, कोई सम्राट अशोक, कोई अवतरित भगवान, कोई कंस, तो कोई कृष्ण आदि इत्यादि हुआ जिनको हम अपने समझ और विवेक अनुसार अपने परिवेश एवं क्षेत्र में मान्यता देते हुए उनके आदेशों और आदर्शों का पालन करते है।
परन्तु आज के अतिआधुनिकता के कालखंड में स्थितियां और परिस्थितियां मानवता के विरुद्ध है, क्योंकि वसुधैव कुटुम्बूकम के लिए नहीं हर एक मानव अमानवीय व्यवहार करते हुए अहम् ब्रह्मस्मि के सिद्धांत को अपना रहे हैं। ताकि उन्हें भी इंसान रुप में भगवान के स्वरूप की मान्यता मिल जाए। जबकि ऐसा व्यक्ति विशेष जो स्वयं को अहम् ब्रह्मस्मि कहता है, वह सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी, और नालायक है। आगे फिर कभी इसका विस्तार से उल्लेख करुंगा। शायद आप स्वयं को जागृत कर रहे हैं। अंधभक्ती से बाहर निकल रहें हैं।
धर्म-कर्म:-
मनुष्य जब धरती पर जन्म लेता है तब वह सिर्फ एक मानव मात्र जीव होता है। जन्म के बाद वह अपने धर्म और कर्म के अनुसार हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, आर्य आदि में विभाजित हो जाता है। कोई जन्म के साथ ही धर्म को धारण कर लेता है कोई कर्म के अनुसार धर्म का निर्धारण करता है।
इसलिए धर्म परिवर्तन और धर्म का धंधा आदि होता है। लेकिन प्रत्येक धर्म मानवता के लिए समर्पित है। परन्तु कुछ अनपढ़ अपराधियों ने राजनीति के माध्यम से संविधान में हेरफेर करके धार्मिक उन्माद पैदा कर रखा है, जिससे की उनको भ्रष्टाचार, व्यभिचार और तानाशाही करने का मौका मिलता रहे।
बाह्मण सिर्फ एक जाति नहीं बल्कि सनातन धर्म का प्रचारक, उद्धारक एवं संरक्षक हैं। इश्वर के लिए सब मानव रूप में एक समान है, इसलिए कोई धर्म अनुसार जन्म से ही बाह्मण है तो कोई कर्म से बाह्मण है। वर्ण व्यवस्था सिर्फ हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि सिख, इसाई, बौद्ध और मुस्लिम धर्म में भी अलग-अलग स्वरुपों और संस्कारों के साथ व्याप्त है जिसके अंतर्गत सभी अपने धर्म के लिए सदैव तत्पर रहते हुए कार्यरत हैं। सामाजिक समरसता एवं एकता तथा आर्थिक समानता से ही मानवता का धार्मिक, आर्थिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास निरंतर सम्भव है। जो भी अपने कर्म एवं धर्म का अनुसरण करते हुए अपने गुरुओं, इष्टों आदि जो कि बाह्मण रुप में धरती पर उपस्थित एवं स्थापित है उनका पालन करता है वह सुखी एवं संपन्न है।
यदि असल में बाह्मण दुराचारी, भ्रष्टाचारी और अत्याचारी हो गया तो धरती पर एक ऐसा विद्रोहक विस्फोट होगा जिसकी कल्पना आज तक किसी ने नहीं किया होगा। और फिर स्वतः ही मानवता का पुनर्स्थापना हो जाएगा।
कुछ महाजन और राक्षस प्रवृत्ति के मनुष्यों ने धर्म का व्यापार करना शुरू कर दिया है, जिससे की समस्त धर्मों का विघटन हो रहा है, सबको एक समान स्वरुपों में ढालना असम्भव है। इसलिए उचित यही होगा कि, सब एक दुसरे का सम्मान करते हुए अपने धर्म और संस्कृति के अनुसार उचित व्यवहार करें। गलत को गलत और सही को सही साबित करें। आगे इस बौद्धिक मंथन को विस्तार में बताने के लिए समय और शब्दों का अभाव है। मानवता का विकास एवं सरंक्षण, ब्राह्मणवादी विचारों के साथ धार्मिक सद्भावना एवं संस्कारीत संस्कृति के द्वारा ही हो सकता है ना कि भ्रष्टाचार और व्यापारिक दृष्टिकोण से।
हम इन अपराधि प्रवृत्ति के राजनैतिक व्यक्ति विशेष के तानाशाही को बर्दाश्त कर रहे हैं, इनके द्वारा शोषित और पीड़ित हो रहे हैं क्योंकि हम जागरूक एवं निर्भीक नहीं है। और ज्यादा टीका टिप्पणी करना नहीं चाहता हूं नहीं तो हो सकता है कि इनके द्वारा कोई अन्य वाद विवाद और अपवाद पैदा कर दिया जाएगा। वैसे ही मेरे पास जिवन यापन के साधन संसाधन के अलावा पूंजी का अत्यन्त अभाव है।
निष्कर्ष:-
निम्नलिखित उल्लेख के अनुसार बौद्धिक मंथन के उपरांत निष्कर्ष निकाला है कि। हमें यानी कि आम जन मानस को भोग-विलास के लोभ का त्याग करना होगा, जरूरत के लिए जरूरी कार्य करने से पहले, जरूरी क्या है ये समझने की जरूरत है। आवश्यकता अविष्कार की जननी है, लेकिन अविष्कार, रोजी-रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ सुरक्षा के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर चाहिए। किसी तड़ीपार, दंगा वादी अपराधियों से भयभीत होकर अंधभक्ती में भ्रष्टाचार, व्यभिचार और अधार्मिकता के आवश्यकता अनुसार अविष्कार से बचना होगा। जल, जमीन, जंगल और जानवर के साथ ही रोजी-रोटी को संरक्षित करना होगा। अन्यथा हम इन मूलभूत सुविधाओं के लिए सदैव संघर्षरत रहते हुए भय से तानाशाही से, भ्रष्टाचार से कभी भी मुक्त नहीं हो सकतें हैं। गलत को गलत और सही को सही साबित करना होगा। स्वयं को आंदोलित करते हुए जन जागरण अभियान के तहत सत्य और असत्य तथा अमीरी-गरीबी के फर्क के समिक्षात्मक एवं आवश्यक तथ्यों को समझना होगा।
अब मैं इससे ज्यादा कुछ लिखने में असमर्थ हूं अन्यथा मैं नाम पता सहित उदाहरण के साथ आपको बता सकता था कि, धर्म का धंधा कैसे कौन और क्यों कर रहा है, मानवता की हत्या कौन कैसे और क्यों कर रहा है। आर्थिक रूप से गुलाम कौन बना रहा है। भ्रष्टाचार अपराधीकरण साम्प्रदायिकता कौन फैला रहा है और कैसे फैला रहा है। आपसी सोहार्द और समरसता को बनाए रखें। अपने लोकतंत्र में विश्वास के फलस्वरूप संविधान के अनुसार हम सब एक भारतीय है, संविधान में भी विभिन्न भित्तिचित्रों के माध्यम से हमारे सभी भारतीय धर्मों का विशेष सांकेतिक उल्लेख है। जिससे सिद्ध होता है कि हम सब सनातन भारतीय है।
अंधभक्ती से बाहर निकल कर अपने भारत को सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित करने में अहम योगदान प्रस्तुत करें। संस्कारित समाज और विकसित राष्ट्र का निर्माण, सिर्फ राम राम, कृष्ण, इश्वर अल्लाह वाहेगुरु, जीसस आदि जपने मात्र से नहीं होगा। हमें अपने जागरुकता एवं कार्य क्षमता को बढ़ाते हुए औद्योगिक उत्पादन, कृषि उत्पादन के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सेवा को विकसित करना होगा। नित नए अविष्कार के द्वारा विभिन्न साधनों और संसाधनों का निजी तौर पर उपयोग करना होगा। समय, मंच, और धन के अभाव के कारण कलम का फकीर अब विराम करना चाहता है।
"जातीय समीकरण के आधार पर संघर्षरत धर्म को आसानी से तोड़कर तानाशाह, तानाशाही कर सकते है"।
वर्तमान जातीयताओं के घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि, हमरा सनातन धर्म खंडित एवं विघटित हो रहा है, आधुनिकता और पूंजीवादी व्यवस्था ने हमें मानसिक रूप से अपंग बना दिया है। नौकरीपेशा, व्यापार तथा प्रेम प्रसंग और भोग विलास के लिए उच्च जातियों ने भी स्वयं को अमर्यादित एवं अपमानित कर लिया है। इसी प्रकार निचले स्तर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है, क्योंकि क्षुद्र अथवा निच जातियों ने उच्च शिक्षा, नौकरीपेशा, व्यापार मान सम्मान एवं भोग-विलास के लिए स्वयं को उच्च दिखाने के प्रयास में अमर्यादित व्यवहार एवं भ्रष्टाचार करना शुरू कर दिया। शायद हमारे किसी विद्वान बुद्धिजीवी ने कहा है कि सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था एक सीढ़ी है। और जब ये व्यवस्था ही ऊपर नीचे होगी तो इसका परिणाम यही होगा। उच्च शिक्षा, धन संपदा, समृद्धि आपको भोग-विलास एवं आत्मदंभ तो प्रदान कर सकता है, लेकिन, संस्कृति, संस्कार आत्मसम्मान एवं यश-कीर्ति सिर्फ आपको अपने धर्म और कर्म के पालन करने से ही मिल सकता है। ........ क्योंकि मानव धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं और स्वयं को शिक्षित, सुरक्षित एवं स्वपोषित करने से बड़ा कोई कर्म नहीं। दुनिया के सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य है मानवता की स्थापना। मानवता शब्द अपने आप मे परिपूर्ण है।
जय जवान, जय किसान, जय इंसान।।


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