मुसाफिरखाना है मंजिल जिदंगी मुसाफिर है ।।
पडाव डालते हुए सफर के साथ मंजिल तक चलना है ।।
तेज आंधी में मुझे चिराग बन के जलना है ।।
जिदंगी के राह में हारें सदा पाई वफा करके बेवफाई पाई।।
शराफत से जिदंगी जी कर सजा में चोट खाइ ।।
जिदंगी के कठिन राह में मिल जाये जो किनारा
उठती हुई लहरों से मंजिल बदल जाती है ।।
कहाँ है मंजिल मेरी देता हूँ जब भी आवाज
उसे जिदंगी फिर से मुसाफिर बन जाती है ।।
वफा के राह में अक्सर मुझे बेवफाई मिल जाती हैै ।।
मुसाफिरखाना है मंजिल जिदंगी मुसाफिर है ।।
पडाव डालते हुए सफर के साथ मंजिल तक चलना है ।।
तेज आंधी में मुझे चिराग बन के जलना है ।।
जिदंगी के राह में हारें सदा पाई वफा करके बेवफाई पाई।।
शराफत से जिदंगी जी कर सजा में चोट खाइ ।।
जिदंगी के कठिन राह में मिल जाये जो किनारा
उठती हुई लहरों से मंजिल बदल जाती है ।।
कहाँ है मंजिल मेरी देता हूँ जब भी आवाज
उसे जिदंगी फिर से मुसाफिर बन जाती है ।।
वफा के राह में अक्सर मुझे बेवफाई मिल जाती हैै ।।
मुसाफिरखाना है मंजिल जिदंगी मुसाफिर है ।।
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