शनिवार, 27 सितंबर 2014

व्यक्ति विशेष

स्वामी विवेकानन्द जी एक महान दार्शनिक और समाजसेवी है और उन्होने जब अपना भाषण हिन्दी भाषा में विदेशी पटल पर संबोधित किया था तो तब एक दार्शनिक और समाजसेवी के रूप में और सामाजिक स्तर पर संबोधित किया है और वह एक दौर था जब हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को अंतराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एवं प्रदर्शित करना था और अपने राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर करना था ।। और आज नरेंद्र मोदी जी एक राजनेता के रूप में और राजनीतिक तौर पर विदेशी पटल में हिन्दी में भाषण करके राष्ट्रवाद जैसे दोष को मजबूत करेंगे अंततः इस भाषण का अनुवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यालय हेतु सर्वमान्य अंग्रेजी भाषा में किया जायेगा और फिर कुछ हद तक राष्ट्रवाद के दोष को समाप्त किया जायेगा ।
इस तरह से साबित है कि एक राजनेता के द्वारा विदेशों में राजनीतिक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी में संबोधित न करके अपने राष्ट्रीय भाषा में सम्बोधीत करने का औचित्य सिर्फ क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद जैसे दोष को बढावा देते हुए क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद को मजबूत करना है क्यूंकि एक राजनेता जबतक आपसी मतभेद और कटुता को बढायेगा नहीं तब तक उसके राजनेता होने का औचित्य पूरा नहीं होता ।। और राजनेताओं के पास राजनीति करने का मुद्दा क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद ही तो है यदि इन्ही दो दोष एवं मुद्दे का प्रभाव कम हो जायेगा अथवा समाप्ति हो जाऐगा तो फिर इनके जैसे महान राजनेता एवं नेता पैदा कैसे होंगे ।। जय हिन्द, जय भारत, जय जवान, जय विश्व।।

कोई टिप्पणी नहीं:

पेपर लीक का असली जिम्मेदार कौन?, शिक्षा व्यवस्था या सिस्टम?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बदलाव, चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता भारत की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं और आगे भी होत रहने च...