चाटूकारीता और जी हजूरी से कुछ मिलने वाला नहीं है, हम भोजपुरीया है हमारा इतिहास गरीमा पूर्ण है, हमारे भोजपुरी की धरती मां ने अनेकों होनहार बिरवान पैदा किया है, 1857 की क्रांति का बिगुल हमने (मंगल पाण्डेय ने) बजाया जबकि इस समय गांधी जी पैदा भी नहीं हुए थे, इमरजेंसी में देश को राह हमने (जयप्रकाश नारायण ने) दिखाया, शायद अन्ना हजारे जैसे इस समय सक्रिय रूप से समाज सेवा में नहीं थे।, देश को आर्थिक संकटों से छुटकारे की राह हमने (चंद्रशेखर जी ने) दिखाया तब नरेंद्र दामोदर दास मोदी राजनीति का कखगघ ककहरा सिख रहे थे। लेकिन इस आधुनिक एवं पुंजीवादी समय में हम सिर्फ अच्छे जिवन और केवल स्वयं के मान सम्मान की इच्छा रखते हैं। और आज हम अपनी राह खुद भूल गए हैं। देखा जाए तो राजनीति में नाम मात्र के लिए हमारी-आपकी भागीदारी है क्योंकि देश के लिए निर्णायक समझौते में हमारी कोई विशेष भागीदारी नहीं है हां कुछ चाटूकारों और चापलूसों के रूप में हमारी उपस्थिति जरूर है, ना तो अब तक आठवीं अनुसूची में भोजपुरी भाषा को मान्यता मिली है और ना ही हमारे लिए कोई आभार प्रकट करता है। बाकी हमारे भोजपुरी क्षेत्र से कोई उद्योगपति भी ऐसा नहीं है जो गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे प्रांतों के उद्योगपति से बड़ा हो, एक राजनीतिक पार्टी या राजनेता ढूंढने से भी नहीं मिलेगा जो वास्तव में हमारे भोजपुरी के पक्ष में कुछ कर गुजरने को तैयार हो। हां इतना जरूर है कि संसद में कुछ छूट भैया चापलूस वोट के लिए हमारे-आपके पक्ष में भाषण और ज्ञापन देकर दिल्ली और मुंबई में आराम से राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ जिलों में हमारी भोजपुरी भाषा की उपस्थिति जरूर है लेकिन हमें किसी राज्य में मान्यता नहीं है राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता की बात दूर है। इसके लिए एक और क्रांति तथा बलिदान की जरूरत है जो हमारी भागीदारी एवं गरीमा पूर्ण इतिहास को स्थापित करते हुए देश की दशा और दिशा में सुधार करने में योगदान प्रदान करे। हम सब मोह माया के बंधन में बंधे हैं परन्तु जो नहीं बंधा उसको अपने अधिकार एवं सम्मान के लिए आगे जरूर आना चाहिए।
परन्तु हम पूंजीपतियों द्वारा स्थापित सरकार के गुलाम हैं।
उदाहरणार्थ श्री रामचरितमानस में उद्धृत।। मानस के प्रेरणादायक दोहे/चौपाइयां
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥
प्रस्तुत चौपाई में तुलसीदास जी कहते है ।
जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसके शरीर के छाया के छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से अँकवार भरकर हृदय से लगाकर श्री रामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी, आनंद और प्रेमवश शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो गले मिल रहे हैं, सम्मान दे रहे हैं अपने क्षत्रिय धर्म का पालन कर रहे है॥
*इसका भावार्थ और संदेश यह है कि जो अपने वर्ण एवं धर्म के अनुसार कार्य करते हुए राम को भजता है वह सम्मान प्राप्त करने योग्य है*।
अर्थात यदि ब्राह्मण पूजा पाठ और दान दक्षिणा के लिए मना करता है तो वह अपने धर्म और वर्ण व्यवस्था को अपमानित कर रहा है, यदि चमार, क्षत्रिय एवं क्षुद्र, वैश्य, आदि अपने धर्म और वर्ण व्यवस्था को न मानकर शिक्षा और सम्पन्नता एवं समृद्धि के मद में चूर हो कर विपरीत व्यवस्था अथवा धर्म और वर्ण के अनुसार कार्य करते है तो वह सनातन धर्म और संस्कृति तथा ब्रह्मजी द्वारा संचालित व्यवस्था को खंडित कर रहे हैं। इसमें जात-पात ऊंच-नीच का खंडन नहीं किया गया है और ना ही यह कहा गया है कि कोई भी वर्ण व्यवस्था के विपरीत कार्य करें। सिर्फ मानवता का यह संदेश दिया गया है कि मनुष्य एक दुसरे से भेदभाव न करें, अंधविश्वासी और रूढ़िवादी न बने। लेकिन आज के समाज में उपस्थित वर्ण व्यवस्था इस प्रकार खंडित हो गया है कि समझ में नहीं आ रहा है कि सनातन धर्म में उपस्थित वर्ण व्यवस्था और रीति रिवाजों और संस्कृति को कैसे समझा जाए और वर्णित किया जाए, सब विघटित होता जा रहा है। बहुत कुछ है जो कम शब्दों में कहना या समझाना मुश्किल है। किसी भी वेदों ने पुराणों में या उपनिषद में सनातन धर्म के वर्ण व्यवस्था को और संस्कृति को खंडित या विघटित करने का प्रयोग या प्रयास नहीं किया गया है परन्तु आज के समाज में वैश्विक आधुनिकता ने पूंजीवाद ने सब समाप्त कर दिया है। रामचरितमानस की इस चौपाई एवं प्रसंग को विद्वानों द्वारा ठीक से संदर्भित और सार गर्भित नहीं किया गया है। धन्यवाद
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