जनता जनार्दन को सच और झूठ के पर्दे में रखकर सत्ता के प्रस्तुतकर्ता, संयोजक, निर्देशक और मेज़बान पर्दे बदलने में माहिर है। सत्ता के संगठनात्मक संरचना के प्रधान संगठन के संपादक संप्रभुता और सत्ता के मद (घमंड) में चूर है वो सिर्फ अपने मन की बात करते हैं जनता के मन की बात तथा जनता की मेजबानी करने वाले सांसद और विधायक आदि, प्रधान संपादक के प्रवचन के अनुसार ही बात करते हैं। जनता को अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए आंदोलन, अनशन, न्यायलय और हड़ताल के माध्यम से बातचीत करनी पड़ती है। फिर विद्रोह, देशद्रोह और आरजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। राजनीति के विज्ञान में विभिन्न प्रकार से परीक्षण, निरीक्षण और आविष्कारों का नकारात्मक प्रभाव देश, समाज, अर्थ, धर्म और संस्कृति को प्रभावित करता है जिसका परिणाम आंदोलन, अनशन और हड़ताल है। बाकी क्या कहना। बस इतना ही कहना है कि जनता को सच और झूठ के पर्दे से बाहर निकलना है। जनता अपने प्रतिनिधि मण्डल का नेतृत्व स्वयं करें। जैसे किसान फसल का सैनिक सरहद का शिक्षक शिक्षा का न्यायलय न्याय को सम्मान देते हुए सुरक्षित रखता है ठीक वैसे ही संविधान का सम्मान संसद को रखना होगा। संविधान की सुरक्षा राजनीति विज्ञान के नकारात्मक परीक्षण, निरीक्षण और आविष्कारों से नहीं होगा बल्कि जनतांत्रिक गठबंधन और सकारात्मक सत्ता के सोच से होगा। भारत को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गुलामी से आजाद किसी सत्ता के संगठनात्मक संरचना के प्रधान संगठन के संपादक अथवा कारपोरेट घराने (व्यवसायी), नेता अभिनेता या पत्रकार के कारण नहीं बल्कि जनतांत्रिक गठबंधन के कारण मिला। बाकी क्या कहना विश्व में अनेकों उदाहरण मौजूद है कि। जिस देश की जनता ने देश को गुलामी से आज़ाद किया संविधान और संसद का निर्माण किया आज अर्धज्ञानी और अर्धशिक्षित शासकों की नकारात्मकता और घमंड के कारण गुलामी को मजबूर हैं। क्या कहना, जनता महामारी से परेशान हैं जन सेवक राजनीति में खुशहाल है, राजनीति व्यवसायीकरण की गुलाम है राजनेता मंहगाई से बेहाल है।
।।जय जवान जय किसान।। जय हिन्द।।
