शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

चुनाव प्रचार और प्रसार

प्रिय मित्रों एवं पाठको चुनाव के मुद्दे पर बात करने से पहले कुछ अधिकारों के बारे में बात करना और जानकारी होना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद १९-२२ के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरीक को वाक स्वतंत्रता का अधिकार है चाहे लिखित या मौखिक दोनो प्रकार से एक भारतीय स्वतंत्र है टिप्पणी के लिए परन्तु एक अधिकार और है जिसका नाम मानहानि है अर्थात किसी वस्तु, व्यक्ति और स्थान के मान सम्मान को आपके द्वारा किए गए टिप्पणी से किसी प्रकार से अघात एवं क्षति नहीं पहूंचना चाहिए। एक विड़म्बना यह भी है कि आम नागरीक के लिए लगभग सब कुछ क्षमा योग्य और आम है क्यूंकि समाज और कानून के नजर में उसे आम, ग़रीब और लगभग विवेक विहीन माना जाता है परन्तु जब एक आम व्यक्ति किसी अधिकारीक पद पर आसीन रहता है और जब एक व्यक्ति अपने कर्मो के द्वारा समाज के लिए विशेष हो जाता है तो उसके द्वारा की गयी टिप्पणी और वाक का महत्व बढ जाता है और फिर उसके साथ और उसके लिए संविधान के अंतर्गत कानून में मानहानि का कानून लागू होता है। अब बात करते हैं चुनाव की चुनाव के दौरान प्रचार का प्रसार आज के आधुनिक युग में चरम पर है परन्तु चुनाव आयोग जिसका गठन २६ जनवरी १९५० को हूआ उसका प्रसार आघुनिक युग के अनुसार नहीं हूआ जैसे कि चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों का पालन लगभग न के बराबर है क्यूंकि चुनाव आयुक्त की नजर में सब बराबर हैं और कार्यवाही के रूप में मात्र चेतावनि दे कर और जारी कर के चुनाव प्रक्रिया को जारी रखा जाता है ऐसा होने का मतलब सबूतों (साक्ष्य) का अभाव एवं कमि माना जाता है और सबसे बडा सोचने योग्य और औचित्य पूर्ण बात यह है की चुनाव आयोग स्वयं अपने दिशा निर्देश के पालन होने और न होने का संज्ञान क्यों नहीं लेता चुनाव आयोग के समक्ष जब तक कोई पार्टि, कार्यकर्ता, नेता और राजनेता किसी विरोधी अथवा अन्य पार्टि एवं राजनेता के विरूद्ध चुनाव के लिए जारी निर्देशों के पालन ना किए जाने का विरोध चुनाव आयुक्त के समक्ष दर्ज नहीं करता तब तक आयोग और आयुक्त लगभग आंख कान और जबान बंद करके हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहता हैं और चुनाव प्रचार के नाम पर और बहाने से एक पार्टि एवं नेता अपने विरोधी राजनेता एवं पार्टि पर आरोप-प्रत्यारोप जारी रखते हुए फॉरवर्ड और बैकवर्ड कास्ट (जाति) की राजनीति करते रहते हैं और बैकवर्ड तथा फॉरवर्ड कास्ट के भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं इस तरह राजनीति के खतरनाक खेल में नेता एवं राजनेता एक दूसरे के लिए निजी तौर पर भी आरोप और प्रत्यारोप लगाते हैं और यह चिज और बात राजनीतिक स्तर पर अनुचित और अयोग्य होता है जिसका गंभीर परिणाम हिंसा और आपसी संधर्ष के रूप में सामने आता है और यहाँ चुनाव आयोग का औचित्य शून्य हो जाता है और फिर देश का कानून प्रभाव में आता है और कानून के अंतर्गत चुनाव में कानून की प्रक्रिया का पालन होता है। चुनाव में प्रत्याशी और पार्टि का बड़ा विशेष महत्व होता है जैसे की पार्टि क्षेत्रीय स्तर की न होकर राष्ट्रीय स्तर कि होनी चाहिए और प्रत्याशी के पास धन जन और वाक पटुता के साथ-साथ अपराधीयो, बाहूबलियों और उधयोगपतियों का समर्थन होना अति आवश्यक है पार्टि का विकल्प तो मिल सकता है क्यूंकि कहीं-कहीं क्षेत्रीय पार्टि का वर्चस्व होता है और कभी-कभी निर्दलीय प्रत्याशी भी विजयी हो जाता है लेकिन प्रत्याशी का धनवान होना और अपराधीयों एवं उधयोगपतियों का समर्थन होना अत्यंत आवश्यक है। चुनाव में सबसे मुख्य भूमिका और योगदान जनता, व्यापारि और उधयोगपतियों का होता है क्यूंकि उधयोगपति और व्यापारि के द्वारा पार्टियों को गुप्त दान के रूप धन प्रदान किया जाता है और यह धन चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं और जनता के बिच खर्च किया जाता है जबकी जनता भेड़ चाल चलते हुये एक तरफा मत देती है जिसके परिणाम स्वरूप चुनाव का परिणाम निर्धारित होता है इसके उपरान्त विजेता पार्टि जनता जनार्दन और किसान जनता को भूल कर और उसके हितों का ध्यान न रख कर सिर्फ उधयोगपतियों और व्यापारियों के हित के लिए कार्य करती है जैसे की उधोग और व्यापार के विकास और विस्तार के लिए नीति नियम और कानून का निर्धारण करते हुए उसे लागू करती है और फिर उधयोगपति और व्यापारि अपना उधोग एवं व्यापार स्थापित करके जनता को रोजगार और व्यापार का अवसर प्रदान करते है और सत्ता में मौजूद सरकार को मजबूती प्रदान करतें हैं। इस तरह चुनाव के प्रचार और प्रसार की प्रक्रिया निरंतर जारी रहता है। और जनता जनार्दन अपराध-अपराधीयों का शिकार होते हुये भ्रष्टाचार से हैरान परेशान और त्रस्त रहती है और उघोग-उधयोगपतियों के शोषण और प्रदूषण से दूषित होकर कठिन जिवन यापन करते हुए जिवित रहती है और सरकार को जिम्मेदार मानते हूए अपने जिम्मेदारी को भूल जाती है जबकि जनता को चुनाव के दौरान अपने मत (वोट) के अधिकार का उचित उपयोग करते हुए किसी पार्टि विशेष और व्यक्ति विशेष एवं अपराधी के प्रभाव में अथवा बहकावे में न आकर के अपने मत को नीर्भीक ईमानदार और शिक्षित प्रत्याशी के पक्ष में मत देना चाहिए और इसके साथ-साथ सामुहिक रूप से जागरूक होते हुए चुनाव के दौरान किसी अपराधी और उधयोगपति के शामिल होने पर और सहयोग को चुनाव में देखते हुए इसकी जानकारी चुनाव आयोग को देने के साथ ही इसके लिए चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत एवं आपत्ति दर्ज  करते हुए अपना जिम्मेदारी निभाना चाहिए।
निष्कर्षतः निन्मलिखित बातों का उदेश्य भारत के जनता और युवा को जागरूक करना और चुनाव आयोग के व्यापक विस्तार और प्रसार के आवश्यकता को दर्शाना है क्यूंकि भारत धर्म निरपेक्ष देश है और अमेरीका की तरह भारत में भी संयुक्त सरकार होती है , लेकिन भारत मे केन्द्र सरकार राज्य सरकार की तुलना में अधीक शक्तिशालि है जो की ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर अधारित है और इस प्रकार भारत के द्वारा अमेरीकी लोकतंत्र के आड में ब्रिटेन के लोकतंत्र ढांचे का पालन किया जाता है।। जबकि चुनाव आयोग का नियंत्रण सिर्फ विधान सभा और लोकसभा के चुनावों तक सिमित है और यहां चुनाव आयुक्त का निर्वाचन राष्ट्रपति के द्वारा होता है और अन्य चुनावों का नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग के पास होता है जैसे नगरपालिका, ग्राम पंचायत, महानगर परिषद और जिला परिषद का चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग के अंतर्गत होता है और यहां चुनाव अयोग की नियुक्ति शायद राज्यपाल और राज्य सरकार के द्वारा होता है तथा इन आयुक्तो (अधिकारीयों) को समय से पहले पद से खारीज करने के लिए महाभियोग के प्रक्रिया को जारी करना पडता है ।। स्पष्ट है कि मेरे युवा मित्र एवं पाठको को यह लेख बेहद पसंद आऐगा और किसी त्रृटि पर खेद प्रकट करते हुए उचित टिप्पणी की आशा करता हूं।। जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

सैनिक की अन्तः पुकार

साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।।
यदि हाल मेरी माता पूछे, मुरझाया फुल दिखला देना।।
भारत के नारी की गाथा सुना देना।।
यदि हाल मेरी पत्नी पूछे, इक जलता दिप बुझा देना।।
यदि इतने पर भी न समझे, तो माँग का सिन्दूर मिटा देना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।।
यदि माता मेरी क्रंदन करे, पकड कर उन्हे समझा देना।।
यदि इतने पर भी न समझे, तो भारत के वीरों की गाथा सुना देना।।
यदि हाल मेरा मित्र पुछे तो देश की याद दिला देना।।
यदि संतान रोए तो, हे वीरों अपने सीने से लगा लेना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।
यदि देश का वीर बालक हो अधीर, तो उसे वीरों के बलिदान की गाथा सुना देना।।
यदि मेरी मातृभूमी हो कभी वीर विहीन, तो भारत के वीर माता को जगा देना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना।।
यदि मिले जो कभी कहीं कोई देशद्रोही, सैनिक की अन्तः पुकार सुना देना।।
मै तो ठहरा कलम का फकीर, मेरे मृत्यु पर कलम के चन्द लकीरों से भारत माता की जय लिख कर दिखला देना।।
भारत माता के जय हो का उदघोष विश्व को सुना देना।।
साथी घर जाकर मत कहना संकेतो से बतला देना ।।


(एक अधूरी कविता जिसे पूरा करने का अधूरा प्रयास)

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

मेरे मित्र, पाठक और मैं

मेरे प्रिय मित्रों और पाठको सहयोग एवं सहायता के लिए धन्यवाद। आप सभी को दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। पूर्व या वर्तमान में किसी भी त्रृटि के लिए खेद प्रकट करता हूँ । प्रयास निरंतर जारी है उचित मार्ग दर्शन और टिपप्णी हेतु विनम्र निवेदन है । आज के वर्तमान आधुनिक युग में झूठे और थोडे सच्चे लेख और अनुचित भाषा के द्वारा मनोरंजन और व्यक्ति विशेष के कृपा से कई पत्रकार, ब्लॉगर, साहित्यकार एवं लेखक और अन्य विशेष गणमान्य व्यक्ति इन विशेष कार्य क्षेत्रों में धन और नाम अर्जित कर लेतें हैं परंतु सच्चे और निर्भीक पत्रकार, ब्लॉगर, साहित्यकार और लेखकों को राजनेता, धार्मिक संगठनों और व्यक्ति विशेष के कोप (द्वेष) को झेलना और सहन करना पड़ता है एवं कठिन जीवन बिताते हुए संघर्षशील जीवन जीना पडता है ।। जबकी झूठ और मिथ्यावाद को समिक्षा की जरूरत है परंतु सत्य और सत्यवादिता को किसी समिक्षा का जरूरत नहीं होता है । आधुनिक दुनिया में झूठे, और थोडा सच्चे, मनोरंजक चापलूस पत्रकार, ब्लॉगर, साहित्यकार और लेखकों के श्रोता और दर्शक एवं समर्थक बहूत हैं और दुनिया में इनको विद्वान माना जाता है जबकी एक सच्चे निर्भीक और तटक्ष पत्रकार, लेखक, ब्लॉगर और साहित्यकार का कोई श्रोता, समर्थक और दर्शक नहीं होता है और दुनिया में इनको पागल, बोर और बकवास माना जाता है। जो स्वयं का मित्र है जिसके पास आडम्बर, मिथ्यावाद और धन है जो चतुर वक्ता और चापलूस है उसके अनेकों मित्र और बहूत समर्थक है और ये बात एवं निती आज के इस आधुनिक दुनिया में जरूरी है। मैं सबका मित्र हूं परंतु मेरा कोई मित्र नहीं है क्यूंकि मेरे पास मिथ्यावाद, आडम्बर, और कोई व्यक्ति विशेष नहीं है और न ही मैं चापलूस और धनवान हूं इसलिए मेरा कोई समर्थक भी नहीं है। अकेला निकल पडता हूं हर एक मंजील के राह पर न कोई साथी है न कोई राही पर मेरे साथ मैं होता हूं बेशक डगमगाते हो कदम पर मेरा विश्वाश और हिम्मत कभी नहीं डगमगाता, रास्ते और राही को मैं साथी बनाकर चलता रहता हूं। अंततः मैं आशा करता हूं की जैसे आज के दिन दशहरा पर्व असत्य पर सत्य के जीत का और अच्छाई पर बुराई के जीत का प्रतिक है। इस तरह से एक न एक दिन झूठ का मुहँ काला और सच्चे का बोलबाला जरूर होगा ।। जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

स्वच्छ नैतिकता मेरा स्वच्छ भारत

स्वच्छ नैतिकता का मतलब सिर्फ स्वच्छता से नहीं इसका अर्थ नैतिकता से है हर एक वस्तु और व्यक्ति को राजनिती से ऊपर उठ कर राजनैतिक एवं समाजिक रूप में स्वच्छ होना पडेगा और मानसिक रूप से मजबूत होना होगा और एक ऐसे कानून के लिये तैयार होना होगा जो हमें नैतिक स्तर पर इतना मजबूत कर दे कि हम अपने आप को हर एक रूप एवं स्तर पर स्वच्छ कर दें ।। आज माननिय प्रधान मंत्री जी के उर्जा और संकल्प के भरोसे पर विश्वाश है मुझे और आशा ही नहीं बल्कि पूरा विश्वाश है कि निकट भविष्य में स्वच्छता के लिए कानून भी होगा ।। इस प्रकार आज देश को स्वच्छता के लिए एक कदम चलते हुऐ देखकर मैने दो कदम चलने का संकल्प लिया परन्तु कुछ एक विडम्बनाओं को देखकर हैरान और परेशान हो जाता हूं कि हम अपना गंदगी साफ करके उस व्यक्ति अथवा पडोसी के घर के पास और ऊपर डाल देतें हैं जो आर्थिक और परिवारिक रूप से कमजोर है जबकी उस कूड़ा अथवा गंदगी का उचित स्थान अपने घर का कूड़ादान अथवा नगर का कूड़ा घर है ।। और बेहतर होगा कि आज की गई गलति को फिर दुबारा सर्वजनिक स्थलों पर ना दौहराएं जैसा कि आज इंडिया गेट पर भिड़ के हटने के बाद नजर आया जबकी वो अपना-अपना गंदगी और कूड़ा अपने साथ ले जाकर उसे उसके उचित स्थान कूड़ेदान तक पहूंचाना चाहिए था। विवेक और नैतिकता तो ये कहता है कि सब अपना-अपना काम करें अर्थात हम अपने घर, पड़ोस और सर्वजनिक स्थल को स्वच्छ रखें और कूडे और गंदगी को सफाई कर्मचारीयों के मदद से उसके उचित स्थान तक पहूंचा दें वहा से फिर सफाई कर्मचारी सरकार के मदद एवं सहायता से उसे नष्ट अथवा समाप्त कर दें । मैं अपने प्रधान मंत्री जी का प्रशंसा और अनेकों अनेक धन्यवाद करता हूँ कि एक कोशिश किया इन्होने राजनिती को राजनैतिक बनाने का और एक आशा में निवेदन और विश्वाश यह भी करता हूं कि एक उचित कानून के साथ वैज्ञानिकों के सहायता एवं उद्योगपतियों के मदद से उस कूड़े एवं गदंगी को नष्ट करते हुये उससे उपयोगी उर्जा और उपयोग कि युक्ति एवं साधन देश को प्रदान करें जैसा कि दुनिया के अन्य देश कूड़े को नष्ट करने के लिए प्लानट आदि स्थापित करके उसका उपयोग उर्जा के लिए करते हैं।। निष्कर्षतः हमें खूद के जागरूकता के साथ-साथ सफाई कर्मचारी के क्षमता और देश के कानून को आगे बढाते हुए कुछ कूड़ा रीफाइनरी (ट्रीटमेंट) प्लानट की आवश्यकता है जो शायद देश के कुछ हिस्से में मौजूद है और जैसे हम धार्मिक स्थल, धर्मशाला और सर्वजनिक कार्य आदि के स्थान के लिए श्रम, धन और स्थान का जनता एवं देश के सुख एवं समृद्धि के लिए दान करते हैं ठिक वैसे ही हम सब को अपने देश और अपने समाज को स्वच्छ बनाने के लिए शौचालय और कूड़ाघर एवं कूड़ेदान के लिए धन, श्रम और स्थान का दान करते हुए देश के सुख और समृद्धि में सहयोग करना चाहिए और सरकार से इस कार्य के लिए सहयोग और सहायता लेना चाहिए और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को और लाल बहादुर शास्री जी को याद करते हुए कहना चाहता हूँ ।।
धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए ,
माली सींचे सौ घडा ऋतु आए फल होए ।।
।।जय हिन्द, जय भारत, जय विश्व ।।

रविवार, 28 सितंबर 2014

Socrates सुकरात

सुकरात के अनमोल विचार

Quote 1: An honest man is always a child.

In Hindi :एक ईमानदार आदमी हमेशा एक बच्चा होता है.

Socrates सुकरात

Quote 2: All men’s souls are immortal, but the souls of the righteous are immortal and divine.

In Hindi :हर  व्यक्ति  की  आत्मा   अमर  होती  है  , लेकिन  जो  व्यक्ति  नेक  होते  हैं  उनकी  आत्मा  अमर  और  दिव्य होती  है

Socrates सुकरात

Quote 3: As for me, all I know is that I know nothing.

In Hindi :जहाँ तक मेरा सवाल है , मैं  बस  इतना  जानता  हूँ  कि  मैं  कुछ  नहीं  जानता.

Socrates सुकरात

Quote 4: As to marriage or celibacy, let a man take which course he will, he will be sure to repent.

In Hindi :शादी या ब्रह्मचर्य , आदमी  चाहे  जो  भी  रास्ता  चुन  ले , उसे  बाद  में  पछताना ही पड़ता है .

Socrates सुकरात

Quote 5: Be slow to fall into friendship; but when thou art in, continue firm and constant.

In Hindi :मित्रता  करने  में  धीमे  रहिये , पर  जब  कर  लीजिये  तो उसे मजबूती से  निभाइए  और  उसपर स्थिर रहिये .

Socrates सुकरात

Quote 6: Death may be the greatest of all human blessings.

In Hindi :मृत्यु संभवतः मानवीय वरदानो में सबसे  महान  है .

Socrates सुकरात

Quote 7: By all means, marry. If you get a good wife, you’ll become happy; if you get a bad one, you’ll become a philosopher.

In Hindi :चाहे  जो  हो  जाये  शादी  कीजिये . अगर  अच्छी  पत्नी  मिली   तो  आपकी  ज़िन्दगी  खुशहाल रहेगी ; अगर  बुरी  पत्नी  मिलेगी तो  आप  दार्शनिक  बन  जायेंगे .

Socrates सुकरात

Quote 8: Beauty is a short-lived tyranny.

In Hindi :सौंदर्य एक अल्पकालिक अत्याचार है.

Socrates सुकरात

Quote 9: Where there is reverence there is fear, but there is not reverence everywhere that there is fear, because fear presumably has a wider extension than reverence.

In Hindi :जहाँ सम्मान है वहां डर है ,पर ऐसी हर जगह सम्मान नहीं है जहाँ डर है, क्योंकि संभवतः डर सम्मान से ज्यादा व्यापक है.

Socrates सुकरात

Quote 10: The greatest way to live with honor in this world is to be what we pretend to be.

In Hindi :इस दुनिया में सम्मान से जीने का सबसे महान तरीका है कि हम वो बनें जो हम होने का दिखावा करते हैं.

Socrates सुकरात

Quote 11: Our prayers should be for blessings in general, for God knows best what is good for us.

In Hindi :हमारी प्रार्थना बस सामान्य रूप से आशीर्वाद के लिए होनी चाहिए, क्योंकि भगवान जानते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा है.

Socrates सुकरात

Quote 12: Not life, but good life, is to be chiefly valued.

In Hindi :ज़िन्दगी नहीं , बल्कि एक अच्छी ज़िन्दगी को महत्ता देनी चाहिए.

Socrates सुकरात

Quote 13: From the deepest desires often come the deadliest hate.

In Hindi :अधिकतर आपकी  गहन  इच्छाओं  से  ही  घोर  नफरत  पैदा  होती  है .

Socrates सुकरात

Quote 14: False words are not only evil in themselves, but they infect the soul with evil.

In Hindi : झूठे शब्द  सिर्फ  खुद  में  बुरे   नहीं  होते , बल्कि  वो  आपकी  आत्मा  को  भी बुराई से संक्रमित कर देते हैं.

Socrates सुकरात

Quote 15: Employ your time in improving yourself by other men’s writings, so that you shall gain easily what others have labored hard for.

In Hindi :अपना  समय  औरों  के  लेखों  से  खुद  को  सुधारने  में  लगाइए , ताकि  आप  उन   चीजों  को  आसानी   से  जान  पाएं  जिसके  लिए  औरों  ने  कठिन  मेहनत  की  है .

Socrates सुकरात

Quote 16: He is richest who is content with the least, for content is the wealth of nature.

In Hindi : वो  सबसे   धनवान  है  जो कम से  कम  में  संतुष्ट  है , क्योंकि  संतुष्टि  प्रकृति  कि  दौलत  है .

Socrates सुकरात

Quote 17: It is not living that matters, but living rightly.

In Hindi :सिर्फ जीना मायने नहीं रखता , सच्चाई से जीना मायने रखता है.

Socrates सुकरात

Quote 18: I am the wisest man alive, for I know one thing, and that is that I know nothing.

In Hindi :मैं  सभी  जीवित  लोगों  में  सबसे  बुद्धिमान   हूँ , क्योंकि  मैं  ये  जानता  हूँ  कि  मैं  कुछ  नहीं  जानता  हूँ .

Socrates सुकरात

Quote 19: Worthless people live only to eat and drink; people of worth eat and drink only to live.

In Hindi : मूल्यहीन व्यक्ति केवल खाने और पीने के लिए जीते हैं; मूल्यवान व्यक्ति केवल जीने के लिए खाते और पीते हैं.

Socrates सुकरात

————————————————————————————————

Note: Despite taking utmost care there could be some mistakes in Hindi Translation of Socrates’ Quotes.

निवेदन: कृपया अपने comments के मध्यम से बताएं कि Socrates Quotes का  हिंदी अनुवाद आपको कैसा लगा

शनिवार, 27 सितंबर 2014

एक अशुद्ध बेवकूफ (लेखक हरिशंकर परसाई)

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है। 
मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूँ और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूँ। पर यह महँगा मजा है - मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है - करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं - चिढ़ जाएँ या शुद्ध बेवकूफ बन जाएँ। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, 'अशुद्ध' बेवकूफ हूँ। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूँ। 
अभी जो साहब आए थे, निहायत अच्छे आदमी हैं। अच्छी सरकारी नौकरी में हैं। साहित्यिक भी हैं। कविता भी लिखते हैं। वे एक परिचित के साथ मेरे पास कवि के रूप में आए। बातें काव्य की ही घंटा भर होती रहीं - तुलसीदास, सूरदास, ग़ालिब, अनीस वगैरह। पर मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूँ, इसलिए काव्य चर्चा का मजा लेते हुए भी जान रहा था कि भेंट के बाद काव्य के सिवाय कोई और बात निकलेगी। वे मेरी तारीफ भी करते रहे और मैं बरदाश्त करता रहा। पर मैं जानता था कि वे साहित्य के कारण मेरे पास नहीं आए। 
मैंने उनसे कविता सुनाने को कहा। आम तौर पर कवि कविता सुनाने को उत्सुक रहता है, पर वे कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे। कविता उन्होंने सुनाई, पर बड़े बेमन से। वे साहित्य के कारण आए ही नहीं थे - वरना कविता की फरमाइश पर तो मुर्दा भी बोलने लगता है। 
मैंने कहा- कुछ सुनाइए। 
वे बोले - मैं आपसे कुछ लेने आया हूँ। 
मैंने समझा, ये शायद ज्ञान लेने आए हैं। 
मैंने सोचा - यह आदमी ईश्वर से भी बड़ा है। ईश्वर को भी प्रोत्साहित किया जाए तो वह अपनी तुकबंदी सुनाने के लिए सारे विश्व को इकट्ठा कर लेगा। 
पर ये सज्जन कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे और कह रहे थे - हम तो आपसे कुछ लेने आए हैं। 
मैं समझता रहा कि ये समाज और साहित्य के बारे में कुछ ज्ञान लेने आए हैं। 
कविताएँ उन्होंने बड़े बेमन से सुना दीं। मैंने तारीफ की, पर वे प्रसन्न नहीं हुए। यह अचरज की-सी बात थी। घटिया से घटिया साहित्यिक सर्जक भी प्रशंसा से पागल हो जाता है। पर वे जरा भी प्रशंसा से विचलित नहीं हुए। 
उठने लगे तो बोले - डिपार्टमेंट में मेरा प्रमोशन होना है। किसी कारण अटक गया है। जरा आप सेक्रेटरी से कह दीजिए, तो मेरा काम हो जाएगा। 
मैंने कहा- सेक्रेटरी क्यों? मैं मंत्री से कह दूँगा। पर आप कविता अच्छी लिखते हैं। 
एक घंटे जान कर भी मैं साहित्य के नाम पर बेवकूफ बना - मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूँ

एक प्रोफेसर साहब क्लास वन के। वे इधर आए। विभाग के डीन मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, यह वे नहीं जानते थे। यों वे मुझसे पच्चीसों बार मिल चुके थे। पर जब वे डीन के साथ मिले तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। डीन ने मेरा परिचय उनसे करवाया। मैंने भी ऐसा बरताव किया, जैसे यह मेरा उनसे पहला परिचय है। 
डीन मेरे यार हैं। कहने लगे - यार चलो केंटीन में, अच्छी चाय पी जाए। अच्छा नमकीन भी मिल जाए तो मजा आ जाए। 
अब क्लास वन के प्रोफेसर साहब थोड़ा चौंके। 
हम लोगों ने चाय और नाश्ता किया। अब वे समझ गए कि मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूँ। 
कहने लगे- सालों से मेरी लालसा थी कि आपके दर्शन करूँ। आज यह लालसा पूर्ण हुई। (हालाँकि वे कई बार मिल चुके थे। पर डीन सामने थे।) 
अंग्रेजी में एक बड़ा अच्छा मुहावरा है - 'टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट' यानी थोड़े नमक के साथ लीजिए। मैंने अपनी तारीफ थोड़े नमक के साथ ले ली। 
शाम को प्रोफेसर साहब मेरे घर आए। कहने लगे - डीन साहब तो आपके बड़े घनिष्ठ हैं। उनसे कहिए न कि मुझे पेपर दे दें, कुछ कॉपियाँ भी - और 'मॉडरेशन' के लिए बुला लें तो और अच्छा है। 
मैंने कहा - मैं ये सब काम डीन से आपके करवा दूँगा। पर आपने मुझे पहचानने में थोड़ी देर कर दी थी। 
बेचारे क्या जवाब देते? 'अशुद्ध' बेवकूफ मैं - मजा लेता रहा कि वे क्लास वन के अफसर नहीं, चपरासी की तरह मेरे पास से विदा हुए। बड़ा आदमी भी कितना बेचारा होता है। 

एक दिन मई की भरी दोपहर में एक साहब आ गए। भयंकर गर्मी और धूप। मैंने सोचा कि कोई भयंकर बात हो गई है, तभी ये इस वक्त आए हैं। वे पसीना पोंछ कर वियतनाम की बात करने लगे। वियतनाम में अमरीकी बर्बरता की बात कर रहे थे। मैं जानता था कि मैं निक्सन नहीं हूँ। पर वे जानते थे कि मैं बेवकूफ हूँ। मैं भी जानता था कि इनकी चिंता वियतनाम नहीं है। 
घंटे भर राजनीतिक बातें हुईं। 
वे उठे तो कहने लगे - मुझे जरा दस रुपए दे दीजिए। 
मैंने दे दिए और वियतनाम की समस्या आखिर कुल दस रुपए में निपट गई। 

एक दिन एक नीतिवाले भी आ गये। बड़े तैश में थे। 
कहने लगे - हद हो गई! चेकोस्लोवाकिया में रूस का इतना हस्तक्षेप! आपको फौरन वक्तव्य देना चाहिए। 
मैंने कहा- मैं न रूस का प्रवक्ता हूँ न चेकोस्लोवाकिया का। मेरे बोलने से क्या होगा। 
वे कहने लगे- मगर आप भारतीय हैं, लेखक हैं, बुद्धिजीवी हैं। आपको कुछ कहना ही चाहिए। 
मैंने कहा- बुद्धिजीवी वक्तव्य दे रहे हैं। यही काफी है। कल वे ठीक उलटा वक्तव्य भी दे सकते हैं, क्योंकि वे बुद्धिजीवी हैं। 
वे बोले - यानी बुद्धिजीवी बेईमान भी होता है? 
मैंने कहा - आदमी ही तो ईमानदार और बेईमान होता है। बुद्धिजीवी भी आदमी ही है। वह सूअर या गधे की तरह ईमानदार नहीं हो सकता। पर यह बतलाइए कि इस समय क्या आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं? आपकी पार्टी तो काफी नारे लगा रही है। एक छोटा-सा नारा आप भी लगा दें और परेशानी से बरी हो जाएँ। 
वे बोले - बात यह है कि मैं एक खास काम से आपके पास आया था। लड़के ने रूस की लुमुंबा यूनिवर्सिटी के लिए दरख्वास्त दी है। आप दिल्ली में किसी को लिख दें तो उसका सेलेक्शन हो जाएगा। 
मैंने कहा - कुल इतनी-सी बात है। आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं। रूस से नाराज हैं। पर लड़के को स्कॉलरशिप पर रूस भेजना भी चाहते हैं। 
वे गुमसुम हो गए। मुझ अशुद्ध बेवकूफ की दया जाग गई। 

मैंने कहा - आप जाइए। निश्चिंत रहिए - लड़के के लिए जो मैं कर सकता हूँ करूँगा। 
वे चले गए। बाद में मैं मजा लेता रहा। जानते हुए बेवकूफ बननेवाले 'अशुद्ध' बेवकूफ के अलग मजे हैं। 
मुझे याद आया, गुरु कबीर ने कहा था - 'माया महा ठगिनि हम जानी'

।। मुसाफिर जिदंगी ।।

मुसाफिरखाना है मंजिल जिदंगी मुसाफिर है ।।
पडाव डालते हुए सफर के साथ मंजिल तक चलना है ।।
तेज आंधी में मुझे चिराग बन के जलना है ।।
जिदंगी के राह में हारें सदा पाई वफा करके बेवफाई पाई।।
शराफत से जिदंगी जी कर सजा में चोट खाइ ।।
जिदंगी के कठिन राह में मिल जाये जो किनारा
उठती हुई लहरों से मंजिल बदल जाती है ।।
कहाँ है मंजिल मेरी देता हूँ जब भी आवाज
उसे जिदंगी फिर से मुसाफिर बन जाती है ।।
वफा के राह में अक्सर मुझे बेवफाई मिल जाती हैै ।।
मुसाफिरखाना है मंजिल जिदंगी मुसाफिर है ।।

व्यक्ति विशेष

स्वामी विवेकानन्द जी एक महान दार्शनिक और समाजसेवी है और उन्होने जब अपना भाषण हिन्दी भाषा में विदेशी पटल पर संबोधित किया था तो तब एक दार्शनिक और समाजसेवी के रूप में और सामाजिक स्तर पर संबोधित किया है और वह एक दौर था जब हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को अंतराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एवं प्रदर्शित करना था और अपने राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर करना था ।। और आज नरेंद्र मोदी जी एक राजनेता के रूप में और राजनीतिक तौर पर विदेशी पटल में हिन्दी में भाषण करके राष्ट्रवाद जैसे दोष को मजबूत करेंगे अंततः इस भाषण का अनुवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यालय हेतु सर्वमान्य अंग्रेजी भाषा में किया जायेगा और फिर कुछ हद तक राष्ट्रवाद के दोष को समाप्त किया जायेगा ।
इस तरह से साबित है कि एक राजनेता के द्वारा विदेशों में राजनीतिक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी में संबोधित न करके अपने राष्ट्रीय भाषा में सम्बोधीत करने का औचित्य सिर्फ क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद जैसे दोष को बढावा देते हुए क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद को मजबूत करना है क्यूंकि एक राजनेता जबतक आपसी मतभेद और कटुता को बढायेगा नहीं तब तक उसके राजनेता होने का औचित्य पूरा नहीं होता ।। और राजनेताओं के पास राजनीति करने का मुद्दा क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद ही तो है यदि इन्ही दो दोष एवं मुद्दे का प्रभाव कम हो जायेगा अथवा समाप्ति हो जाऐगा तो फिर इनके जैसे महान राजनेता एवं नेता पैदा कैसे होंगे ।। जय हिन्द, जय भारत, जय जवान, जय विश्व।।

पेपर लीक का असली जिम्मेदार कौन?, शिक्षा व्यवस्था या सिस्टम?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था: बदलाव, चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता भारत की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं और आगे भी होत रहने च...