स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार
नमस्कार दोस्तों, इस लेख को अंत तक जरुर पढ़े, जिसमें कुछ प्रमुख पहलुओं और विषयों पर मैं अपना स्वयं से साक्षात्कार प्रस्तुत करने वाला हूं। इस लेख में मात्र वर्णनात्मक तथ्यों का विश्लेषण किया गया है। जिसके अंतर्गत वर्तमान के समाजिक और आर्थिक समस्याएं एवं कारण का वर्णन है।
चलिए शुरू करते हैं।
धर्म और जाति के आधार पर चलने वाली दुनिया में हर एक इंसान एक दुसरे पर निर्भर है। इसलिए एक विश्व एक चुनाव असम्भव है, परन्तु एक देश एक चुनाव सम्भव है, जिससे हमारे लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक मूल्यों की स्थापना होती है।
विश्व में एक दुसरे कि निर्भरता को पूरा करने के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षा-दीक्षा और नीति निर्देशक तत्व है।
जैसी शिक्षा-दीक्षा एवं नीति आप ग्रहण करेंगे, और जिस धर्म और जाति से आप संबंध रखेंगे, लगभग आपका आचार व्यवहार एवं बुद्धि वैसा ही कार्य करेगी है। जैसे कि हम शिक्षा-दीक्षा के अनुसार कर्म के आधार पर देखें तो, हम शिक्षक, समाजसेवी, डाक्टर, राजनेता, जवान किसान और धर्म गुरु आदि बनते है।
लेकिन सबका दिमाग अर्थात बुद्धि और संस्कृति एवं संस्कार एक जैसी नहीं होती है।
लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था पर साहूकारों और लालाओं का कब्जा रहा है, और अब तो इन्होंने राजनीति पे भी कब्जा कर लिया है। जिसका गंभीर दुष्परिणाम परिणाम देखने को मिल रहा है, क्योंकि जैसे व्यापार के लिए साहूकारी और लाला गिरी के ज्ञान का होना आवश्यक है। ठीक वैसे ही राजनीति के लिए साम दाम दंड भेद का ज्ञान चाहिए।
अब मैं यदि विस्तार में बात करूं तो जैसा कि मैंने बताया है कि जैसी शिक्षा-दीक्षा एवं नीति आप ग्रहण करेंगे, और जिस धर्म और जाति से आप संबंध रखेंगे, लगभग आपका आचार व्यवहार एवं बुद्धि वैसा ही कार्य करेगी।
अब मुख्य मुद्दा यह है कि, जैसे एक हिन्दू, मुस्लिम नहीं हो सकता और एक सीख इसाई नहीं हो सकता लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से और एक दुसरे के ऊपर निर्भर होने के कारण हम अपने अर्थ और नीति का आदान-प्रदान करते हैं।
ठीक ऐसे ही ब्राह्मण ज्ञान विज्ञान शिक्षा दीक्षा में क्षत्रिय राजपाट में, बनिया व्यापार में, और शुद्र सेवाभाव और परम्परागत कला में निपुण हो सकता है, और होना चाहिए।
लेकिन आज कल किसी का कुछ पता नहीं की कौन कब क्या कर बैठे।
सब अपने आप को चाणक्य बता कर शकुनि का कार्य कर रहे हैं। लेकिन वो भूल गए हैं कि, चाणक्य ब्राह्मण धर्म से सम्बन्धित थे, इसलिए जो इस नीति का प्रयोग करेगा उसमें ब्रह्मतत्त्व का होना आवश्यक है, जो कि लगभग मुश्किल है, क्योंकि उनकी नीति धर्म और शास्त्रों के अनुसार है, और हां ब्राह्मणों के कुल में रावण भी था लेकिन उसकी नीति धर्म और शास्त्रों के आधार पर नहीं थी, इसलिए रावण बनना आसान है।
रही बात भगवान राम, कृष्ण एवं परशुराम की तो वे भगवान है, हम कभी भी वैसा नहीं हो सकते हैं लेकिन उनके आदर्शो एवं आदेशों का पालन जरुर कर सकते हैं।
अब यदि हम अपने धर्म के अनुसार शकुनि, दुर्योधन, राम, रावण, कंस, कृष्ण और संजय आदि के चरित्र को देखें तो ये सब हमारे प्रमुख ग्रंथ महाभारत और रामायण आदि के मुख्य पात्र थे जो कि हमारे सप्त ऋषियों के वर्ण अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और क्षूद्र वर्ण से थे। परन्तु रामायण और महाभारत काल में 'बनिया' (वैश्य) जाति का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।
इसलिए जिसका जो काम है वही करे, और जिसकी जैसी शिक्षा-दीक्षा एवं धर्म कर्म है वही करे। फ़ालतू का राम, कृष्ण और परशुराम बनने की कोशिश ना करें सिर्फ इनके आदर्शो और आदेशों का पालन करना चाहिए। इनका नाम लेकर, और इनको साक्षी मानकर रावण शकुनि दुर्योधन कंस के जैसा अमानवीय कार्य करना बंद करें नहीं तो, राम के नाम से पहले परशुराम का नाम आता है, श्रीराम जी और कृष्ण जी तो शरीर त्याग कर अंतर्ध्यान हो गए परन्तु परशुराम आज भी है जो कि प्रलयंकर है, और हम नहीं चाहते कि उनके आदर्शो और आदेशों को हम लागू करें। जैसा की आज कल राम के नाम पर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है।
और हां मानवीय रिश्ते नाते, श्रीराम के आदर्शों और मूल्यों पर आधारित होना चाहिए ना कि रावण के।
यदि समझ ना आया हो तो आराम से दुबारा सुनो। साहुकारी और लाला गिरी छोडो। भारत को भारत रहने दो।
जब गीता और रामायण में वर्णित नहीं है कि साहुकारी और लाला गिरी क्या है, तो फिर हर बात अथवा कार्य को व्यापारिक दृष्टिकोण से क्यों देखते हो।
बेरोजगारी, महंगाई, भुखमरी, गरीबी, व्यभिचार और अत्याचार बढ़ता जा रहा है, और हम नारा लगा रहे हैं कि देश में असंगठित क्षेत्र में व्यापार अथवा रोजगार की कमी नहीं है, जबकि काम के घंटे बढ़ गये, कार्य कुशलता के बजाय मजदूरी और मजबूरी बढ़ गई, मुफ्तखोरी के चक्कर में मुफ्त राशन, मुफ्त की जेनेरिक दवाएं और योजना देकर कहते हैं कि भुखमरी और मंहगाई कम हो गई। उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के नाम पर प्रबुद्ध वर्ग का शोषण करके, कर्ज दे कर और कहते हैं कि व्यभिचार और अत्याचार खत्म हो गया, राम राज्य आने वाला है ।
और ये कुछ शकुनि दुर्योधन कंस और रावण प्रवृत्ति के साहुकार (व्यापारी) और राजनीतिज्ञ की देन है, कि ऐसा हो रहा है। आम हो या खास जो इनकी जी हजूरी करेगा, अत्याचार बर्दाश्त करेगा, आंख कान मुंह बंद करके रहेगा वहि बचेगा नहीं तो उसके रोजी रोटी और परिवार को ये बर्बाद कर देंगे। अब लगता है, की जैसे ये राम को लाये है, हमें भी परशुराम को लाने की जरूरत है।
वर्तमान में राजनेताओं का जो झुंड है वो शेर के खाल में भेड़िया है, यदि हम आज कल की राजनीति पर दृष्टि डालें तो पता चलेगा कि, ये अपने कार्यकाल के दौरान लागू नीति एवं योजनाओं का विस्तृत विवरण ना दे कर पूर्व के नेताओं के द्वारा लागू नीति एवं योजनाओं का बखान करते हैं, प्राचीन काल और भूत काल की बातें करते हैं।
क्योंकि ये उन के जैसे विद्वान नहीं है, इनको धर्म और शास्त्रों का उतना ज्ञान नहीं है, और ना ही इन्होंने उनके जैसा शिक्षा दीक्षा ग्रहण किया है। गांधी जी, उपाध्याय जी, अटल जी, राजीव जी, लोहिया जी, अम्बेडकर जी, अब्दुल कलाम जी, मनमोहन जी जैसे राजनेता एवं समाजसेवी उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हुए थे, यहां तक कि वो शिक्षार्थी रहते हुए गोल्ड मेडल सहित कई तरह के उपाधियों को प्राप्त कर चुके थे। आज भी उच्च शिक्षा प्राप्त और धर्मशास्त्र का ज्ञान रखने वाले नेता, समाजसेवी और साहूकार मौजूद हैं, लेकिन वर्तमान के साहुकार और लाला बुद्धि के नेताओं ने उनको अत्याचार और शोषण के माध्यम से देश सेवा और राष्ट्रहित से वंचित कर दिया है, ये मूर्ख जनता वर्तमान के भेड़िया रुपी नेताओं के चक्कर में लगभग समस्त जनमानस भेंड़चाल चलते हुए अंधभक्ति में नारेबाजी करने में व्यस्त है, कर्जखोरी, मुफ्तखोरी और नशाखोरी में लगी हुई है, क्योंकि हमारे खिलाफ भारत सहित विश्व के कुछ अमानवीय पूंजीपतियों की साजिशें हो रही है, हमें वो अपना दास और नोकर बना कर रखना चाहते हैं, हमारे जल जमीन जंगल और जानवर पर कब्जा करना चाहते हैं।
पूंजीवादियों ने जल, जमीन, जंगल और जानवर सहित इन्सान के साथ ही मानवता एवं धर्म का व्यापार करना शुरू कर दिया है, जो कि हमारे पतन एवं दुर्गति का कारण है। ये पूंजीवादी साहूकार लाला भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में अजब-गजब नियम कानून लागू कर रहे हैं, जिससे कि आम जनमानस का जानवरों की तरह इस्तेमाल हो रहा है।
आगे का विवरण इस प्रकार है कि, यदि हमें विश्वगुरु भारत बनाना है तो इन साहूकारों और शिक्षा दीक्षा एवं धर्मशास्त्र के अर्ध ज्ञानी झूठ बोलने वाले राजनेताओं एवं समाजसेवी साहूकारों को सत्ता से बेदखल करने के लिए जनता को जागरूक और शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है, और निर्भीकतापूर्वक इनका विरोध करते हुए राष्ट्रहित में सवाल उठाते हुए स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार प्रस्तुत करना होगा। अपने परिवार और समाज को भेंड़चाल और मुफ्तखोरी चापलूसी, चाटूकारिता से दूर रखना होगा। परिवार में साहुकारी और लाला गिरी ना करते हुए अपने धर्म ग्रंथों रामायण और गीता में वर्णित आदर्शो एवं आदेशानुसार व्यवहार करने की जरूरत है,
एक बार प्रयोग के साथ प्रयास करें, मेरा उद्देश्य उपदेश देना और कहानी सुनाना नहीं है, हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे और आगे आने वाली पीढ़ियों को कर्जखोरी, मुफ्तखोरी, नशाखोरी और अत्याचार एवं व्यभिचार आदि का अत्यधिक सामना ना करना पड़े।
आपके जानकारी के लिए मैं बता दूं कि, किसी भी मुफ्त की सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले रहा हूं, और ना ही किसी नशाखोरी के बस में एवं अधीन हूं, किसी की जी हजूरी और अत्याचार बर्दाश्त नहीं करता हूं, जबकि मैं भी इनके साजिश का शिकार हो कर कर्जदार हो गया हूं, लेकिन कर्ज हमारे द्वारा बैंकों को प्रदान किए गए कर दान के माध्यम से प्राप्त हुआ था। अब तो इन्होंने अपने साजिश और उल्टे सीधे नियम कानून को लागू करके रोजी-रोटी कमाने में भी मुश्किल पैदा कर दिया है, लेकिन मेरी पुरी कोशिश है कि भ्रष्टाचार, व्यभिचार, नशा आदि ना करुं और इनका दास और नौकर बनकर जी-हजूरी ना करुं। मैं अपने स्वाभिमान के साथ संघर्ष कर रहा हूं क्या आप सब भी करेंगे। धन्यवाद















