मंगलवार, 16 सितंबर 2025

Earning, Jobs, Business, Corruption, Politics, धर्म-जाति और हमारी Economy का सच क्या है ?

 "नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका आज के रचनात्मक मुद्दे में, यहां हम बात करेंगे earning, jobs, business, corruption, politics, धर्म-जाति और हमारी economy की सच्चाई के बारे में।

मैं यहां सिर्फ सांकेतिक तथ्यों को उजागर करुंगा बाकी उदाहरण और तथ्य आपको सोशल मीडिया, निजी आंकलन और सरकारी आंकड़ों के माध्यम से प्राप्त हो जाएगा।

आर्टिफिशियल कोरोनावायरस ने विश्व में मानव और मानवता से संबंधित, रिश्ते-नाते, दोस्ती-यारी और दुनियादारी सबकुछ समाप्त करने का प्रयास किया था लेकिन जिन मुद्दों की मैं बात कर रहा हूं वो शायद इस वायरस से ज्यादा खतरनाक है।

अक्सर हमारे दिमाग में ये सवाल आता है कि अगर किसी को कमाने का ख्याल आए, तो वो क्या चुनेगा? नौकरी करेगा, या फिर बिज़नेस? और जब वो इस रास्ते पर निकलता है, तो उसे किन-किन मुश्किलों, भ्रष्टाचार और टैक्स के जाल से गुजरना पड़ता है।

आज हम इन्हीं सब सवालों पर बात करेंगे — बिना घुमाए-फिराए, सीधे शब्दों में।"

भारत एक युवा देश है।

65% आबादी 40 साल से कम उम्र की है।

लेकिन सवाल ये है कि –

इतनी बड़ी आबादी के पास रोज़गार और व्यापार के अवसर क्यों नहीं हैं?

"जब भी किसी इंसान को कमाने का ख्याल आता है, सबसे पहला सवाल उसके सामने यही खड़ा होता है कि नौकरी करूँ या बिज़नेस?

नौकरी में fixed salary है, थोड़ी security और limited growth होती है। वहीं बिज़नेस में risk ज़्यादा है, लेकिन कमाने की ceiling नहीं है, आप जितना मेहनत करेंगे उतना ही सफल होंगे।

लेकिन इंडिया में समस्या ये है कि educated लोग भी नौकरी की लाइन में लग जाते हैं क्योंकि system ने उन्हें risk लेने से डरा दिया है।"

व्यापार के लिए रिस्क लेना भी सबसे बड़ा रिस्क है, क्योंकि भारत मे धारणा है कि, व्यापार सिर्फ लाला बनिए ही कर सकते है। जिसका नतीजा यह है कि सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है।

यदि अपवाद के रूप में कुछ अन्य जाति वर्ग  के लोगो ने व्यापार करते हुए राष्ट्रनिर्माण में अपना सहयोग प्रदान किया है या कर रहे हैं तो, उनका भी व्यापारिक भागीदारी भारत में कम विदेशों में ज्यादा है। 

अब मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे अत्याचार या अराजकता के विषय पर चर्चा नहीं करुंगा, क्योंकि नेपाल, बंगला देश, श्रीलंका में जनता ने विरोध प्रदर्शन करते हुए तानाशाही और भ्रष्टाचार को खत्म करने का सफल प्रयास किया है।

और ना ही मैं किसी युद्ध अथवा संघर्ष की चर्चा करुंगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मिडिया और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इन सभी मुद्दों को दुनिया के सामने उजागर किया गया है। हमारे यहां तो सिर्फ व्यक्ति विशेष को ही मिडिया में दिखाया जाता है।

Tangible मूर्त और अमूर्त Intangible Businesses और Skilled Jobs क्या है। Business और नौकरी सिर्फ एक type का नहीं है।

👉 Tangible Businesses – जो physical product se जुड़े हैं:

जैसे manufacturing, दुकानदारी, FMCG, agriculture based ventures. आदि 

👉 Intangible Businesses – जो services, ideas, ya digital platforms पर चलते हैं:

जैसे consultancy, software development, digital marketing, content creation, finance advisory, share market आदि 

अब आते हैं Jobs पर –

👉 Skilled Jobs: doctor, engineer, architect, technician, IT professional आदि – जिनमें specific training/education चाहिए।

👉 Productive Jobs: जो directly production aur services में value create करते हैं – जैसे teachers, nurses, artisans, farmers, delivery workers. आदि 

तो आज का youth इन options के बीच continuously confused है।

India की reality देखिए –

👉 Population 140 करोड़ से ऊपर,

👉 लेकिन quality jobs इतनी नहीं हैं।

हर साल लाखों graduate निकलते हैं, लेकिन उनकी skills market demand से match नहीं करती।

Result यह है कि,

Overqualified लोग छोटी-छोटी jobs कर रहे हैं।

Underqualified लोग desperate होकर किसी भी काम में लग जाते हैं,

और educated unemployed का सबसे बड़ा crowd India में है।

भारत में जनसंख्या वृद्धि के साथ ही पढ़ें लिखे बेरोजगारों की तादाद बहुत ज्यादा है।

Opportunities हैं, लेकिन सही दिशा में नहीं।

Business ecosystem इतना friendly नहीं है कि हर youth confidently startup शुरू कर दे।

अब तक कि सरकारें Employment & Business क्यों नहीं ठीक कर पाईं ?

क्यों सरकार Employment और Business Creation में Fail होती रही है।

अब बड़ा सवाल यह है कि जितनी भी अब तक कि सरकारें हैं वो बार-बार fail क्यों हो रही है?

इसका कारण यह है कि।

👉 Policy aur ground reality में gap है।

👉 Bureaucracy aur corruption हर अच्छे plan को slow कर देते हैं।

👉 Skill development schemes सिर्फ papers पर चलती हैं, execution weak है।

👉 Taxation aur licenses इतने complex हैं कि small business owner डर जाता है।

जिसका नतीजा यह होता है कि हमारे पढ़ें लिखे युवा या तो abroad चला जाता है, या फिर frustrated होकर किसी भी average job में adjust कर लेता है।

System इतना biased है कि…

👉 जो government के close हैं, dalali aur chamchagiri karte hain, उन्हें आसानी से contract, license, business opportunity मिल जाती है। ये पहले भी होता था लेकिन अब हद से ज्यादा हो रहा है।

बेरोजगारी का आलम ऐसा है कि, पढ़ा लिखा नौजवान रेहड़ी पटरी पर छोटा-मोटा धंधा कर रहा है, या फिर उच्च शिक्षा प्राप्त कर विदेशों में नौकरी कर रहा है, और नहीं तो तस्करी और विभिन्न प्रकार के अपराध करने पर मजबूर है।

 या फिर हम अपने देश के लालाओं और व्यापारियों की गुलामी कर रहे है,

 अब तो, सुनने में आ रहा है कि सरकार श्रम कानून में संशोधन के माध्यम से, काम के घंटे को सप्ताह में 48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे करने जा रही है, इतना ही नहीं विरोध करने के लिए कर्मचारी यूनियन के अधिकारों को भी समाप्त किया जा रहा है। जो दुनिया में मानवता के खिलाफ है। अमानवीय कृत्य है।

👉 बाकी लोग, चाहे कितना ही सक्षम हों, मजदूरी या मजबूरी में job करते रहते हैं।

यानी merit योग्यता से ज्यादा “setting” aur “jugaad” काम करता है।

और इसी को बनिया-बुद्धि कहते हैं, इतिहास गवाह है ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से अंग्रेज़ भी व्यापारी अथवा बनिया बन कर भारत में व्यापार करने आए थे, और फिर देश के कुछ दलालों और व्यापारिक लाला बुद्धि के व्यक्ति विशेष के मदद से, फूट डालो राज करो की निति से हमें गुलाम बना लिया था।

बहुत मुश्किल से आजादी मिली है, लेकिन आज फिर हम बनिया और लाला बुद्धि के कारण, आपसी मतभेद और राजनीतिक साजिश का शिकार होने के लिए विवश हैं। 

गलती हमारी नहीं, बल्कि हमारे भोग-विलास, आत्मदंभ और आत्ममुग्धता के साथ ही चरित्रहीनता की है।

Jumle aur Tax के जरिए जनता को कैसे लुभाया और लूटा जा रहा है। समझने की कोशिश करें।

Politicians जनता को जुमलों और सपनों से लुभा कर लूट रहे हैं – जैसे कि 

“15 लाख आएंगे”, “2 करोड़ jobs आएंगी”, “Make in India”, “Digital India” …

लेकिन ground पर reality कुछ और होती है।

जो काम थोड़ा-बहुत होता भी है, उसके लिए भी जनता से tax वसूला जाता है।

यानी जनता अपना ही पैसा देकर फिर से facilities खरीद रही है। और ये नालायक नेता एवं सामाजसेवी अपने भाषणों और जुमलों में जनता के सामने किसी सार्वजनिक योजना और राष्ट्रहित में किये गये कार्यों के लिए ऐसा उल्लेख करते हुए कहते है कि मानो की जैसे अपने तनख्वाह और जमीन जायदाद को जनमानस के भलाई के लिए खर्च कर दिया हो।

Businessmen GST और  multiple compliance से जनता परेशान हैं,

Job करने वाला income tax के  चक्कर में फँसा है।

और ऊपर से सरकार हर काम के लिए जनता से पैसा लेती है – roads बनाने हों या सरकारी schemes चलानी हों।

इसीलिए हर आदमी भारत में politician या फिर समाजसेवी बनना चाहता है, राष्ट्र सेवा और जनता के समस्या को दूर करने के लिए नहीं बल्कि,

Luxury lives, VIP culture, security cover और foreign trips enjoy करने के politician और समाजसेवी बनना चाहता है। उसे भोग-विलास, आत्मदंभ और आत्ममुग्धता के साथ ही अपने चरित्रहीनता का आनन्द लेना है इसलिए वो एक नेता बनान चाहता है 

पहले से ही ऐसा सिस्टम चलता आ रहा है, लेकिन वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों, नागरिक कर्तव्यों और सामाजिक एवं सांस्कृतिक ढांचे को इस कदर ध्वस्त किया जा रहा है कि, जनता आपसी मतभेद और राजनीतिक साजिश का शिकार हो रही है। 

विदेशों में रहने वाले, नौकरी और व्यवसाय करने वाले भारतीय को भी हमारे नालायक नेताओं द्वारा बरगलाया जा रहा है, नेता विदेशों में जाकर राष्ट्रभक्ति के साजिश के तहत अपनी जय जयकार कराते हैं, जिसका नतीजा यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय अपने विदेशी कर्मभूमि एवं जन्मभूमि के प्रति निर्धारित दायित्वों को भूलकर नेताओं की जय जयकार कर रहे हैं। 

जिसका घातक परिणाम यह हुआ है कि, इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में नागरिकता प्राप्त कर चुके भारतीय को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

सबसे dangerous point यही है –

सरकारें अपनी नाकामियों को corruption (भ्रष्टाचार), dalali  (दलाली) jumlon (जुमलों) और criminalization से cover करती है।

जैसे कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर जो भी राजनीतिज्ञ, व्यापारी और समाजसेवी इमानदारी से काम करेंगे और आम जनता के भलाई के लिए योजनाएं बना कर लागू करेंगे उन्हें, कानून में बदलाव करके अथवा निजी तौर पर प्रताड़ित करके अपमानित किया जा रहा है। इसके तमाम उदाहरण है, जिससे हमारे न्यायिक और प्रशासनिक अधिकारीयों के साथ ही नियामक संस्था भी मजबूर होकर भ्रष्टाचार का समर्थन कर रहे हैं।

मैं उदाहरण के लिए किसी नेता, व्यापारी, धर्म अथवा जाती का नाम लेकर वाद-विवाद नहीं करना चाहता हूं, क्योंकि मैं खुद प्रबुद्ध वर्ग, और हिन्दू धर्म से संबंध रखता हूं।

अपने इमानदारी और बेबाकी का नतीजा भुगते हुए नौकरी और व्यापार दोनों में साजिश का शिकार होकर, बेरोजगारी और भुखमरी के कगार पर हूं।

👉 और ये दुष्चक्र जनता तक पहुँच गया है।

आज honest इंसान survive नहीं कर पाता।

मजबूरी में लोग भी रिश्वत, dalali, चोरी, illegal काम करने लगते हैं।

System ऐसा बन चुका है कि 

जो बनिया-बुद्धि, दलाली और लालागिरी में माहिर हैं, वही फायदा उठा रहे हैं।

Contractor, middleman, aur political links वाले लोग घुमा-फिरा कर पैसा बना लेते हैं।

लेकिन 

Common आदमी चाहे कितना भी इमानदारी से काम करे, उसे बार-बार bureaucracy और tax structure  के चुंगल में फंसना पड़ता हैं।

यानी हमारे लिए एक ऐसा सिस्टम तैयार किया गया है जिसमें indirectly जनता को भी corrupt बनाया जाता है।

ये सिर्फ आर्थिक failure नहीं, moral failure अर्थात नैतिक असफलता भी है।

क्योंकि जनता को सरकार ने कर्ज देकर, टेक्स के पैसों से मुफ्त सुविधा देकर, सस्ते दामों पर शराब और मुफ्त का राशन आदि जैसे सुविधा देकर, मौजूदा भ्रष्ट सिस्टम के अनुसार जिंदगी बिताने पर मजबूर कर दिया है।

धार्मिक उन्माद और क्षेत्रवाद

"एक और बड़ी समस्या है — धार्मिक और क्षेत्रीय राजनीति भी केन्द्रीय राजनीति के द्वारा व्यवसायिक बना दिया गया है।

मतलब कि हम अपने क्षेत्र के गांव शहर में जल, जंगल, और जमीन को निजी या सार्वजनिक रूप से उपयोग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सब व्यवसायिक बनाया जा रहा है।

जब भी जनता रोजगार और रोज़मर्रा की परेशानियों की बात करती है, नेताओं के पास कोई ठोस जवाब नहीं होता।

तब क्या किया जाता है?

कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर लोगों को बाँटा जाता है,

कभी क्षेत्रवाद (North vs South, Bihari vs Marathi, Outsider vs Insider) को हवा दी जाती है।

इसका सीधा असर jobs और business पर पड़ता है। आजकल अखबारों में नौकरियों से संबंधित इश्तिहारों के लिए जगह बहुत कम होती जा रही है, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से संबंधित समाचार तथा तथ्यात्मक खबरें प्रतिष्ठित अखबार न्यूज चैनल आदि में ना के बराबर है, लेकिन सरकारी जुमलों, और नेताओं के व्यक्तिगत राजनीति से संबंधित ख़बरों का बोलबाला है, एक तरह से हम कह सकते हैं कि, नोट बंदी और डिजिटलाइजेशन और प्राइवेटाइजेशन के माध्यम से आम जनता, प्रबुद्ध वर्ग, और ईमानदारों को घुटनों के बल पर खड़ा कर दिया गया है। 

यदि आपने इस प्रकार के भ्रष्टाचार, और अनियमितता के खिलाफ बोलने या फिर कार्यवाही करने का सोचा तो कोई फायदा नहीं क्योंकि आप जिस अदालत या अधिकारी अथवा नेता से शिकायत करेंगे वो पहले ही मजबुर होकर भ्रष्टाचार करने और गुलामि करने के लिए तैयार है। बाकी आप खुद समझदार हैं, कि क्या हो रहा है और क्या हो सकता है। 

जो youth skill और मेहनत से आगे बढ़ सकता है, उसे caste, धर्म और language के नाम पर बरगला कर विचलित किया जाता है।

नतिजा यह होता है कि, असली मुद्दे गायब हो जाते हैं, और जनता आपस में लड़ती रहती है।"

"अब बात करते हैं परिवारवाद और जातिगत आरक्षण की।

राजनीति और नौकरशाहि में परिवारवाद ने system को पूरी तरह से घेर लिया है। नेता और नौकरशाह बनते ही पूरे परिवार को कुर्सी और ठेका मिलता है।

Merit योग्यता की जगह surname और relation ज़्यादा काम करता है।

आजकल विश्व में भारत के सनातन संस्कृति, विद्वानों और अविष्कारों से ज्यादा भारत के नेताओं, दलालों और व्यापारियों का बोलबाला है, जो black को white करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। मतलब धंधा करना है तो चंदा देना है।

जिसका ताजा उदाहरण electoral bonds Scam है।

व्यक्तिगत, जातिगत समीकरण के आधार पर राजनीति करने वालों नें, आम जनता का हाल ऐसा कर रखा है कि, ना समय पर नौकरी मिलती है, ना स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध है, और ना ही कोई व्यापार के लिए ठोस व्यवस्था है, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रोजगार और व्यापार को सरकार ने लाला और बनियों का दुकान बना दिया है।

 निजीकरण के माध्यम से जनता को एक व्यक्ति विशेष के समुदाय का गुलाम बनने और जी हजुरी करने पर मजबूर कर दिया है।

परिवर्तन जरूरी है, लेकिन ऐसा परिवर्तन किस काम का जो, हमारे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को ध्वस्त कर दे।

हर एक क्षेत्र में निजीकरण हो रहा है जिसका परिणाम यह है कि, यदि नौकरी और व्यवसाय मिल भी जाए तो जनता को समय पर जरुरत पड़ने पर ना तो तनख्वाह (Salary) मिलती है और ना ही व्यापार से लाभ मिलता है। यहाँ तक की gratuity और बोनस भी अब नहीं मिलता क्योंकि आपको कान्ट्रैक्ट के तौर पर नौकरी मे रखा जाता है,

राम नाम सुखदाई है, लेकिन जब इस नाम का राजनीतिकरण किया जाता है तो बहुत ही दुखदाई है।

अब Reservation के मुद्दे पर विचार करें तो।

Reservation शुरू हुआ था social justice और बराबरी के लिए — जो बिल्कुल सही था।

लेकिन आज system इतना caste-centric हो गया है कि,

Reservation को हर बार political weapon बनाया जाता है।

सवाल यही है –

क्या हम अपनी youth power को ऐसे ही waste करेंगे, और कर्ज, और व्यक्ति विशेष से संबंधित राजनीति का शिकार बनते रहेंगे?

या फिर – fair opportunities, transparent system aur corruption-free governance? की demand करेंगे।

काबिल और deserving candidates भी निराश हैं,

वहीं जिनको सुविधा मिलनी चाहिए, वो भी सही से फायदा नहीं उठा पा रहे। जिसका कारण व्यक्तिगत राजनीति और गुटबाजी है।

Result ये है कि employment और business opportunities caste और family politics में उलझ कर रह जाती हैं।"

आखिर समाधान क्या है?

"तो दोस्तों, ये थी हमारे देश की economy (अर्थव्यवस्था), jobs (नौकरी), business (व्यापार) और सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दे की पूरी सच्चाई, जिसने हमारी अर्थव्यवस्था को आर्थिक रूप से कागज़ी आंकड़ों के माध्यम से विश्व में चौथे स्थान पर स्थापित कर दिया है, लेकिन बेरोजगारी, और राशन भत्ते के आधार पर आज भी हमारे देश में लगभग 87  करोड़ जनता गरीब है। 

Youth energetic है, capable है, हर एक कार्य करने में सक्षम है।

लेकिन नेता और उनके चमचों ने हम सबको धर्म, जाति, राजनीति और corruption में उलझाए हुए है।

लेकिन फिर भी हम कह सकते हैं कि बदलाव सम्भव है। – यदि हम,

Education और skills पर ज़ोर देते हुए अवसर उत्पन्न करें, रोजगार और व्यापार का आसान  साधन प्रदान करें तो फिर कुछ हद तक परिणाम बेहतर होगा।

Politics में transparency और accountability होनि चाहिए।

Reservation और क्षेत्रीय राजनीति से ऊपर उठकर merit-based approach होना चाहिए।

और सबसे ज़रूरी – जनता का धार्मिक उन्माद और caste-based politics से बाहर आना होगा।

हमारे नौजवानों को मुफ्तखोरी, नशाखोरी, चुगलखोरी, गुटबाजी, दलाली, जातिवाद और चरित्रहीनता का त्याग करना पड़ेगा।

क्योंकि जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक system दलाली और जुमलों पर ही चलेगा।"

आंकड़े और दस्तावेज सिर्फ जनता को बरगला कर अच्छे दिन दिखाने के लिए हैं। 

हमारे यहां चायवाले के पास भी आपको पिएचडी तक की डिग्री मिल सकती है, और एक जिलाबदर जिले का सांसद बन कर सारे जिले को दर-बदर कर सकता है। ऐसे चमत्कार और विडम्बनाएं भारत में सम्भव है।

मशहूर शायर, लेखक और शिक्षक राहत इंदौरी ने कहा है।,

बनके एक हादसा बाजार में आ जायेगा

जो नहीं होगा वो अखबार में आ जायेगा।

चोर उचक्कों की करो कद्र, की मालूम नहीं

कौन, कब, कौन सी सरकार मे आा जायेगा।

दोस्तों मैंने अपने शब्दों में वर्तमान परिस्थितियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया है।

"अगर आपको ये पसंद आया तो, लाइक सब्सक्राइब हमारे ब्लॉग पेज को फॉलो करें और share कीजिए।

अगली बार हम और भी मुद्दों पर खुलकर बात करेंगे।

तब तक सवाल पूछते रहिए, सोचते रहिए, और बदलाव की कोशिश करते रहिए।

धन्यवाद!"

रविवार, 27 जुलाई 2025

बलवान समय का संक्षिप्त विवरण

Time is very strong, how did Lord Krishna free Lord Shri Ram from debt.

How did time made by period of time span??

बलवान समय का संक्षिप्त विवरण।
जब समय सबक सिखाता है, तब अर्जुन जैसे वीर धनुर्धर भी अभीर लुटेरों से हार जाता हैं, और कृष्ण जैसे भगवान भी जरा नामक शिकारी के बांण से मुर्छित होकर देह त्याग देते हैं, समय बहुत बलवान है। दोस्तों
यह घटना धर्म और न्याय से संबंधित कसौटी पूर्ण विषय रहा है, क्योंकि राम ने छिपकर बाली का वध किया था, और जरा ने अनभिज्ञतावश अपने पूर्वजन्म के अन्याय के विरुद्ध न्याय की प्राप्ति श्रीकृष्ण लीला के माध्यम से परिपूर्ण किया।

राम ने बाली को पेड़ के पीछे से बाण मारकर उसका वध कर दिया था। राम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य वापस दिलाया और फिर बाली की पत्नी तारा ने राम को श्राप दिया था।


समय परिवर्तित होता रहता है।
समय-समय पहचानिए समय बड़ा बलवान
का वे अर्जुन लुटिया वहीं धनुष वहीं बाण
अर्जुन रोते हुए कहने लगे वहीं तीर वहीं
कमान पर समय मेरे साथ नहीं था।
भगवान श्रीकृष्ण के स्वर्ग जाने पर अर्जुन और द्वारिका वासियों के दुर्गति का मार्मिक वर्णन हमारे ग्रन्थों और पुराणों में वर्णित है।
यदुवंश में अंधक, वृष्णि, माधव, यादव आदि वंश चला। श्रीकृष्ण वृष्णि वंश से थे। वृष्णि ही 'वार्ष्णेय' कहलाए, जो बाद में वैष्णव हो गए।
वृष्णिवंशियों को दो श्राप लगे थे। एक गांधारी का और दूसरा ऋषियों का। श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे लेकिन श्राप पलटने में उनकी रुचि नहीं थी। श्राप का परिणाम मौसुल युद्ध था। इस आपसी झगड़े में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित कुल के लगभग सभी पुरुष और स्त्रियों का नाश हो गया था। मौसुल युद्ध के कई रहस्य हैं। जिसमें से एक रहस्य यह भी है कि, कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने प्रभु श्रीराम को ऋण से मुक्त किया।


द्वापर युग से भगवान विष्णु का प्रस्थान और कलयुग का प्रारंभ :


महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद यादवों का प्रभाव काफी बढ़ता जा रहा था और वह आपस में ही संघर्ष करने लगे थे। ऐसे में एक दिन वायु देवता को दूत बनाकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण के पास भेजा। वायुदेव ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि देवताओं ने कहा है कि, आपने पृथ्वी पर फैले पाप का अंत करने के लिए अवतार लिया था और अब आपका कार्य पूरा हो गया है। अगर आपकी इच्छा हो तो आप अपने लोक वापस आ जाएं अथवा आपकी अभी और पृथ्वी पर रहने की इच्छा हो तो आप रह सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जब तक यदुवंशियों का अंत नहीं हो जाता तब तक पृथ्वी का भार कम नहीं होगा इसलिए अब मैंने इनके अंत की व्यवस्था कर दी है, और अब केवल सात दिनों के अंदर मैं भूलोक का त्याग कर दूंगा।
और लगभग यहां से द्वापर युग के अंत का शुरुआत हुआ और कलयुग का प्रारंभ।
भगवान श्रीकृष्ण के ऐसा कहने के बाद वायुदेव वापस चले गए लेकिन द्वारिका में अपशकुन के बादल मंडराने लगे।


मौसुल युद्ध में श्राप की भूमिका :


महाभारत युद्ध के बाद जब 36वां वर्ष प्रारंभ हुआ तो राजा युधिष्ठिर को तरह-तरह के अपशकुन दिखाई देने लगे। विश्वामित्र, असित, दुर्वासा, कश्यप, वशिष्ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारका के पास पिंडारक क्षेत्र में निवास कर रहे थे। एक दिन सारण आदि किशोर जाम्बवंती नंदन साम्ब को स्त्री वेश में सजाकर ऋषियों के पास ले गए और बोले- ऋषियों, यह कजरारे नैनों वाली बभ्रु की पत्नी है और गर्भवती है। यह कुछ पूछना चाहती है लेकिन सकुचाती है। इसका प्रसव समय निकट है, आप सर्वज्ञ हैं। बताइए, यह कन्या जनेगी या पुत्र।
ऋषियों से मजाक करने पर उन्हें क्रोध आ गया और वे बोले, 'श्रीकृष्ण का पुत्र साम्ब वृष्णि और अर्धकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक विशाल मूसल उत्पन्न करेगा। केवल बलराम और श्रीकृष्ण पर उसका वश नहीं चलेगा। बलरामजी स्वयं ही अपने शरीर का परित्याग करके समुद्र में प्रवेश कर जाएंगे और श्रीकृष्ण जब भूमि पर शयन कर रहे होंगे, उस समय जरा नामक शिकारी उन्हें अपने बाणों से बींध देगा।' मुनियों की यह बात सुनकर वे सभी किशोर बहुत डर गए। उन्होंने तुरंत साम्ब का पेट (जो गर्भवती दिखने के लिए बनाया गया था) खोलकर देखा तो उसमें एक मूसल मिला। वे सब बहुत घबरा गए और मूसल लेकर अपने आवास पर चले गए। उन्होंने भरी सभा में वह मूसल ले जाकर रख दिया।


उन्होंने राजा उग्रसेन सहित सभी को यह घटना बता दी। उन्होंने उस मूसल का चूरा-चूरा कर डाला तथा उस चूरे व लोहे के छोटे टुकड़े को समुद्र में फिंकवा दिया जिससे कि ऋषियों की भविष्यवाणी सही न हो। लेकिन उस टुकड़े को एक मछली निगल गई और चूरा लहरों के साथ समुद्र के किनारे आ गया और कुछ दिन बाद एरक (एक प्रकार की घास) के रूप में उग आया।
मछुआरों ने उस मछली को पकड़ लिया। उसके पेट में जो लोहे का टुकडा था उसे जरा नामक शिकारी ने अपने बाण की नोंक पर लगा लिया।
भगवान श्री कृष्ण द्वारिका छोड़ स्वर्ग जाने के लिए योग में लीन हो गए, और जरा नामक शिकारी ने भगवान श्रीकृष्ण के पैर को मृग की आंख समझकर दूर से बाण चला दिया। इस बाण के लगते ही भगवान मूर्च्छित हो गए। जरा ने जब श्रीकृष्ण को देखा तो काफी घबरा गया और अपराध बोध से दुखी हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने तब जरा को समझाया कि यह तो मेरे विधान से ही रचा हुआ था। मैंने स्वयं ही अपने देह त्याग के लिए इस विधि को चुना था। क्योंकि तुम्हारे पूर्वजन्म का ऋण मुझ पर था। जरा पूर्वजन्म में बाली था, जिसका वध भगवान राम ने किया था। इस प्रकार राम को श्राप से मुक्ति मिली।


मौसुल युद्ध का प्रारंभ :


इस युद्ध के कई रहस्य हैं। द्वारिका में अपशकुन के बादल मंडराने लगे। एक दिन सभी यदुवंशी प्रभास क्षेत्र यानी वर्तमान सोमनाथ मंदिर के पास स्थित समुद्र तट पर आए। यदुंवशि प्रभास में उत्सव के लिए इकट्ठे हुए थे। परन्तु आपसी वाद विवाद में आपस में उलझ पडे। झगड़े की शुरुआत कृतवर्मा के अपमान से हुई। सात्यकि ने मदिरा के आवेश में उनका उपहास उड़ाते हुए कहा कि अपने को क्षत्रिय मानने वाला ऐसा कौन वीर होगा, जो रात में मुर्दे की तरह सोए मनुष्यों की हत्या करेगा। तूने जो अपराध किया है, यदुवंशी उसे कभी माफ नहीं कर सकते। उसके ऐसा कहने पर प्रद्युम्न ने भी कृतवर्मा का अपमान करते हुए उनकी बात का समर्थन किया।
कृतवर्मा ने महाभारत का युद्ध लड़ा था और वे युद्ध में जीवित बचे 18 योद्धाओं में से एक थे। कृतवर्मा यदुवंश के अंतर्गत भोजराज हृदिक का पुत्र और वृष्णि वंश के 7 सेनानायकों में से एक था। महाभारत युद्ध में इसने एक अक्षौहिणी सेना के साथ दुर्योधन की सहायता की थी। कृतवर्मा कौरव पक्ष का अतिरथी योद्धा था।
कृतवर्मा को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने एक हाथ उठाकर सात्यकि का तिरस्कार करते हुए कहा, 'भूरिश्रवा की बांह कट गई थी और वे मरणांत उपवास का निर्णय कर युद्ध भूमि में बैठ गए थे, उस अवस्था में भी तुमने वीर कहलाकर भी उनकी नृशंसतापूर्वक हत्या क्यों कर दी थी। यह तो नपुंसकों जैसा कृत्य था। इस बात पर सात्यकि को क्रोध आ गया। उन्होंने तलवार से कृतवर्मा का सिर धड़ से अलग कर दिया। बात बढ़ती चली गई, झगड़ा इतना बढ़ा कि वे आपस में वहां उगे हुई घास को उखाड़कर उसी से एक-दूसरे को मारने लगे। उसी 'एरका' घास से यदुवंशियों का नाश हो गया। हाथ में आते ही वह घास एक विशाल मूसल का रूप धारण कर लेती। श्रीकृष्ण के देखते-देखते साम्ब, चारुदेष्ण , प्रद्युम्न और अनिरुद्ध की मृत्यु हो गई। और सब काल-कवलित हो गए। मूसल के प्रहार से उन सबने एक-दूसरे की जान ले ली।
बलरामजी की देह त्याग के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सारथी से कहा कि अब मेरे भी जाने का समय हो गया है इसलिए में योग में लीन होने जा रहा हूं। द्वरिका में जो लोग बच गए हैं उन सभी को कह दो कि अर्जुन के आने के बाद वह द्वारिका को छोड़कर उनके साथ चले जाएं। क्योंकि अर्जुन के द्वारिका से जाने के बाद मैंने समुद्र से जो भूमि द्वारिका नगरी बसाने के लिए ली थी समुद्र उसे डुबो देगा। उस समय केवल मेरा भवन ही शेष रह जाएगा।


मौसुल युद्ध में अर्जुन का रहस्य :


विष्णु पुराण में कथा है कि, श्रीकृष्ण और यदुवंशियों के शरीर का अंतिम संस्कार करके अर्जुन जब द्वारिका से निकले तो भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा मानकर वे अपने साथ द्वारिका वासियों सहित भगवान श्री कृष्ण की कई पत्नियां और अन्य यदुवंशियों की स्त्रियों को हस्तिनापुर लेकर चल दिए। द्वारिका से उनकी अंतिम विदाई हो रही थी, इसलिए जिनके पास जो धन संपदा थी वह साथ में लेकर नगर से निकल चले।
अर्जुन सभी यदुवंशी महिलाओं और वज्र को लेकर हस्तिनापुर की ओर चले। रास्ते में भयानक जंगल आदि को पार करते हुए वे पंचनद देश में पड़ाव डालते हैं।
वहां रहने वाले अभीर लुटेरों को जब यह खबर मिलती है कि अर्जुन अकेले ही इ‍तने बड़े जनसमुदाय को लेकर हस्तिनापुर की ओर चले हैं।
तभी लुटेरे द्वारिका की कन्याओं और धन संपदा को पाने के लिए ललचाने लगे। हालांकि उनके लिए बड़ी बाधा अर्जुन थे।
जिनके पराक्रम को सभी लोग जानते थे लेकिन लालच में अंधा हुआ मनुष्य जान को जोखिम में डालने से भी नहीं चूकता है। सभी ने मिलकर कन्याओं और धन को लूटने का फैसला कर लिया।
लुटेरों ने ग्रामीणों को धन का लालच देकर लूट में अपनी सहायता करने के लिए ग्रामीणों को तैयार कर लिया। अर्जुन सतर्कता से चल रहे थे लेकिन आने वाले खतरे से अंजान थे।
मार्ग में अचानक उनको अभीर लुटेरों ने घेर लिया और कन्याओं और धन पर अधिकार जमाने लगे। अर्जुन ने सभी को भय दिखाकर भगाने का प्रयास किया, लेकिन अर्जुन के किसी भी बात का अभीर लुटेरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
तब अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और लुटेरों पर दिव्य बाणों का प्रयोग करना चहा लेकिन, अर्जुन हैरान रह गए।
अर्जुन बार-बार मंत्र बोलकर दिव्यास्त्रों को बुला रहे थे लेकिन दिव्यास्त्र प्रकट नहीं हुए। अर्जुन का दिव्य गांडीव धनुष भी सामान्य धनुष के जैसा बन गया।
महाभारत युद्ध में पूरी कौरव सेना को पराजित करने वाले अर्जुन आश्चर्य में थे कि उनकी शक्तियों को क्या हो गया है। एक-एक बाण से अर्जुन लुटेरों के समूह पर प्रहार कर रहे थे।
लुटेरे ने अग्निदेव से प्राप्त अर्जुन के अक्षय तरकश, जिनमें बाण कभी समाप्त नहीं होते थे उसे भी तोड़ दिया फिर अर्जुन टूटे हुए बांण के नोक से लुटेरों के साथ लडते हुए अंततः हार गए।
अर्जुन को पराजित करके अभीर लुटेरों ने द्वारिका की स्त्रियों और धन संपदा को अर्जुन के देखते-देखते लुटकर चले गए।
अर्जुन शोक में डुबे हुए थे और रो रहे थे। लुटेरों से पराजित अर्जुन किसी तरह से महर्षि व्यास के पास पहुंचे और पूरी स्थिति बताई। व्यासजी ने बताया कि दरअसल तुम जिस शक्ति की बात कर रहे हो और जो कुछ शक्तियां तुम्हारे पास थीं वह तो तुम्हारी थी ही नहीं।
सारी शक्तियों के स्वामी तो स्वयं श्रीकृष्ण थे। जब तक वह तुम्हारे साथ थे तब तक उनकी शक्तियां भी तुम्हारी थीं। उनके जाने के साथ वो शक्तियां भी चली गईं।
अब यह जो कुछ भी हो रहा है वह उनकी मर्जी से हो रहा है।
व्यासजी बोले सुनो अर्जुन विपत्ति के समय बल, बुद्धि, ऊर्जा और शक्ति क्षीण हो जाती है।
ब्रह्मांड काल द्वारा नियंत्रित है। यह देता है और लेता है। बलवान दुर्बल हो जाता है, धनवान निर्धन हो जाता है, और निर्धन धनवान हो जाता है। यही नियति है, समय के साथ तुमने अपनी भुजाओं की शक्ति खो दी है। यह वापस आ भी सकती है और नहीं भी। स्पष्टतः मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारे धरती से जाने का समय भी आ गया है।
अर्जुन ने व्यासजी के समझाने पर भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम आज्ञा का ध्यान करके उनके प्रपौत्र वज्रनाभ जी को यदुवंशियों का राजा बना दिया।
वज्रनाभ जी उस समय बहुत छोटे थे इसलिए हस्तिनापुर में रहे, और पांडवों के देह त्याग और स्वर्गारोहण के बाद परीक्षित जी ने इनका ध्यान रखा और बाद में मथुरा मंडल का राजा बना दिया। वज्रनाभ जी के नाम पर ही मथुरा और आस-पास के क्षेत्र को  व्रजमंडल कहा जाता है।


संदेशात्मक निष्कर्ष एवं विश्लेषण :


द्वापरयुग का अंत श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद शुरू हो गया, लेकिन कलयुग नामक एक और युग प्रारम्भ हुआ। समय और काल ने विभिन्न धर्मों में विभिन्न मानव अवतारों के माध्यम से, न्याय, अन्याय और मानवता से संबंधित विभिन्न प्रकार के तर्क संगत उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसमें सिद्ध होता है कि धरती पर उपस्थित प्रत्येक जीव, निर्जीव और सजीव समय और काल के बंधन में बंधने के कारण वश कालांतर में विद्यमान है। अजीब विडंबना है कि हम मानव होकर भी भगवान रुपी समय और काल को ना समझते हुए भगवान बनने के विभिन्न प्रकार के क्रिया-कलापों के माध्यम से ब्रह्मांड को चुनौती दे रहे हैं, लेकिन वही मानव भगवान बनेगा जो मानवतावादी होगा और मानवता की स्थापना करते हुए मानव धर्म को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि मानेगा।
अब ज्यादा कुछ लिखने के लिए, विश्लेषण और व्याख्या करने के लिए मुझे भी शायद भगवान बनना होगा, लेकिन मैं ठहरा हिन्दू बाकी के धर्मों के मानवों में से भगवान ढुंढना मुश्किल है। और मुझे भगवान बनने में कोई रुचि नहीं है। जैसा चल रहा है चलने दो जब काल समय बन कर कालांतर में आएगा तो फिर फैसला अपने आप हो जाएगा।


धरती की उत्पत्ति ब्रह्मांड द्वारा मानवों के लिए मानवता को स्थापित करने के उद्देश्य से हुआ है। लेकिन हम, भगवान, इश्वर, अल्लाह, जीसस, रब, वाहेगुरु आदि इत्यादि के नाम पर विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों में विभाजित हो गये। और ब्रह्मांड के उद्देश्य के विपरित समय और काल को अपने वश में करने के लिए लगे हुए हैं। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आस्तिक और नास्तिक सब ब्रह्मांड के रहस्य को समझ कर समय और काल को अपने अधीन करना चाहते हैं।
इसलिए समय और काल के अनुसार कालांतर में धरती को एक दिन ब्रह्मांड में ही विलीन हो जाना है। और फिर कलयुग का अंत होगा। तदोपरांत ब्रह्मांड द्वारा फिर से कालांतर में एक नये समय, काल और ग्रह का निर्माण होगा।
अब किसी मानव का अवतरण और प्रकटीकरण नहीं सिधा विनाश के माध्यम से पुनः ब्रह्मांडीय अवतरण होगा।


तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
अभीर (भिलां) लूटीं गोपियां, वहीं अर्जुन वही बांण।
मुझे नहीं पता ये तुलसी दास ने लिखा या फिर और किसी ने लेकिन इसमें लिखे भील और अभीर शब्दों पर विवाद है। यदि तुलसी ने लिखा है तो वो क्या उस समय जीवित थे। कुछ कहा नहीं जा सकता इस उपरोक्त चौपाई के बारे में।


इसलिए मैंने परिस्थिति और प्रसंग के अनुरूप स्वयं ही एक पंक्ति को कलमबद्ध किया है। जिसमें यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि मानवता के लिए ही समस्त धर्मों की स्थापना हुई है, और भगवान धर्म अनुसार ही मानवता के रक्षा लिए धरती पर विभिन्न रूपों में अवतरित हुए। और समय तथा काल के अनुसार ही अपने लीला और रचनात्मक कार्यों से मानव धर्म को सदैव प्रफुल्लित और पोषित करते रहते हैं।


मानवता से क्या भगवान बड़ा, समय बड़ा बलवान।
राम श्रापित हो गये, कृष्ण से बलसालि भये श्राप॥


अर्थात समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है। और शायद समय ही भगवान है। श्रीराम और श्रीकृष्णा को भी समयानुसार देह का त्याग करना पड़ा है।
और जब अर्जुन का वक्त बदला तो उसी के सामने आभिर लुटेरों ने द्वारिका वासियों सहित गोपियों को लूट लिया जिसके गांडीव के प्रत्यंचा के टंकार से बड़े-बड़े भगवान स्वरूप योद्धा घबरा जाते थे। वो भी समय रुपी काल के समक्ष विवश थे।
विशेष सत्ता बल, धन बल, भौतिक बल और काम, क्रोध, लोभ, मद, ये सब आपको शापित करके आपके अंदर अहंकार के कोष को जन्म दे सकते है ! अतः अपने बलों पर अहंकार ना करे क्योंकि समयानुसार समय ही बलवान है ना की उपरोक्त बल।
इस प्रकार वर्तमान समय में जितने भी धन्ना सेठ, बाहुबली और प्रधान सेवक, सन्यासी, फकीर, बाबा आदि जो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि माना रहे हैं, और जाती धर्म का धंधा करने लगे हुए हैं, उन सबका अंत काल द्वारा निर्धारित है।
अतः जितना भोग-विलास और आत्ममुग्धता का लुत्फ उठा सकते हैं उठा लें। जिस दिन बलवान समय के कालचक्र में पड़ेंगे उस दिन शायद पश्चाताप का मौका भी नहीं मिलेगा।

https://youtu.be/e7-Vto3qTvI?si=79ibOqtPCgWlG8fR


कोई एक मानव बताओ जो सभी धर्मों में सर्वजातीय हो, सर्वमान्य हो और सर्वशक्तिमान है। है कोई, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, बाहुबली, विद्वान, बुद्धिजीवी आदि इत्यादि जो बता सकता है कि इस धरती पर भगवान का अर्थ क्या है और भगवान अवतार का औचित्य क्या है। अरे मुर्खो जहां से पैदा हुए वहीं वापस जाने की कोशिश क्यों कर रहे हो। समझ गये तो ठीक नहीं तो समय समझाने वाला है। विस्तारपूर्वक चर्चा के लिए अपने विचार व्यक्त करते हुए कमेंट करें।
।। ब्रह्मांड की जय हो ।।

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

सनातन एवं संविधान

सामान्य सारांश 

देश, काल और धर्म के अनुसार भारत भुमि पर अनेकों स्थितियों और परिस्थितियों ने जन्म लिया है। जैसे कि देश के संदर्भ में भारत देश को विभिन्न नामों एवं परिवेश के अनुसार पहचाना गया है, जिसमें से कुछ एक नाम आर्यावर्त, भरतखण्ड, जम्बूद्वीप भी हुआ करता था। विभिन्न काल के अनुसार मुगलकालीन और अंग्रेजी शासनकाल के अलावा अन्य शासनाधीन के समय में हिन्दूस्तान और इंडिया आदि नामों से पहचाना गया। सनातन के रूप में भारत एवं भारतवर्ष के नाम से स्थापित किया गया है। इतिहास एवं ऐतिहासिक परिचय के अनुरूप हम सनातनी थे, हैं, और रहेंगे।


परन्तु सनातन संस्कृति, संस्कार का पतन, विघटन वर्तमान समय में इस प्रकार से किया जा रहा है, जैसे कि भारत वर्ष में एक व्यक्ति विशेष वर्ण अथवा क्षेत्र, प्रांत ही भारतवर्ष की पहचान है, बाकी सब सनातन के नाम पर इस वर्ण के व्यक्ति विशेष के अधीन ही संस्कारित एवं पोषित हो रहें हैं। और अंधभक्ती में विशेष वर्ण के व्यक्ति तथा विशेष प्रांत के भोग-विलास और सुख समृद्धि के लिए सबकुछ न्यौछावर करने पर अंधभक्त उतारू हो गए हैं, क्योंकि प्रमुख व्यक्ति विशेष ने बाकी सभी सनातनी वर्णों एवं प्रांतो को आपस में राजनीतिक कटुता एवं धार्मिक विद्वेष और जाता-पात के आडम्बर में ऐसा उलझाया है कि, हम अपंग व्यवस्था का शिकार हो गए हैं। अभी भी समय है, चेतना को जगाने का अनुरोध करता हूं कि, भ्रष्टाचार पहले कम था लेकिन अब और अधिक विकराल रूप धारण कर चुका है। पहले भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी कम थे लेकिन अब अत्यधिक है। क्योंकि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों, शारीरिक एवं मानसिक परिश्रम का उपयोग अपने देश काल और धर्म के विकास के लिए नहीं, बल्कि उस भ्रष्ट नालायक अनपढ़ व्यक्ति विशेष के समूहों के लिए कर रहे हैं, जो स्वयं को संविधान से ऊपर मानते हैं, अपने अहंकार, भोग-विलास और प्रांत तथा निजी वर्ण के लिए कुछ भी कर सकते हैं। चाहे देश में बेरोजगारी, दलाली, भुखमरी और धार्मिक उन्माद की अति रिती हो जाए, भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच जाये लेकिन इन व्यक्ति विशेष के समूहों के अहंकार, भोग-विलास और आत्मसम्मान को ठेस ना पहुंचे। इनको किसी प्रकार का विरोध एवं प्रतिरोध का सामना ना करना पड़े। गंगा कभी उल्टी नहीं बहती, समय कभी वापस नहीं आता लेकिन हां उसकी पुनरावृत्ति जरूर होती है। इतिहास स्वयं को दोहराते हैं। लेकिन अंधभक्ती में बीता हुआ समय भी वापस आ सकता है और गंगा भी उल्टी बह सकती है।

विकासशील से विकसित होती आधुनिकता ने पूंजीवादि व्यवस्था के अंतर्गत संविधान और सनातन दोनों को अपंगता के लिए मजबूर कर दिया है, इस प्रकार के अपंगता अराजकता और भययुक्त भेदभाव की जिम्मेदारी देशवासियों और लोकतंत्र के दो प्रमुख स्तंभों पर है। जिसे हम समाज का आइना और न्याय का मंदिर कहते हैं। शायद आप समझ चुके हैं, जनजागरण, निष्पक्ष पत्रकारिता एवं न्यायिक निर्णय के द्वारा ही हम विकसित हो सकते है। जनमानस को नागरिक कर्तव्यों को समझना भी जरूरी है, जिसको जनता भुल चुकी है। अपितु नागरिक कर्त्तव्य का सम्बन्ध आम एवं खास से लेकर, हर एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति विशेष से भी है, जिसका पालन और निर्धारण लगभग नहीं हो रहा है।

भारत देश:-

इतिहास गवाह है, सनातन के अनुसार सभी धर्मों को अपने धर्म-कर्म के अनुसार जिवन यापन करने का विशेष अधिकार हमारा संविधान हमें प्रदान करता है, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आर्य आदि धर्म हमारे भारत देश में स्थापित है। हमें नागरिकता के अनुसार किसी एक धर्म के अनुसार अपने कर्मों का निर्वहन करते हुए पालन करने का विशेष अधिकार एवं स्वतंत्रता है। परन्तु आज हम एक व्यक्ति विशेष के प्रभाव में राजनीतिकरण के कारण वश भारतीय संविधान के अनुसार धार्मिक रूप में आरक्षित एवं अनारक्षित वर्गों में विभाजित कर दिए गए हैं। जिससे की हम जाती और वर्ण में विभाजित होकर आपसी भेदभाव और राजनीतिक कटुता के शिकार हो गए हैं। 

हिन्दू वर्ण व्यवस्था हमें अपने सनातन संस्कृति एवं धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राप्त हुआ है, जिसमे हमारे प्रत्येक वर्ण के लिए एक विशेष अनुष्ठान और आदेश पारित किया गया है कि, कैसे हमें वर्ण व्यवस्था का पालन करते हुए अपने धर्म और कर्म के अनुसार सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाते हुए समृद्धि और खुशहाली के चरम पर पहुंचने का प्रयास करना है।

जबकि वस्तु स्थिति को ध्यान में रखते हुए, उचित व्यापक और मजबूत राजनीति एवं राज धर्म के अनुरूप हमें भारतीय संविधान में आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आधारित आरक्षण के स्वरूपों को पुनः निर्धारित करने की आवश्यकता है। जिससे आपसी सोहार्द एवं समरसता को बरकरार रखते हुए सनातन हिन्दू धर्म समृद्ध और खुशहाल रहे। 

जिस प्रकार जंगल में जानवर, पेड़ पौधे अलग-अलग जाती प्रजाति और परिवेश के है, ठीक इसी प्रकार ईश्वर ने या फिर कहें तो प्रकृति ने भी, मनुष्यों को अलग-अलग जाती प्रजाति एवं परिवेश के आधार पर विभाजित किया है। सोच समझ कर देखें, यदि जंगल के सारे जानवर जंगल छोड़कर बस्ती और शहरों में रहना शुरू कर दें, या फिर मनुष्य अपना घर-बार छोड़कर जंगल में रहने लगे फिर क्या होगा, परिणाम हमारे सामने है, हम जंगल काट कर घर बना रहे हैं, और जंगल के जीव जंतु, जानवर हमारे घर अथवा घरों के आसपास ही रह रहे, अजीब संघर्ष पूर्ण परिस्थिति है। 

और फिर ध्यानपूर्वक सोचे समझे कि क्या होगा, गधा शेर बनने की कोशिश करें , हिरण चीता का मुकाबला करने लगे, या फिर कौवा मोती चुगे, हंस दाना खना लगे, मैं समझता हूं कि, इस प्रकार के असंतुलन से प्रकृति की मूल वस्तु स्थिति परिवर्तित होगी और जंगल एवं जानवरों के बिच अंसतुलित संघर्ष होगा। 

इसी तरह यदि सारे मनुष्य एक है, लेकिन हम सब को भी अलग-अलग स्वरुपों में प्रकृति ने विभाजित किया है, जैसे कि अमेरिकन अंग्रेज भारत में आकर रहने लगे थे तो हमने उनका विरोध क्यों किया और अपने आप को गुलाम मान कर आजादी के लिए संघर्ष क्यों किया, वो भी मनुष्य ही थे हम लोगों को अंग्रेज बन जाना चाहिए था। 

फिर हम अपने वर्ण व्यवस्था को स्थापित करते हुए मानवता के लिए एक दुसरे का सहयोग और समर्थन के साथ सोहार्द क्यों नहीं स्थापित कर पा रहे हैं। क्योंकि तिलक, तराजू, तलवार तथा कर्म प्रधान दलित, पिछड़ा विद्वान आदि अपने शक्ति एवं सामर्थ के अनुसार कार्य ना करके सिर्फ और सिर्फ भोग-विलास और आत्मदंभ के लिए संघर्षरत हैं। सब कलयुग नामक आडम्बर से भयभीत होकर काम, क्रोध, लोभ मद से वशीभूत है।

अरे मुर्खो रामायण को बाल्मिकी जी ने कलमबद्ध किया है, जो हमारे हिन्दू धर्म के सनातन वर्ण से है, रामायण में सनातन धर्म के प्रमुख वर्ण से संबंधित भगवान श्रीरामचन्द्र जी के द्वारा रचित रचनाओं का उल्लेख है, ठीक इसी प्रकार वेद व्यास जी ने श्रीमद्भागवत पुराण का रचना किया। तो फिर क्या हम इन पुराणों के आदर्शों एवं आदेशों का पालन करना यह मान कर बंद कर दें की इसमें, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और क्षूद्र का वर्णन है। नहीं बल्कि हमें अपने धर्म के अनुरूप कार्य एवं व्यवहार करने की आवश्यकता है।

अब मैं इसको यह कहते हुए विराम देना चाहूंगा कि कुछ व्यक्ति विशेष के समूहों द्वारा धर्म के आधार पर राजनीति किया जा रहा है ताकि उन्हें अपने भोग-विलास और आत्मदंभ का मौका मिलता रहे। इंसान कभी भगवान नहीं हो सकता यदि भगवान धरती पर जन्म लेता है, तो वह भी एक इंसान ही है। और उसके द्वारा ही मानवता की स्थापना हुई है। भगवान अजन्मा अदृश्य, आदि एवं अनन्त है। इसलिए अंधभक्ती से बाहर निकल कर यथार्थ में उपस्थित रहो।

हमारे सनातनधर्मी देश में धर्म एक है, लेकिन धर्म को स्थापित करने और स्वीकार करने के लिए विभिन्न प्रकार के पालन एवं अनुपालन तथा दिशानिर्देश है, सनातन धर्म ग्रंथों, पुराणों, उपनिषद आदि में हमारे ऋषियों, मुनियों और अवतरित भगवान ने हमें आदेशित किया है, कि कैसे हमें वर्ण व्यवस्था के अनुरुप स्वयं को मर्यादित रखना है। लेकिन नहीं हम सब विद्वान बुद्धिजीवी एवं प्रखरता से परिपूर्ण हो चुकें हैं, हमें तो बस राम, कृष्ण, परशुराम, बाल्मिकी, तुलसी, कबीर, बलि, सांई, नबि, राजा महाराजा और बाहुबली बनना है। सब लगे हुए है धंधे में, धर्म का धंधा राजनीति का धंधा और मानवता का धंधा करने में। जबकि जरूरत है कि हम धर्म का पालन करें, राजनीति को विकसित करें सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए, मानवता को स्थापित करो विश्व कल्याण के लिए। लेकिन नहीं साहब हमें तो संविधान विशेषज्ञ बनना है, संविधान को अपने अनुकूल करना है, लोकतांत्रिक व्यवस्था के आड़ में, ब्राह्मणवादी, सामंतवादी, महाजनवादी दलितवादी, बनते हुए प्रभुत्वशाली सत्ता कायम करना है। अपने आप को राबिन हुड साबित करना है। 

सोच समझ कर विचार करो, समाजिक परिवेश और कार्मिक परिवेश में क्या अंतर है, शहर और गांव में क्या अंतर है, कर्म क्षेत्र और धर्म क्षेत्र में क्या अंतर है। अरे व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, दुष्कर्म करने वाले मानवता के दुश्मन, मुर्ख अज्ञानी, समाजिक परिवेश के लिए वर्ण व्यवस्था है जिसको निष्पादित गांव के समाजिक परिवेश के द्वारा होता है, और गांव ही भारत है। कार्मिक परिवेश से तात्पर्य यह है कि कैसे हम कर्म के प्रधानता से स्वयं को वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठाकर विद्वान और बुद्धिजीवियों की श्रेणी में सम्मिलित करते हुए मानवतावादी दृष्टिकोण से मानव धर्म के लिए उत्कृष्ट कार्य को प्रदर्शित कर सकते हैं, अर्थात संवैधानिक रूप में नागरिक कर्तव्यों का पालन करना है। शहरों में श्रमशक्ति का प्रदर्शन किया जाता है जहां धर्म नहीं कर्म प्रधान है, फिर वहां वर्ण व्यवस्था भी लागू नहीं होती है। लेकिन हां गांव में श्रमशक्ति के साथ ही कर्म का आंकलन भी किया जाता है कि धर्म के अनुरूप कौन किस प्रकार के कार्य के लिए निर्धारित है, यदि समाज उसके कर्म में प्रधानता का अनुभव करता है तो फिर उसको भी वर्ण व्यवस्था के पालन की बाध्यता नहीं है। सब बुद्धि, विवेक और व्यवहार का अंतर है, इसलिए राजनीति में जनता द्वारा समय-समय पर बुद्धि शुद्धी के लिए यज्ञों का आयोजन किया जाता है। राष्ट्र को विकसित करने के लिए समाज को संगठित एवं संस्कारित करना आवश्यक है, संस्कृतियों को संरक्षित एवं धारण करना आवश्यक है। 

भारतीय कालखंड:-

हमारे सनातनधर्मी देश को अनेकों बार खंडित तथा विघटित किया गया है। जिसका परिणाम यह हुआ कि हम विभिन्न विचारधाराओं, प्रांतीय सरकारों एवं धार्मिक उन्माद में विभाजित होकर विभिन्न खंडों में विभक्त हो चुकें हैं।

जिससे की आज भी हम अपने मूलभूत सुविधाओं और निति निर्देशक तत्वों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मुगलकालीन शाशनकाल, अंग्रेजी हुकूमत, आर्य, मौर्य आदि के शासन के बाद हिन्दूकालिन शाशनकाल काल के अंतर्गत विभिन्न वर्ण के शासकों ने शासन किया, जिसमें से कोई राम तो कोई परशुराम, कोई रावण, कोई बुद्ध, कोई पांडव, कोई सम्राट‌ अशोक, कोई अवतरित भगवान, कोई कंस, तो कोई कृष्ण आदि इत्यादि हुआ जिनको हम अपने समझ और विवेक अनुसार अपने परिवेश एवं क्षेत्र में मान्यता देते हुए उनके आदेशों और आदर्शों का पालन करते है। 

परन्तु आज के अतिआधुनिकता के कालखंड में स्थितियां और परिस्थितियां मानवता के विरुद्ध है, क्योंकि वसुधैव कुटुम्बूकम के लिए नहीं हर एक मानव अमानवीय व्यवहार करते हुए अहम् ब्रह्मस्मि के सिद्धांत को अपना रहे हैं। ताकि उन्हें भी इंसान रुप में भगवान के स्वरूप की मान्यता मिल जाए। जबकि ऐसा व्यक्ति विशेष जो स्वयं को अहम् ब्रह्मस्मि कहता है, वह सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी, और नालायक है। आगे फिर कभी इसका विस्तार से उल्लेख करुंगा। शायद आप स्वयं को जागृत कर रहे हैं। अंधभक्ती से बाहर निकल रहें हैं। 


धर्म-कर्म:-

मनुष्य जब धरती पर जन्म लेता है तब वह सिर्फ एक मानव मात्र जीव होता है। जन्म के बाद वह अपने धर्म और कर्म के अनुसार हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, आर्य आदि में विभाजित हो जाता है। कोई जन्म के साथ ही धर्म को धारण कर लेता है कोई कर्म के अनुसार धर्म का निर्धारण करता है। 

इसलिए धर्म परिवर्तन और धर्म का धंधा आदि होता है। लेकिन प्रत्येक धर्म मानवता के लिए समर्पित है। परन्तु कुछ अनपढ़ अपराधियों ने राजनीति के माध्यम से संविधान में हेरफेर करके धार्मिक उन्माद पैदा कर रखा है, जिससे की उनको भ्रष्टाचार, व्यभिचार और तानाशाही करने का मौका मिलता रहे। 

बाह्मण सिर्फ एक जाति नहीं बल्कि सनातन धर्म का प्रचारक, उद्धारक एवं संरक्षक हैं। इश्वर के लिए सब मानव रूप में एक समान है, इसलिए कोई धर्म अनुसार जन्म से ही बाह्मण है तो कोई कर्म से बाह्मण है। वर्ण व्यवस्था सिर्फ हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि सिख, इसाई, बौद्ध और मुस्लिम धर्म में भी अलग-अलग स्वरुपों और संस्कारों के साथ व्याप्त है जिसके अंतर्गत सभी अपने धर्म के लिए सदैव तत्पर रहते हुए कार्यरत हैं। सामाजिक समरसता एवं एकता तथा आर्थिक समानता से ही मानवता का धार्मिक, आर्थिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास निरंतर सम्भव है। जो भी अपने कर्म एवं धर्म का अनुसरण करते हुए अपने गुरुओं, इष्टों आदि जो कि बाह्मण रुप में धरती पर उपस्थित एवं स्थापित है उनका पालन करता है वह सुखी एवं संपन्न है। 

यदि असल में बाह्मण दुराचारी, भ्रष्टाचारी और अत्याचारी हो गया तो धरती पर एक ऐसा विद्रोहक विस्फोट होगा जिसकी कल्पना आज तक किसी ने नहीं किया होगा। और फिर स्वतः ही मानवता का पुनर्स्थापना हो जाएगा। 

कुछ महाजन और राक्षस प्रवृत्ति के मनुष्यों ने धर्म का व्यापार करना शुरू कर दिया है, जिससे की समस्त धर्मों का विघटन हो रहा है, सबको एक समान स्वरुपों में ढालना असम्भव है। इसलिए उचित यही होगा कि, सब एक दुसरे का सम्मान करते हुए अपने धर्म और संस्कृति के अनुसार उचित व्यवहार करें। गलत को गलत और सही को सही साबित करें। आगे इस बौद्धिक मंथन को विस्तार में बताने के लिए समय और शब्दों का अभाव है। मानवता का विकास एवं सरंक्षण, ब्राह्मणवादी विचारों के साथ धार्मिक सद्भावना एवं संस्कारीत संस्कृति के द्वारा ही हो सकता है ना कि भ्रष्टाचार और व्यापारिक दृष्टिकोण से।

हम इन अपराधि प्रवृत्ति के राजनैतिक व्यक्ति विशेष के तानाशाही को बर्दाश्त कर रहे हैं, इनके द्वारा शोषित और पीड़ित हो रहे हैं क्योंकि हम जागरूक एवं निर्भीक नहीं है। और ज्यादा टीका टिप्पणी करना नहीं चाहता हूं नहीं तो हो सकता है कि इनके द्वारा कोई अन्य वाद विवाद और अपवाद पैदा कर दिया जाएगा। वैसे ही मेरे पास जिवन यापन के साधन संसाधन के अलावा पूंजी का अत्यन्त अभाव है।


निष्कर्ष:-

निम्नलिखित उल्लेख के अनुसार बौद्धिक मंथन के उपरांत निष्कर्ष निकाला है कि। हमें यानी कि आम जन मानस को भोग-विलास के लोभ का त्याग करना होगा, जरूरत के लिए जरूरी कार्य करने से पहले, जरूरी क्या है ये समझने की जरूरत है। आवश्यकता अविष्कार की जननी है, लेकिन अविष्कार, रोजी-रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ सुरक्षा के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर चाहिए। किसी तड़ीपार, दंगा वादी अपराधियों से भयभीत होकर अंधभक्ती में भ्रष्टाचार, व्यभिचार और अधार्मिकता के आवश्यकता अनुसार अविष्कार से बचना होगा। जल, जमीन, जंगल और जानवर के साथ ही रोजी-रोटी को संरक्षित करना होगा। अन्यथा हम इन मूलभूत सुविधाओं के लिए सदैव संघर्षरत रहते हुए भय से तानाशाही से, भ्रष्टाचार से कभी भी मुक्त नहीं हो सकतें हैं। गलत को गलत और सही को सही साबित करना होगा। स्वयं को आंदोलित करते हुए जन जागरण अभियान के तहत सत्य और असत्य तथा अमीरी-गरीबी के फर्क के समिक्षात्मक एवं आवश्यक तथ्यों को समझना होगा।

अब मैं इससे ज्यादा कुछ लिखने में असमर्थ हूं अन्यथा मैं नाम पता सहित उदाहरण के साथ आपको बता सकता था कि, धर्म का धंधा कैसे कौन और क्यों कर रहा है, मानवता की हत्या कौन कैसे और क्यों कर रहा है। आर्थिक रूप से गुलाम कौन बना रहा है। भ्रष्टाचार अपराधीकरण साम्प्रदायिकता कौन फैला रहा है और कैसे फैला रहा है। आपसी सोहार्द और समरसता को बनाए रखें। अपने लोकतंत्र में विश्वास के फलस्वरूप संविधान के अनुसार हम सब एक भारतीय है, संविधान में भी विभिन्न भित्तिचित्रों के माध्यम से हमारे सभी भारतीय धर्मों का विशेष सांकेतिक उल्लेख है। जिससे सिद्ध होता है कि हम सब सनातन भारतीय है।

अंधभक्ती से बाहर निकल कर अपने भारत को सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित करने में अहम योगदान प्रस्तुत करें। संस्कारित समाज और विकसित राष्ट्र का निर्माण, सिर्फ राम राम, कृष्ण, इश्वर अल्लाह वाहेगुरु, जीसस आदि जपने मात्र से नहीं होगा। हमें अपने जागरुकता एवं कार्य क्षमता को बढ़ाते हुए औद्योगिक उत्पादन, कृषि उत्पादन के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सेवा को विकसित करना होगा। नित नए अविष्कार के द्वारा विभिन्न साधनों और संसाधनों का निजी तौर पर उपयोग करना होगा। समय, मंच, और धन के अभाव के कारण कलम का फकीर अब विराम करना चाहता है।

"जातीय समीकरण के आधार पर संघर्षरत धर्म को आसानी से तोड़कर तानाशाह, तानाशाही कर सकते है"। 

वर्तमान जातीयताओं के घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि, हमरा सनातन धर्म खंडित एवं विघटित हो रहा है, आधुनिकता और पूंजीवादी व्यवस्था ने हमें मानसिक रूप से अपंग बना दिया है। नौकरीपेशा, व्यापार तथा प्रेम प्रसंग और भोग विलास के लिए उच्च जातियों ने भी स्वयं को अमर्यादित एवं अपमानित कर लिया है। इसी प्रकार निचले स्तर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है, क्योंकि क्षुद्र अथवा निच जातियों ने उच्च शिक्षा, नौकरीपेशा, व्यापार मान सम्मान एवं भोग-विलास के लिए स्वयं को उच्च दिखाने के प्रयास में अमर्यादित व्यवहार एवं भ्रष्टाचार करना शुरू कर दिया। शायद हमारे किसी विद्वान बुद्धिजीवी ने कहा है कि सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था एक सीढ़ी है। और जब ये व्यवस्था ही ऊपर नीचे होगी तो इसका परिणाम यही होगा। उच्च शिक्षा, धन संपदा, समृद्धि आपको भोग-विलास एवं आत्मदंभ तो प्रदान कर सकता है, लेकिन, संस्कृति, संस्कार आत्मसम्मान एवं यश-कीर्ति सिर्फ आपको अपने धर्म और कर्म के पालन करने से ही मिल सकता है। ........ क्योंकि मानव धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं और स्वयं को शिक्षित, सुरक्षित एवं स्वपोषित करने से बड़ा कोई कर्म नहीं। दुनिया के सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य है मानवता की स्थापना। मानवता शब्द अपने आप मे परिपूर्ण है।

जय जवान, जय किसान, जय इंसान।।

बुधवार, 4 जून 2025

Self Explanatory

Greatness is not found in possessions, power, position, or prestige. It is discovered in goodness, humility, service, and character.

#William_Arthur_Ward

#Self_Explanatory
Ego, power and position will not last forever, but goodwill, ability and dissemination of knowledge will last forever. Unfortunately, the goodwill ability and knowledge of a humble and forthright person is being destroyed due to sycophancy, conspiracy and manipulation regarding the greed for power and position. One day the position and power will be spoilt due to ego and greed.

Leadership does not claim authority but gives freedom to work. A bad leader tries to take credit for the work of others and even tries to make himself appear supreme.

Those who cannot remember the past are condemned to repeat it.
#George_Santayana

The most important relationship we can all have is the one you have with yourself, the most important journey you can take is one of self-discovery. To know yourself, you must spend time with yourself, you must not be afraid to be alone. Knowing yourself is the beginning of all wisdom.
#Aristotle

#Self_Explanatory
I am not afraid of my loneliness. This is the end of my unfortunate things and the beginning of all my wisdom and destiny. Thanks to all those who rejected me, kept me away from my earnings and duties. I am a little tired, but not too much because of the sacrifices. You will face me very soon in the struggling field of karma.

शुक्रवार, 30 मई 2025

Overview of Democracy and Republic for Humanity

Differentiation in Unity:

Advocacy of regionalism supports socialism but secularism does not support either of them. All the countries of the world have a socialist concept. But there are some countries which are atheist. We cannot declare which concept we have adopted, because of lobbying there is discrimination in our unity, if we get rid of advocating regionalism, then we can achieve full development and become developed. Right now we are engaged in ourselves development and our loved ones, after this we think about socialism or secularism.

In democracy, power is in the hands of the people. In a republic, power is in the hands of individual citizens. In a democratic system, laws are made by the majority. In a republic, laws are made by the elected representatives of the people. We still have to ensure whether we are in a democratic system or a republican system. Because here, almost both the systems have been adopted according to the functioning of the Rajya Sabha, Vidhan sabha and the Lok Sabha as well as other procedures like Public meeting under Panchayat.


An Indian wants to be the richest and most popular in the world while an American and a Chinese want their country to be rich and popular because they know what power they have, but Indians do not know what power they have. Our politicians and businessmen care only about their personal interests, this is also happening in our business institutions, educational institutions and social environment that we only want personal growth. That is why till date we are a developing nation, not a developed nation. Only after this we think about socialism or secularism.

There is a competition in our business organizations, educational institutions etc. to get fame for themselves as to who is world famous and the justification behind this is the fame and growth of its director and inaugurator. There is no concern with the development and fame of the qualification of the members, students and teachers in these places. If by chance someone gets fame due to his efficiency, skill and scholarship, then it is a different matter, but there is no such system in our institutions that we pay attention to the development of those who study and work here. For example, in the Indian education system students are taught to cram and memorize, not read and understand. The new education policy is also supporting cramming and memorizing studies using technology, there is neither education nor support to understand technology and develop new technology. Similarly, in industrial institutions only workers are produced, not skilled workers and neither are the workers provided any education for the respective trade, perhaps the industrialist is afraid that he himself might become an industrialist after getting education. We are the biggest consumers of the product, as we have a lot of obstacles regarding productive activities of productivity, before manufacturing and exporting any product, we are bound to pay high taxes, donations and bribes to the competent authorities.

There is no doubt about our patriotism. We are patriots for our motherland by birth. Yet we are divided in caste, religion and language and culture, such that first we represent our states, caste and religion and only then we call ourselves Indians. I am sad to say that our current leadership is not expressing our real strength, as we are developing only on paper of figures, but we know very well that our workforce is not working as per our potential. Our workforce ratio is very poor as compared to China and America and other developed countries, while we have a lot of manpower but it is used only for voting. Because we are not stabilizing the manufacturing business, not adopting scientific research about agriculture management, and also we are not educating our generation as per the demand of workforce. We are adopting and nurturing the culture and innovation of other developed countries. We are giving our ideas and resources to foreign developed countries instead of using them ourselves.

Overview of Democracy and Republic for Humanity:

All the developed countries are following a fair democratic and republic system, as well as a powerful judiciary, but we are still planning to get rid of a corrupt system. It completely depends on the literacy of the parliamentary leaders of the country, until there is literacy of public awareness, people will not be able to vote fairly. Our leadership is trying to get ahead of democracy, while democracy needs to be followed here. Indians still believe in superstition and conservatism instead of supervision and cognitive development, the one who has supervision and cognitive is giving his services abroad.

Our leadership is engaged in eliminating the unemployed and the poor instead of eliminating poverty and unemployment, because we are implementing beneficial schemes instead of creating industries and productive sources. And our politicians do not hesitate to take credit for these schemes. They behave as if they are spending money from their salaries and party funds to run these beneficial schemes, whereas all the government beneficiary schemes are funded by donations received from private institutions along with taxes from the public and revenues from government institutions. In fact, our situation today is exactly like we got independence from a dictatorial regime only 10 years ago, but on the contrary, in the last 10 years, due to the change in our democratic system, we have become economically slaves of some rich people on the basis of our capitalist development. It is very sad that, under the pretext of economic and social development, our politicians are developing dictatorship along with arrogance and personal interests. There is an urgent need for comprehensive reform in the #democratic and #republic #system, so that the country is led according to the democratic system and not according to the personal system of any political party or politicians. 

Greek philosopher Aristotle said that "man is a social animal". He also said that society comes before the individual. Aristotle also said this in his book "Politics". Therefore, democracy and republic must be firmly established for the socio-economic development of humanity.

#Dictators, #capitalists and #politicians around the world have invented various types of biological, chemical and nuclear weapons to maintain their power, which are being used to strengthen their hold on the public in the form of world wars and epidemic disasters. If a scientist or scholar tells the truth about this to the public, he is killed. It is possible that more people may be killed, as I am also facing some financial burden due to political conspiracy. This has been happening for centuries and this is a practice of naturally controlling human life, which has been going on since forever, it should be refuted. Because in today's modern age, under the intellectual development of humanities, democratic and republican systems have been established to run human life, which should be followed firmly. Especially #anthropomorphism and how man imposes his nature and understanding on God. And to clarify a concept in #theology, if a donkey is asked what God looks like, the donkey will draw a picture of a donkey. Thus we need to follow the rules and laws made by human's to understand humanity. Instead of presenting ourselves in the place of God.

Socrates' statement that "Man is a social animal and it is natural and necessary for man to be social" is an important philosophical thought that raises an important point about the nature of man. According to many studies and researchers, man is considered a social animal because we cannot maintain our existence without social relations, cooperation and freedom of expression of the communication. But this fact will be determined on a global level when every single human being will suffer and be exploited by #dictatorship, #corruption, misconduct and will become an economic slave by the capitalists. The following article is beyond the understanding of uneducated persons, sycophants and blind followers.

Conclusion:

In this article I have published my personal review, in which I have presented my expression facing the republic and democracy. Please I request any politician or political party or dictator not to misuse its positive and important facts to further their agenda, if anyone finds something wrong, send me suggestions to change the article. In this I have not called any country's party or politician corrupt nor have I personally called anyone a dictator, this is just a review of the governance system established under the democratic and republican system. The anarchy prevailing in democracy and republic cannot be exposed in such few words, because through all the laws the freedom of expression is being eliminated by the dictatorial governance system and corrupt leaders. The rest of the world knows who is arrogant, dictator and who is corrupt, criminal.

Relation between administration and public:-

Ram forbids Lakshman to accompany him to the forest so that he can stay in Ayodhya and take care of the people.

🌺Jasu Raj Priya Praja Dukhari So Nripu Avsi Naraka Adhikari

Reference:- Ayodhya Kand / 70 / 6

Meaning:- The ruler in whose kingdom the beloved people are unhappy, that ruler definitely deserves hell, 

🌷Message:- You can achieve success only if your people, servants, colleagues are happy. The ruler who loves only power and ignores the suffering of the people, and is self-absorbed, can never discharge a successful leadership. True leadership is the one that puts public welfare above all else, not power and selfishness.🩷

🙏Namaskar🙏

May the God always keep y

ou healthy and happy

गुरुवार, 1 मई 2025

बैसरन घाटी हमला

नमस्कार दोस्तों, विभिन्न समाचारपत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में भारतीय पर्यटकों पर हुए हमले के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री ने फ़ोन करके भारत और पाकिस्तान से तनाव कम करने की अपील की है। जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है। पहलगाम हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बढ़े तनाव और टकराव की आशंका के बीच दुनिया के कई देशों ने संयम बरतने की अपील की है। 22 अप्रेल 2025 को जम्मू-कश्मीर के बैसरन घाटी में पर्यटकों पर हुए हमले में एक स्थानीय कश्मीरी समेत 26 लोगों की मौत हुई थी।



भारत ने इस हमले के बाद पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सख़्त क़दम उठाने की घोषणा की है। इस हमले के बाद दिए पहले सार्वजनिक बयान में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 'दोषियों को सख़्त सज़ा दी जाएगी।

भारत ने दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि को निलंबित करने, बॉर्डर क्रासिंग बंद करने और पाकिस्तानी नागरिकों के वीज़ा रद्द करने समेत कई फैसले लिए।

वहीं जवाब में पाकिस्तान ने 1972 के शिमला समझौते से बाहर आने का एलान किया है और कहा कि नदियों के पानी रोकने या मोड़ने का कोई भी प्रयास 'जंग की कार्रवाई' मानी जाएगी और इसका पूरी ताक़त से जवाब दिया जाएगा।

दोनों ही देशों के राजनीतिक नेतृत्व की ओर से एक दूसरे को कड़ी चेतावनी और मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई करने वाले तीखे बयान दिए जा रहे हैं।

पहलगाम हमले के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से भारत के प्रधानमंत्री ने बीते गुरुवार को एक रैली में कहा था कि 'हमला करने वाले आतंकियों को कल्पना से भी बड़ी सज़ा मिलेगी।

उन्होंने कहा, "मैं पूरा दुनिया को ये संदेश देता हूं कि भारत हर आतंकी को पहचानकर, खोजकर सज़ा देगा और उन्हें समर्थन देने वालों को भी... अब आतंकियों की बची ज़मीन को भी मिट्टी में मिलाने का समय आ गया है।

विभिन्न समाचारपत्रों के साक्षात्कार के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने किसी भी दुस्साहस का कड़ा जवाब देने की बात कही है, और कहा कि 'सिंधु जल संधि से जुड़ी किसी भी कार्रवाई को जंग का एलान माना जाएगा और हम किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं।

उनका इशारा पुलवामा आंतकवादी हमले के बाद भारत की ओर से बालाकोट में हवाई हमले की ओर था जब दोनों देशों की वायु सेनाओं में सीमित झड़प हुई थी।

दक्षिण एशिया की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार भारत की ओर से किसी सीमित सैन्य कार्रवाई की आशंका से इनकार नहीं कर रहे जिसमें एक व्यापक जंग छिड़ने का ख़तरा है, और साथ ही जल्दबाज़ी में सैन्य कार्रवाई का फ़ैसला लेने से आगाह किया है। क्योंकि कि भारत और पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न देश है, और भारतीय सेना के सीमित सैन्य कार्रवाई का जवाब देने के लिए पाकिस्तान पर्याप्त प्रयास कर सकता है।

विभिन्न समाचारपत्रों में प्रकाशित सैन्य क्षमता आंकलन के अनुसार 2025 में सैन्य स्ट्रेंथ रैंकिंग में भारत और पाकिस्तान के बीच आठ पायदान का फ़ासला है।

साल 2025 में वैश्विक सैन्य ताक़त के मामले में 145 देशों में भारत की रैंकिंग चौथी जबकि पाकिस्तान की रैंकिंग 12वीं है।


भारतीय सेना के पास क़रीब 22 लाख आर्मी जवान, 4,201 टैंक, क़रीब डेढ़ लाख बख़्तरबंद वाहन, 100 सेल्फ़ प्रोपेल्ड आर्टिलरी और 3,975 खींच कर ले जाने वाली आर्टिलरी है. इसके अलावा मल्टी बैरल रॉकेट आर्टिलरी की संख्या 264 है।

भारतीय एयरफ़ोर्स के पास 3 लाख 10 हज़ार वायु सैनिक और कुल 2,229 विमान हैं जिनमें 513 लड़ाकू विमान और 270 ट्रांसपोर्ट विमान हैं. कुल विमानों में 130 हमला करने वाले, 351 ट्रेनर और छह टैंकर फ़्लीट के विमान हैं।

भारतीय सेना के तीनों अंगों के पास कुल हेलीकॉप्टरों की संख्या 899 है जिनमें 80 अटैक हेलीकॉप्टर हैं।

भारतीय नेवी के पास 1.42 लाख नौसैनिक, कुल 293 पोत हैं जिनमें दो विमानवाहक पोत, 13 डिस्ट्रॉयर, 14 फ़िगेट्स, 18 सबमरीन और 18 कॉर्वेट्स युद्ध पोत हैं।

लॉजिस्टिक्स के तौर पर भारतीय सेना के पास 311 एयरपोर्ट्स, 56 बंदरगाह और 63 लाख किलोमीटर की सड़क और 65 हज़ार किलोमीटर की रेलवे कवरेज है। जबकि पाकिस्तानी सैन्य क्षमता के आंकलन के अनुसार पाकिस्तानी सेना के पास क़रीब 13.11 लाख आर्मी जवान, 1.24 लाख नौसैनिक और 78 हज़ार वायु सैनिक हैं।

पाकिस्तान के पास कुल 1,399 विमान हैं जिनमें 328 लड़ाकू विमान, 90 अटैक टाइप, 64 ट्रांसपोर्ट विमान, 565 ट्रेनर, 4 टैंकर फ़्लीट और 373 हेलीकॉप्टर हैं, जिनमें 57 अटैक हेलीकॉप्टर हैं। 

इसके पास 2,627 टैंक, 17.5 वाहन, 662 सेल्फ़ प्रोपेल्ड आर्टिलरी, 2629 खींच कर ले जाने वाली आर्टिलरी और 600 मल्टीबैरल रॉकेट आर्टिलरी है।

पाकिस्तानी नेवी के पास कुल 121 युद्ध पोत हैं, जिनमें 9 फ्रिगेट्स, 9 कॉर्वेट्स, आठ सबमरीन और 69 पेट्रोल वेसेल्स हैं।

लॉजिस्टिक्स के रूप में इसके पास सिर्फ़ तीन बंदरगाह, 116 एयरपोर्ट 60 मर्चेंट मैरीन फ़्लीट हैं. इसके अलावा 2 लाख 64 हज़ार किलोमीटर सड़क और 11.9 हज़ार किलोमीटर रेलवे कवरेज है।

स्वीडन के थिंक टैंक स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपरी) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास 172 जबकि पाकिस्तान के पास 170 परमाणु वॉरहेड हैं।

हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि दोनों देशों के पास कितने परमाणु वॉरहेड तैनात हैं।

इस प्रकार पाकिस्तान भारत का मुक़ाबला करने के लिए हर संभव तैयारी कर रहा है, जबकि भारत का ध्यान लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों की तैनाती पर केंद्रित है. यानी ऐसे हथियार जो चीन को भी निशाना बना सकते हैं।

भारत और पाकिस्तान के पड़ोसी और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी परमाणु शक्ति चीन के पास परमाणु हथियारों की संख्या 22 फ़ीसदी इज़ाफ़े के साथ 410 वॉरहेड से बढ़कर 500 हो गई है।

पिछले साल नवंबर में प्रकाशित समाचारपत्रों में लेख के मुताबिक़, भारत और पाकिस्तान अपनी ड्रोन्स की संख्या में तेज़ी से वृद्धि कर रहे हैं।

रक्षा मामलों के विश्लेषकों के अनुसार, भारत के पास अगले दो से चार सालों में लगभग पांच हज़ार ड्रोन्स होंगे। उनके अनुसार पाकिस्तान के पास 'भारत से कम ड्रोन्स' हैं।

पिछले साल अक्तूबर में भारत ने अमेरिका से साढ़े तीन अरब डॉलर मूल्य के 31 प्रीडेटर ड्रोन्स ख़रीदने का समझौता किया था। प्रीडेटर ड्रोन्स दुनिया के सबसे कामयाब और ख़तरनाक ड्रोन माने जाते हैं। 

पहलगाम हमले से बदल गए हैं हालात, भारत ने हाल के सालों में कश्मीर के हालात सामान्य होने पर ज़ोर दिया है जिसके, परिणामस्वरूप वहां पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जिससे कश्मीरी युवाओं को रोजगार उपलब्ध हो रहा है। इसके साथ ही कश्मीर की जनता खुशहाली एवं भाईचारे से अपने भारत देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में अपना महत्व्पूर्ण सार्थक योगदान दे रहे हैं।

विश्लेषकों के अनुसार हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बिच हालात बिगड़ गया है, और नियम कानून बदलते हुए नजर आ रहे हैं। 

परन्तु भारत देश में अहिंसा, सत्य और धार्मिक सद्भावना के साथ आपसी सोहार्द एवं भाईचारा है, जिससे की मुल्क में अमन-चैन कायम है।

आंतकी संगठनों द्वारा हमारे देश में हिंसा और अशांति फैलाने का निरर्थक प्रयास कभी सफल नहीं हो सकता है, भारत के देशवासियों के हिम्मत और ताकत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है, आंतक के आकाओं को मिट्टी में मिलाना है।

शायद हमें अंतर्राष्ट्रीय नैतिकताओं की बाध्यता, के साथ ही अमेरिका और चीन जैसे देशों के कुटनीतिज्ञ षड्यंत्र की आशंकाएं हैं। नहीं तो आंतकी संगठनों के मुखिया पाकिस्तान को सबक सिखाना कोई बड़ी बात नहीं है, हम पहले भी कई बार इनको घुटनों पर ला चुके हैं, लेकिन इस बार युद्ध के बाद शायद ये अपने पैरों तले जमीन पर खड़ा नहीं हो सकता है।

द्वंद्व कहां तक पाला जाए, 

युद्ध कहां तक टाला जाए।

तू भी है राणा का वंशज, 

फेंक जहां तक भाला जाए।

इस बिगड़ैल पड़ोसी को तो, 

फिर शीशे में ढाला जाए।

दोनों ओर लिखा हो भारत, 

सिक्का वही उछाला जाए...

प्रस्तुत लेख में प्रकाशित विवरण एवं समिक्षा, विभिन्न समाचारपत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ही बताया गया है। कृपया तथ्यों और सूचनाओं से संबंधित विषयों पर किसी भी प्रकार के सुझाव एवं बदलाव के लिए हमें सुचित करें। ब्लॉग पेज को सबस्क्राइब, लाइक और शेयर जरुर करें। 

#जय हिन्द #जय भारत

सोमवार, 28 अप्रैल 2025

।।सत्य से असत्य का युद्ध।।

धर्म से अधर्म का युद्ध है

लेकिन फैसला धर्म से धर्म का है, 

देश से देश लड़ेंगे और होंसला देशवासियों का है,

ईमान से ईमान, बेईमान से बेईमान कब लड़ा है,

लडाई गरीबी-अमीरी से है, 

कौन कहता है इंसान से इंसान लड़ा है, 

जरूरत है जंग की क्योंकि आतंकवाद मिटाना है, 


    चरमपंथी आंतकी के आकाओं को मिट्टी में मिलाना है,

मत भूलो एक दिन मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है,

वीरगति को प्राप्त वीरों की वीरांगनाओं का, 

कर्ज हमें चुकाना है,

लहू को लहुलूहान कर रंग रगो को बताना है,

क्या, कभी राम से अल्लाह, राम से राम, या अल्लाह से अल्लाह लड़ा है।


।।जय हिन्द, जय भारत, वंदेमातरम।।


शुक्रवार, 31 जनवरी 2025

चापलूसों की जी-हजूरी

चाटूकारीता और जी हजूरी से कुछ मिलने वाला नहीं है, हम भोजपुरीया है हमारा इतिहास गरीमा पूर्ण है, हमारे भोजपुरी की धरती मां ने अनेकों होनहार बिरवान पैदा किया है, 1857 की क्रांति का बिगुल हमने (मंगल पाण्डेय ने) बजाया जबकि इस समय गांधी जी पैदा भी नहीं हुए थे, इमरजेंसी में देश को राह हमने (जयप्रकाश नारायण ने) दिखाया, शायद अन्ना हजारे जैसे इस समय सक्रिय रूप से समाज सेवा में नहीं थे।, देश को आर्थिक संकटों से छुटकारे की राह हमने (चंद्रशेखर जी ने) दिखाया तब नरेंद्र दामोदर दास मोदी राजनीति का कखगघ ककहरा सिख रहे थे। लेकिन इस आधुनिक एवं पुंजीवादी समय में हम सिर्फ अच्छे जिवन और केवल स्वयं के मान सम्मान की इच्छा रखते हैं। और आज हम अपनी राह खुद भूल गए हैं। देखा जाए तो राजनीति में नाम मात्र के लिए हमारी-आपकी भागीदारी है क्योंकि देश के लिए निर्णायक समझौते में हमारी कोई विशेष भागीदारी नहीं है हां कुछ चाटूकारों और चापलूसों के रूप में हमारी उपस्थिति जरूर है, ना तो अब तक आठवीं अनुसूची में भोजपुरी भाषा को मान्यता मिली है और ना ही हमारे लिए कोई आभार प्रकट करता है। बाकी हमारे भोजपुरी क्षेत्र से कोई उद्योगपति भी ऐसा नहीं है जो गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे प्रांतों के उद्योगपति से बड़ा हो, एक राजनीतिक पार्टी या राजनेता ढूंढने से भी नहीं मिलेगा जो वास्तव में हमारे भोजपुरी के पक्ष में कुछ कर गुजरने को तैयार हो। हां इतना जरूर है कि संसद में कुछ छूट भैया चापलूस वोट के लिए हमारे-आपके पक्ष में भाषण और ज्ञापन देकर दिल्ली और मुंबई में आराम से राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ जिलों में हमारी भोजपुरी भाषा की उपस्थिति जरूर है लेकिन हमें किसी राज्य में मान्यता नहीं है राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता की बात दूर है। इसके लिए एक और क्रांति तथा बलिदान की जरूरत है जो हमारी भागीदारी एवं गरीमा पूर्ण इतिहास को स्थापित करते हुए देश की दशा और दिशा में सुधार करने में योगदान प्रदान करे। हम सब मोह माया के बंधन में बंधे हैं परन्तु जो नहीं बंधा उसको अपने अधिकार एवं सम्मान के लिए आगे जरूर आना चाहिए।

परन्तु हम पूंजीपतियों द्वारा स्थापित सरकार के गुलाम हैं।

उदाहरणार्थ श्री रामचरितमानस में उद्धृत।। मानस के प्रेरणादायक दोहे/चौपाइयां

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥

तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥

प्रस्तुत चौपाई में तुलसीदास जी कहते है ।

जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसके शरीर के छाया के छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से अँकवार भरकर हृदय से लगाकर श्री रामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी, आनंद और प्रेमवश शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो गले मिल रहे हैं, सम्मान दे रहे हैं अपने क्षत्रिय धर्म का पालन कर रहे है॥

*इसका भावार्थ और संदेश यह है कि जो अपने वर्ण एवं धर्म के अनुसार कार्य करते हुए राम को भजता है वह सम्मान प्राप्त करने योग्य है*।

अर्थात यदि ब्राह्मण पूजा पाठ और दान दक्षिणा के लिए मना करता है तो वह अपने धर्म और वर्ण व्यवस्था को अपमानित कर रहा है, यदि चमार, क्षत्रिय एवं क्षुद्र, वैश्य, आदि अपने धर्म और वर्ण व्यवस्था को न मानकर शिक्षा और सम्पन्नता एवं समृद्धि के मद में चूर हो कर विपरीत व्यवस्था अथवा धर्म और वर्ण के अनुसार कार्य करते है तो वह सनातन धर्म और संस्कृति तथा ब्रह्मजी द्वारा संचालित व्यवस्था को खंडित कर रहे हैं। इसमें जात-पात ऊंच-नीच का खंडन नहीं किया गया है और ना ही यह कहा गया है कि कोई भी वर्ण व्यवस्था के विपरीत कार्य करें। सिर्फ मानवता का यह संदेश दिया गया है कि मनुष्य एक दुसरे से भेदभाव न करें, अंधविश्वासी और रूढ़िवादी न बने। लेकिन आज के समाज में उपस्थित वर्ण व्यवस्था इस प्रकार खंडित हो गया है कि समझ में नहीं आ रहा है कि सनातन धर्म में उपस्थित वर्ण व्यवस्था और रीति रिवाजों और संस्कृति को कैसे समझा जाए और वर्णित किया जाए, सब विघटित होता जा रहा है। बहुत कुछ है जो कम शब्दों में कहना या समझाना मुश्किल है। किसी भी वेदों ने पुराणों में या उपनिषद में सनातन धर्म के वर्ण व्यवस्था को और संस्कृति को खंडित या विघटित करने का प्रयोग या प्रयास नहीं किया गया है परन्तु आज के समाज में वैश्विक आधुनिकता ने पूंजीवाद ने सब समाप्त कर दिया है। रामचरितमानस की इस चौपाई एवं प्रसंग को विद्वानों द्वारा ठीक से संदर्भित और सार गर्भित नहीं किया गया है। धन्यवाद


शुक्रवार, 15 नवंबर 2024

।।विश्वगुरु।।

डूब गया हिन्द महंगाई के महासागर में,

ले रही अंगड़ाई जवानी बेरोजगारी भत्ता के धरातल पर।।


गांधी ने स्वराज लिखा,

शहिदे आज़म ने इन्कलाब लिखा,

बाबा साहेब ने संविधान

संतों ने सनातन किताब लिखा,

परमात्मा ने विधी का कैसा 

ये विधान लिखा।।


वर्तमान में नौजवान पूंजीवादी व्यवस्था का आर्थिक गुलाम दिखा,

सरजमीं पर सैनिक मेहरबान मिला खेतों में भुखा किसान दिखा।।


देश के अंधभक्तो को चौकिदार 

प्रधान मिला अपने फकिरी से

परेशान दिखा।।


मुफ्तखोरी मे जनता जनार्दन पहलवान मिला,

पढ़ा लिखा अनपढ़ राजनेता विद्वान मिला, 

अभिनेता पात्रता से भगवान दिखा 

हे प्रभु इस दौर का कैसा ये इतिहास लिखा।।


बहरा सुनें अंधा देखे गूंगा बोले

ऐसा क्यों वर्तमान दिखा,

जैसे प्रांतों में बिखरा विभिन्न भाषाओं में जकड़ा धर्म के 

बंधन में बंधा हिन्दुस्तान मिला।।


सपनों में उपस्थित मंदिर मस्जिद 

गिरजाघर गुरूद्वारा खुशहाल मिला।।

हे प्रभु अति रीति का अंत निश्चित 

अंतिम अब प्रमाण दिखा,

विश्वगुरु है भारत ऐसा कोई चमत्कार दिखा‌।‌।


कलम के कानून से जज मुझे हैरान दिखा,

पत्र पढ़ पत्रकारिता का पत्रकार

मुझे अज्ञान मिला।।


हे प्रभु मैं ठहरा क़लम का फकीर 

क्षात्र मुझे समझदार मिला,

शिक्षक आंदोलन से परेशान दिखा,

हे प्रभु इस दौर का ऐसा क्यों विधान लिखा।।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2024

The Godfather as an Employer

A joke is circulating in the job market. Interviewers often ask candidates, "Tell me about yourself," even though the candidate has already provided that information in written form. It seems like a mere formality. Then they ask, "Why do you want to join us, and why are you leaving your current job?" The candidate has already explained that they are looking for new opportunities and a salary hike.

If someone has worked somewhere for a short period, interviewers often ask, "Why have you changed jobs so frequently?" The candidate then has to explain their reasons for changing jobs. Ultimately, the conversation should focus on the job responsibilities, as the interview should always center around the job’s requirements. It doesn’t matter how you performed in your past jobs unless you were terminated or involved in some dispute. The key issue is how well the candidate matches the current job requirements.

If the candidate fulfills all the job criteria, HR will assess them on a 100% scale. The selection committee often chooses the best performer, but they should remember that no one can give 100% in an interview. If a candidate has been shortlisted for an interview, it means their resume already meets the necessary standards. What’s crucial is to see how they perform based on the job’s responsibilities.

Frankly speaking, I’m tired of questions like "Tell me about yourself" or "Why are you leaving your current job?" Interviewers should directly ask about the job’s demands and requirements. They can verify the candidate's qualifications and experience, and assess them through practical and theoretical tests. They can confirm certificates and experience through the provided references. If necessary, they can ask the candidate if they have any political or organizational connections, such as recommendations from employees, officials, or middlemen working in the organization. Please do not waste your time, as well as the candidate's time and money.

There’s no need to act like a "Godfather." Please stop exploiting job seekers. I’ve faced such absurd questions and mental pressure myself. If a candidate fulfills 70-90% of the job requirements and desperately needs the job, then give them the job.

The job crisis in India is not new, but corruption and internal contacts manipulating job opportunities have become a new issue. I’ve written several blogs about the unhealthy atmosphere of the Indian job culture. I urge employers not to underestimate deserving candidates in favor of internal referrals or so-called "perfect" candidates.

I’m still waiting for the right opportunity, though I’m not sure when or if it will come. Still, I won’t compromise my attitude. I have always been a unique personality, and I won’t lose my self-respect and honesty. I’m grateful for all the opportunities that have come my way and those that will come. Best wishes to the interviewers in the selection committees.

शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

The Highlights of our work Culture

There are three types of work sectors in Indian economic cities, one is organized, second is unorganized and third is gig work. But our labour force participation rate is not enough for our economy, because the government has not created any new #organization of manufacturing and no corporate is doing anything. As per the current scenario the #unemployment rate (percentage) is 9.2% (June 2024) while the government is manipulating and reporting it as just below 7%. Workers or employees are also divided into four categories, high skilled, skilled, semi skilled and unskilled. You can search these data online. I am talking about high skilled and high skilled employees here.

Indian work culture is rich and diverse, reflecting the country's unique blend of tradition and modernity. There are a few drawbacks. In the meantime, I am trying to find positive things amidst the unhealthy work culture, hoping that I will not be able to succeed due to office politics and government policies.

Some #employers and #corporates are behaving like dictators, they are trying to exploit employees through some sycophantic, dishonest and cruel officers. They only want their success and prosperity, they are using employees as a part of services. Employers do not want to keep you as a permanent employee, because they have to give you statutory compliance.

Employers are willing to cut costs because they are offering you the job only for a fixed period during which you will not be eligible for any awards or claims. Compensation is important, but without balance, retention becomes difficult.

Employees rarely leave a job when they feel they are being respected.

When they:

Are promoted

Are given fair remuneration

Are treated with respect

Are given support through guidance

Are appreciated for their efforts

Are trusted to deliver results

Are empowered to make decisions

Are encouraged to grow

Are given recognition for their achievements

This highlights the importance of creating a positive culture and investing in your team for long-term success.

Employees never leave a job

When they are

Paid well

Promoted

Respected

It is essential to give employees the time to enjoy their hard-earned income, and the opportunity to spend quality time with their loved ones without the need for approval.

Regular leaves are essential to maintain efficiency and health.

While it is important to acknowledge and value their contributions, expecting one person to handle the workload of four people is not sustainable. Organizations must ensure proper resource allocation and have backups to prevent overburdening individuals. Without these measures, resignations become inevitable.

All the employees and officers should not forget that they are working as a worker in a company or organization, they are not the #owner of the company and the work of the organization cannot stop due to their presence or absence. If they think so, then the owners of the organization have other options instead of such arrogant employees.

And yes, due to some #sycophant employees, the salary hike and promotion of honest employees can be hindered, but it cannot be stopped. I have more than 15 years of work experience, but I never tried to become the boss of my junior colleague and neither I ever tried to become the sycophant of the boss, but yes I always told wrong as wrong and right as right, due to which I never got any high post or salary in any organization, that's why I have changed and left some reputed organizations, because I do not like to do any kind of politics in the office.

I have always worked for self respect and self satisfaction, whenever I did not get respect and satisfaction I resigned. I am still struggling to fulfil my requirement in my career, because I always believe in cooperation. If the owner of the organization is aware of such political environment then such people should be thrown out before any dispute of sycophant and egoistic employees. An organization will reach the height of success only when there is healthy work environment and cooperative employees and also the owner is honest towards his employees. 

In today’s era, no quality matters, if someone can prove his experience and references on paper, then it does not matter how much he has manipulated his certificates. It does not matter whether he knows how to work or not. If any of his acquaintances is working in an institution, then he easily gets a job. But this is not the case with me. I have never made acquaintances with anyone so that my incompetence gets deserved recognition from them. Any job or business in India requires political views or contacts. I do not have such views or contacts, nor do I wish to do so.

And yes, a self-respecting, honest and neutral person like me cannot have any introduction. But today my struggle has become so difficult that I may have to sacrifice my self-respect and honesty in front of dishonest, sycophantic, arrogant and cunning people. But this cannot happen even after my death. Let’s see how long my true struggle makes me feel alive.

Many more things can be discussed on this topic, but I don’t want any Exception.

#Someone has written very beautifully.

I would have also reaped the harvest of progress,

If I too had licked someone's feet,

It was just that my tone was not “yes sir”,

Apart from this I had no fault,

If I had become indiscreet even for a moment,

Believe me, I would have become rich long ago.

Let us talk further about those who lick feet and those who do not lick. Well, in today's era, for the completion of any work and prosperity, it is necessary to lick the feet of a particular person, to flatter, to be dishonest and to be cruel. Just think about your self satisfactions, are you satisfied?

To be continued…..


शनिवार, 21 सितंबर 2024

हो ना हो

कामयाब होने के कम,
नाकामयाबी के चर्चे ज्यादा है।।
सितारों से सजी चांदनी के,
हिस्से में अंधेरी रात है।।

चांद की चांदनी से साजिश में,
फिर क्यों बहाना बरसात का।।

फिर ये रात हो ना हो,
मुकद्दर से मिलने की बात,
हो ना हो, खुदा से इल्तिज़ा है,
अंधेरे में चांदनी बरसात हो।।

चमकते चांद की साज़िश,
नाकामयाब हो, 
रोशनी में क्या बात हो,
शायद अंधेरे में फिर मुलाकात हो।।

मेरे तनहाईयों की बात हो ना हो,
सिर्फ तुम्हारे शहनाईयों की बात हो।।

वक्त की कैद से चंद लम्हे,
उधार लाया हूं, 
नसीब से फिर मिलेंगे, 
मुकद्दर में शायद ये बात,
हो ना हो।।

जिंदगी एक सफर है,
मंजिल तक साथ तेरे,
सांसें हमारी कामयाब हो ना हो।।

हो सकता हूं साज़िश का शिकार,
पर मां की दुआएं, बाप का हौसला देख,
हादसे कामयाब हो ना हो।।

दोस्तों दोस्ती के इम्तिहान में,
जिंदगी के पर्चे ज्यादा है,
मेरे हिस्से में मेरा चांद आधा,
मेरी नाकामयाबी के चर्चे ज्यादा है।।

लम्हों की कैद में जिंदगी है,
मगर क्या फर्क पड़ता है कभी,
मां की दुआं बाप के हौसले में,
वक्त पे हम कामयाब हो ना हो।।

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