Time is very strong, how did Lord Krishna free Lord Shri Ram from debt.
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बलवान समय का संक्षिप्त विवरण।
जब समय सबक सिखाता है, तब अर्जुन जैसे वीर धनुर्धर भी अभीर लुटेरों से हार जाता हैं, और कृष्ण जैसे भगवान भी जरा नामक शिकारी के बांण से मुर्छित होकर देह त्याग देते हैं, समय बहुत बलवान है। दोस्तों
यह घटना धर्म और न्याय से संबंधित कसौटी पूर्ण विषय रहा है, क्योंकि राम ने छिपकर बाली का वध किया था, और जरा ने अनभिज्ञतावश अपने पूर्वजन्म के अन्याय के विरुद्ध न्याय की प्राप्ति श्रीकृष्ण लीला के माध्यम से परिपूर्ण किया।
राम ने बाली को पेड़ के पीछे से बाण मारकर उसका वध कर दिया था। राम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य वापस दिलाया और फिर बाली की पत्नी तारा ने राम को श्राप दिया था।
समय-समय पहचानिए समय बड़ा बलवान
का वे अर्जुन लुटिया वहीं धनुष वहीं बाण
अर्जुन रोते हुए कहने लगे वहीं तीर वहीं
कमान पर समय मेरे साथ नहीं था।
भगवान श्रीकृष्ण के स्वर्ग जाने पर अर्जुन और द्वारिका वासियों के दुर्गति का मार्मिक वर्णन हमारे ग्रन्थों और पुराणों में वर्णित है।
यदुवंश में अंधक, वृष्णि, माधव, यादव आदि वंश चला। श्रीकृष्ण वृष्णि वंश से थे। वृष्णि ही 'वार्ष्णेय' कहलाए, जो बाद में वैष्णव हो गए।
वृष्णिवंशियों को दो श्राप लगे थे। एक गांधारी का और दूसरा ऋषियों का। श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे लेकिन श्राप पलटने में उनकी रुचि नहीं थी। श्राप का परिणाम मौसुल युद्ध था। इस आपसी झगड़े में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित कुल के लगभग सभी पुरुष और स्त्रियों का नाश हो गया था। मौसुल युद्ध के कई रहस्य हैं। जिसमें से एक रहस्य यह भी है कि, कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने प्रभु श्रीराम को ऋण से मुक्त किया।
द्वापर युग से भगवान विष्णु का प्रस्थान और कलयुग का प्रारंभ :
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद यादवों का प्रभाव काफी बढ़ता जा रहा था और वह आपस में ही संघर्ष करने लगे थे। ऐसे में एक दिन वायु देवता को दूत बनाकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण के पास भेजा। वायुदेव ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि देवताओं ने कहा है कि, आपने पृथ्वी पर फैले पाप का अंत करने के लिए अवतार लिया था और अब आपका कार्य पूरा हो गया है। अगर आपकी इच्छा हो तो आप अपने लोक वापस आ जाएं अथवा आपकी अभी और पृथ्वी पर रहने की इच्छा हो तो आप रह सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जब तक यदुवंशियों का अंत नहीं हो जाता तब तक पृथ्वी का भार कम नहीं होगा इसलिए अब मैंने इनके अंत की व्यवस्था कर दी है, और अब केवल सात दिनों के अंदर मैं भूलोक का त्याग कर दूंगा।
और लगभग यहां से द्वापर युग के अंत का शुरुआत हुआ और कलयुग का प्रारंभ।
भगवान श्रीकृष्ण के ऐसा कहने के बाद वायुदेव वापस चले गए लेकिन द्वारिका में अपशकुन के बादल मंडराने लगे।
मौसुल युद्ध में श्राप की भूमिका :
महाभारत युद्ध के बाद जब 36वां वर्ष प्रारंभ हुआ तो राजा युधिष्ठिर को तरह-तरह के अपशकुन दिखाई देने लगे। विश्वामित्र, असित, दुर्वासा, कश्यप, वशिष्ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारका के पास पिंडारक क्षेत्र में निवास कर रहे थे। एक दिन सारण आदि किशोर जाम्बवंती नंदन साम्ब को स्त्री वेश में सजाकर ऋषियों के पास ले गए और बोले- ऋषियों, यह कजरारे नैनों वाली बभ्रु की पत्नी है और गर्भवती है। यह कुछ पूछना चाहती है लेकिन सकुचाती है। इसका प्रसव समय निकट है, आप सर्वज्ञ हैं। बताइए, यह कन्या जनेगी या पुत्र।
ऋषियों से मजाक करने पर उन्हें क्रोध आ गया और वे बोले, 'श्रीकृष्ण का पुत्र साम्ब वृष्णि और अर्धकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक विशाल मूसल उत्पन्न करेगा। केवल बलराम और श्रीकृष्ण पर उसका वश नहीं चलेगा। बलरामजी स्वयं ही अपने शरीर का परित्याग करके समुद्र में प्रवेश कर जाएंगे और श्रीकृष्ण जब भूमि पर शयन कर रहे होंगे, उस समय जरा नामक शिकारी उन्हें अपने बाणों से बींध देगा।' मुनियों की यह बात सुनकर वे सभी किशोर बहुत डर गए। उन्होंने तुरंत साम्ब का पेट (जो गर्भवती दिखने के लिए बनाया गया था) खोलकर देखा तो उसमें एक मूसल मिला। वे सब बहुत घबरा गए और मूसल लेकर अपने आवास पर चले गए। उन्होंने भरी सभा में वह मूसल ले जाकर रख दिया।
उन्होंने राजा उग्रसेन सहित सभी को यह घटना बता दी। उन्होंने उस मूसल का चूरा-चूरा कर डाला तथा उस चूरे व लोहे के छोटे टुकड़े को समुद्र में फिंकवा दिया जिससे कि ऋषियों की भविष्यवाणी सही न हो। लेकिन उस टुकड़े को एक मछली निगल गई और चूरा लहरों के साथ समुद्र के किनारे आ गया और कुछ दिन बाद एरक (एक प्रकार की घास) के रूप में उग आया।
मछुआरों ने उस मछली को पकड़ लिया। उसके पेट में जो लोहे का टुकडा था उसे जरा नामक शिकारी ने अपने बाण की नोंक पर लगा लिया।
भगवान श्री कृष्ण द्वारिका छोड़ स्वर्ग जाने के लिए योग में लीन हो गए, और जरा नामक शिकारी ने भगवान श्रीकृष्ण के पैर को मृग की आंख समझकर दूर से बाण चला दिया। इस बाण के लगते ही भगवान मूर्च्छित हो गए। जरा ने जब श्रीकृष्ण को देखा तो काफी घबरा गया और अपराध बोध से दुखी हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने तब जरा को समझाया कि यह तो मेरे विधान से ही रचा हुआ था। मैंने स्वयं ही अपने देह त्याग के लिए इस विधि को चुना था। क्योंकि तुम्हारे पूर्वजन्म का ऋण मुझ पर था। जरा पूर्वजन्म में बाली था, जिसका वध भगवान राम ने किया था। इस प्रकार राम को श्राप से मुक्ति मिली।
मौसुल युद्ध का प्रारंभ :
इस युद्ध के कई रहस्य हैं। द्वारिका में अपशकुन के बादल मंडराने लगे। एक दिन सभी यदुवंशी प्रभास क्षेत्र यानी वर्तमान सोमनाथ मंदिर के पास स्थित समुद्र तट पर आए। यदुंवशि प्रभास में उत्सव के लिए इकट्ठे हुए थे। परन्तु आपसी वाद विवाद में आपस में उलझ पडे। झगड़े की शुरुआत कृतवर्मा के अपमान से हुई। सात्यकि ने मदिरा के आवेश में उनका उपहास उड़ाते हुए कहा कि अपने को क्षत्रिय मानने वाला ऐसा कौन वीर होगा, जो रात में मुर्दे की तरह सोए मनुष्यों की हत्या करेगा। तूने जो अपराध किया है, यदुवंशी उसे कभी माफ नहीं कर सकते। उसके ऐसा कहने पर प्रद्युम्न ने भी कृतवर्मा का अपमान करते हुए उनकी बात का समर्थन किया।
कृतवर्मा ने महाभारत का युद्ध लड़ा था और वे युद्ध में जीवित बचे 18 योद्धाओं में से एक थे। कृतवर्मा यदुवंश के अंतर्गत भोजराज हृदिक का पुत्र और वृष्णि वंश के 7 सेनानायकों में से एक था। महाभारत युद्ध में इसने एक अक्षौहिणी सेना के साथ दुर्योधन की सहायता की थी। कृतवर्मा कौरव पक्ष का अतिरथी योद्धा था।
कृतवर्मा को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने एक हाथ उठाकर सात्यकि का तिरस्कार करते हुए कहा, 'भूरिश्रवा की बांह कट गई थी और वे मरणांत उपवास का निर्णय कर युद्ध भूमि में बैठ गए थे, उस अवस्था में भी तुमने वीर कहलाकर भी उनकी नृशंसतापूर्वक हत्या क्यों कर दी थी। यह तो नपुंसकों जैसा कृत्य था। इस बात पर सात्यकि को क्रोध आ गया। उन्होंने तलवार से कृतवर्मा का सिर धड़ से अलग कर दिया। बात बढ़ती चली गई, झगड़ा इतना बढ़ा कि वे आपस में वहां उगे हुई घास को उखाड़कर उसी से एक-दूसरे को मारने लगे। उसी 'एरका' घास से यदुवंशियों का नाश हो गया। हाथ में आते ही वह घास एक विशाल मूसल का रूप धारण कर लेती। श्रीकृष्ण के देखते-देखते साम्ब, चारुदेष्ण , प्रद्युम्न और अनिरुद्ध की मृत्यु हो गई। और सब काल-कवलित हो गए। मूसल के प्रहार से उन सबने एक-दूसरे की जान ले ली।
बलरामजी की देह त्याग के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सारथी से कहा कि अब मेरे भी जाने का समय हो गया है इसलिए में योग में लीन होने जा रहा हूं। द्वरिका में जो लोग बच गए हैं उन सभी को कह दो कि अर्जुन के आने के बाद वह द्वारिका को छोड़कर उनके साथ चले जाएं। क्योंकि अर्जुन के द्वारिका से जाने के बाद मैंने समुद्र से जो भूमि द्वारिका नगरी बसाने के लिए ली थी समुद्र उसे डुबो देगा। उस समय केवल मेरा भवन ही शेष रह जाएगा।
मौसुल युद्ध में अर्जुन का रहस्य :
विष्णु पुराण में कथा है कि, श्रीकृष्ण और यदुवंशियों के शरीर का अंतिम संस्कार करके अर्जुन जब द्वारिका से निकले तो भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा मानकर वे अपने साथ द्वारिका वासियों सहित भगवान श्री कृष्ण की कई पत्नियां और अन्य यदुवंशियों की स्त्रियों को हस्तिनापुर लेकर चल दिए। द्वारिका से उनकी अंतिम विदाई हो रही थी, इसलिए जिनके पास जो धन संपदा थी वह साथ में लेकर नगर से निकल चले।
अर्जुन सभी यदुवंशी महिलाओं और वज्र को लेकर हस्तिनापुर की ओर चले। रास्ते में भयानक जंगल आदि को पार करते हुए वे पंचनद देश में पड़ाव डालते हैं।
वहां रहने वाले अभीर लुटेरों को जब यह खबर मिलती है कि अर्जुन अकेले ही इतने बड़े जनसमुदाय को लेकर हस्तिनापुर की ओर चले हैं।
तभी लुटेरे द्वारिका की कन्याओं और धन संपदा को पाने के लिए ललचाने लगे। हालांकि उनके लिए बड़ी बाधा अर्जुन थे।
जिनके पराक्रम को सभी लोग जानते थे लेकिन लालच में अंधा हुआ मनुष्य जान को जोखिम में डालने से भी नहीं चूकता है। सभी ने मिलकर कन्याओं और धन को लूटने का फैसला कर लिया।
लुटेरों ने ग्रामीणों को धन का लालच देकर लूट में अपनी सहायता करने के लिए ग्रामीणों को तैयार कर लिया। अर्जुन सतर्कता से चल रहे थे लेकिन आने वाले खतरे से अंजान थे।
मार्ग में अचानक उनको अभीर लुटेरों ने घेर लिया और कन्याओं और धन पर अधिकार जमाने लगे। अर्जुन ने सभी को भय दिखाकर भगाने का प्रयास किया, लेकिन अर्जुन के किसी भी बात का अभीर लुटेरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
तब अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और लुटेरों पर दिव्य बाणों का प्रयोग करना चहा लेकिन, अर्जुन हैरान रह गए।
अर्जुन बार-बार मंत्र बोलकर दिव्यास्त्रों को बुला रहे थे लेकिन दिव्यास्त्र प्रकट नहीं हुए। अर्जुन का दिव्य गांडीव धनुष भी सामान्य धनुष के जैसा बन गया।
महाभारत युद्ध में पूरी कौरव सेना को पराजित करने वाले अर्जुन आश्चर्य में थे कि उनकी शक्तियों को क्या हो गया है। एक-एक बाण से अर्जुन लुटेरों के समूह पर प्रहार कर रहे थे।
लुटेरे ने अग्निदेव से प्राप्त अर्जुन के अक्षय तरकश, जिनमें बाण कभी समाप्त नहीं होते थे उसे भी तोड़ दिया फिर अर्जुन टूटे हुए बांण के नोक से लुटेरों के साथ लडते हुए अंततः हार गए।
अर्जुन को पराजित करके अभीर लुटेरों ने द्वारिका की स्त्रियों और धन संपदा को अर्जुन के देखते-देखते लुटकर चले गए।
अर्जुन शोक में डुबे हुए थे और रो रहे थे। लुटेरों से पराजित अर्जुन किसी तरह से महर्षि व्यास के पास पहुंचे और पूरी स्थिति बताई। व्यासजी ने बताया कि दरअसल तुम जिस शक्ति की बात कर रहे हो और जो कुछ शक्तियां तुम्हारे पास थीं वह तो तुम्हारी थी ही नहीं।
सारी शक्तियों के स्वामी तो स्वयं श्रीकृष्ण थे। जब तक वह तुम्हारे साथ थे तब तक उनकी शक्तियां भी तुम्हारी थीं। उनके जाने के साथ वो शक्तियां भी चली गईं।
अब यह जो कुछ भी हो रहा है वह उनकी मर्जी से हो रहा है।
व्यासजी बोले सुनो अर्जुन विपत्ति के समय बल, बुद्धि, ऊर्जा और शक्ति क्षीण हो जाती है।
ब्रह्मांड काल द्वारा नियंत्रित है। यह देता है और लेता है। बलवान दुर्बल हो जाता है, धनवान निर्धन हो जाता है, और निर्धन धनवान हो जाता है। यही नियति है, समय के साथ तुमने अपनी भुजाओं की शक्ति खो दी है। यह वापस आ भी सकती है और नहीं भी। स्पष्टतः मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारे धरती से जाने का समय भी आ गया है।
अर्जुन ने व्यासजी के समझाने पर भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम आज्ञा का ध्यान करके उनके प्रपौत्र वज्रनाभ जी को यदुवंशियों का राजा बना दिया।
वज्रनाभ जी उस समय बहुत छोटे थे इसलिए हस्तिनापुर में रहे, और पांडवों के देह त्याग और स्वर्गारोहण के बाद परीक्षित जी ने इनका ध्यान रखा और बाद में मथुरा मंडल का राजा बना दिया। वज्रनाभ जी के नाम पर ही मथुरा और आस-पास के क्षेत्र को व्रजमंडल कहा जाता है।
संदेशात्मक निष्कर्ष एवं विश्लेषण :
द्वापरयुग का अंत श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद शुरू हो गया, लेकिन कलयुग नामक एक और युग प्रारम्भ हुआ। समय और काल ने विभिन्न धर्मों में विभिन्न मानव अवतारों के माध्यम से, न्याय, अन्याय और मानवता से संबंधित विभिन्न प्रकार के तर्क संगत उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसमें सिद्ध होता है कि धरती पर उपस्थित प्रत्येक जीव, निर्जीव और सजीव समय और काल के बंधन में बंधने के कारण वश कालांतर में विद्यमान है। अजीब विडंबना है कि हम मानव होकर भी भगवान रुपी समय और काल को ना समझते हुए भगवान बनने के विभिन्न प्रकार के क्रिया-कलापों के माध्यम से ब्रह्मांड को चुनौती दे रहे हैं, लेकिन वही मानव भगवान बनेगा जो मानवतावादी होगा और मानवता की स्थापना करते हुए मानव धर्म को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि मानेगा।
अब ज्यादा कुछ लिखने के लिए, विश्लेषण और व्याख्या करने के लिए मुझे भी शायद भगवान बनना होगा, लेकिन मैं ठहरा हिन्दू बाकी के धर्मों के मानवों में से भगवान ढुंढना मुश्किल है। और मुझे भगवान बनने में कोई रुचि नहीं है। जैसा चल रहा है चलने दो जब काल समय बन कर कालांतर में आएगा तो फिर फैसला अपने आप हो जाएगा।
धरती की उत्पत्ति ब्रह्मांड द्वारा मानवों के लिए मानवता को स्थापित करने के उद्देश्य से हुआ है। लेकिन हम, भगवान, इश्वर, अल्लाह, जीसस, रब, वाहेगुरु आदि इत्यादि के नाम पर विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों में विभाजित हो गये। और ब्रह्मांड के उद्देश्य के विपरित समय और काल को अपने वश में करने के लिए लगे हुए हैं। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आस्तिक और नास्तिक सब ब्रह्मांड के रहस्य को समझ कर समय और काल को अपने अधीन करना चाहते हैं।
इसलिए समय और काल के अनुसार कालांतर में धरती को एक दिन ब्रह्मांड में ही विलीन हो जाना है। और फिर कलयुग का अंत होगा। तदोपरांत ब्रह्मांड द्वारा फिर से कालांतर में एक नये समय, काल और ग्रह का निर्माण होगा।
अब किसी मानव का अवतरण और प्रकटीकरण नहीं सिधा विनाश के माध्यम से पुनः ब्रह्मांडीय अवतरण होगा।
तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
अभीर (भिलां) लूटीं गोपियां, वहीं अर्जुन वही बांण।
मुझे नहीं पता ये तुलसी दास ने लिखा या फिर और किसी ने लेकिन इसमें लिखे भील और अभीर शब्दों पर विवाद है। यदि तुलसी ने लिखा है तो वो क्या उस समय जीवित थे। कुछ कहा नहीं जा सकता इस उपरोक्त चौपाई के बारे में।
इसलिए मैंने परिस्थिति और प्रसंग के अनुरूप स्वयं ही एक पंक्ति को कलमबद्ध किया है। जिसमें यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि मानवता के लिए ही समस्त धर्मों की स्थापना हुई है, और भगवान धर्म अनुसार ही मानवता के रक्षा लिए धरती पर विभिन्न रूपों में अवतरित हुए। और समय तथा काल के अनुसार ही अपने लीला और रचनात्मक कार्यों से मानव धर्म को सदैव प्रफुल्लित और पोषित करते रहते हैं।
मानवता से क्या भगवान बड़ा, समय बड़ा बलवान।
राम श्रापित हो गये, कृष्ण से बलसालि भये श्राप॥
अर्थात समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है। और शायद समय ही भगवान है। श्रीराम और श्रीकृष्णा को भी समयानुसार देह का त्याग करना पड़ा है।
और जब अर्जुन का वक्त बदला तो उसी के सामने आभिर लुटेरों ने द्वारिका वासियों सहित गोपियों को लूट लिया जिसके गांडीव के प्रत्यंचा के टंकार से बड़े-बड़े भगवान स्वरूप योद्धा घबरा जाते थे। वो भी समय रुपी काल के समक्ष विवश थे।
विशेष सत्ता बल, धन बल, भौतिक बल और काम, क्रोध, लोभ, मद, ये सब आपको शापित करके आपके अंदर अहंकार के कोष को जन्म दे सकते है ! अतः अपने बलों पर अहंकार ना करे क्योंकि समयानुसार समय ही बलवान है ना की उपरोक्त बल।
इस प्रकार वर्तमान समय में जितने भी धन्ना सेठ, बाहुबली और प्रधान सेवक, सन्यासी, फकीर, बाबा आदि जो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि माना रहे हैं, और जाती धर्म का धंधा करने लगे हुए हैं, उन सबका अंत काल द्वारा निर्धारित है।
अतः जितना भोग-विलास और आत्ममुग्धता का लुत्फ उठा सकते हैं उठा लें। जिस दिन बलवान समय के कालचक्र में पड़ेंगे उस दिन शायद पश्चाताप का मौका भी नहीं मिलेगा।
https://youtu.be/e7-Vto3qTvI?si=79ibOqtPCgWlG8fR
कोई एक मानव बताओ जो सभी धर्मों में सर्वजातीय हो, सर्वमान्य हो और सर्वशक्तिमान है। है कोई, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, बाहुबली, विद्वान, बुद्धिजीवी आदि इत्यादि जो बता सकता है कि इस धरती पर भगवान का अर्थ क्या है और भगवान अवतार का औचित्य क्या है। अरे मुर्खो जहां से पैदा हुए वहीं वापस जाने की कोशिश क्यों कर रहे हो। समझ गये तो ठीक नहीं तो समय समझाने वाला है। विस्तारपूर्वक चर्चा के लिए अपने विचार व्यक्त करते हुए कमेंट करें।
।। ब्रह्मांड की जय हो ।।










